Sunday, December 5, 2021
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हाईकोर्ट की मंज़ूरी के बगैर सांसद, विधायकों के मुकदमों को वापस नहीं ले सकेंगी राज्य सरकारें

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यूपी की राजनीति और सरकार भी प्रभावित होगी। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने राजनेताओं के ऊपर से आपराधिक मामलों के वापस लिए जाने के मामले के परीक्षण की जो तारीख तय की है, उसमें यूपी सरकार के मंत्री सुरेश राणा, कपिल देव अग्रवाल और भाजपा विधायक संगीत सोम शामिल हैं। इसके अलावा भाजपा के पूर्व सांसद भारतेंदु सिंह और विश्व हिंदू परिषद की नेता साध्वी प्राची शामिल हैं। इनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं, क्योंकि इनके मुकदमों की वापसी सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुकदमों की परीक्षण की निर्धारित तारीख 16 सितंबर 2020 के बाद हुई है।

अखिलेश त्रिपाठी

नई दिल्ली | देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों की शक्तियों को खत्म करते हुए सांसदों, विधायकों, और विधान परिषद सदस्यों के खिलाफ चलने वाले आपराधिक मामलों को वापस लेने की शक्ति को खत्म कर दिया है। अब राज्य सरकारें माननीयों के विरुद्ध चलने वाले आपराधिक मुकदमों को हाई कोर्ट की मंज़ूरी के बगैर वापस नहीं ले सकेंगी। यही नहीं पूर्व में माननीयों के वापस लिए गए मुकदमों का भी परीक्षण किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों द्वारा सांसदों, विधायकों और विधान परिषद सदस्यों एवं पूर्व सांसदों, पूर्व विधायकों व पूर्व विधान परिषद सदस्यों के विरुद्ध चलने वाले आपराधिक मुकदमों को वापस लेने की राज्य सरकारों की शक्ति को खत्म कर दिया है। अब राज्य सरकारों द्वारा इन लोगों के खिलाफ चलने वाले मुकदमों को तभी वापस लिया जा सकेगा, जब सम्बंधित राज्यों के हाई कोर्ट से इसकी मंजूरी मिले। हाई कोर्ट की मंजूरी मिले बगैर राज्य सरकारें अब इनके खिलाफ चलने वाले मुकदमों को किसी भी कीमत पर वापस नहीं ले सकेंगी।

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एन वी रमन्ना, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विनीत शरण की पीठ ने सर्वोच्च अदालत में एक मामले की सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण फैसला न्यायमित्र विजय हंसारिया के सुझावों को स्वीकार करते हुए दिया है। न्यायमित्र विजय हंसारिया ने सुप्रीम कोर्ट को एक सुझाव दिया था, जिसमें उन्होंने शीर्ष अदालत से कहा था कि, राज्य मौजूदा व पूर्व विधायकों के खिलाफ मुकदमे वापस ले रहे हैं, इसलिए इस प्रकरण में तत्काल निर्देश देने की ज़रूरत है।

न्यायमित्र विजय हंसारिया ने सुप्रीम कोर्ट को दिए गए अपने सुझाव में यह भी कहा था कि, सांसदों और विधायकों के खिलाफ चलने वाले मुकदमों को वापस लेने से पहले हाईकोर्ट की अनुमति ली जानी चाहिए। उन्होंने कहा था कि, सीआरपीसी की धारा-321 के तहत किसी भी मौजूदा या पूर्व सांसद या विधानसभा सदस्य या विधान परिषद के सदस्य के खिलाफ मुकदमा वापस लेने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और उत्तराखंड में सरकार द्वारा मुकदमा वापस लिए गए हैं। यहां पर यह गौर करने लायक बात है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक धारा-321 के तहत राज्य सरकारों द्वारा शक्ति के दुरुपयोग पर पहले से ही रोक है। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमित्र विजय हंसारिया के सुझावों को स्वीकार करते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर फैसला सुनाते हुए देश के सभी हाई कोर्ट से कहा है कि, 16 सितंबर, 2020 के बाद से सांसदों व विधायकों पर चलने वाले मुकदमों की वापसी का परीक्षण करें। सुप्रीम कोर्ट ने इसके साथ ही हाई कोर्ट से यह भी कहा है कि, परीक्षण में केरल राज्य बनाम के. अजीत मामले के फैसले के आलोक को ध्यान में रखें। सुप्रीम कोर्ट ने इसके साथ यह भी कहा है कि, हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को ऐसे मुकदमों की सुनवाई करने वाले जजों, लंबित एवं निबटाए गए मामलों का विवरण चार्ट भी प्रस्तुत करें।

सुप्रीम कोर्ट के इस महत्वपूर्ण फैसले से राजनीतिक दलों और राजनीतिक हल्कों में चिंता बढ़ी है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से आपराधिक मामलों में फंसे और उसके बाद मुकदमा वापस लेने से चैन की नींद सो रहे राजनेताओं की आंखों की नींद उड़ गई है, क्योंकि उनके वापस हुए मुकदमों का पुनः परीक्षण होने की दशा में उन्हें जेल जाना पड़ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश से राज्य सरकारों को तगड़ा झटका लगा है। क्योंकि अब हाई कोर्ट की मंज़ूरी के बगैर राज्य सरकारें सांसदों, विधायकों और विधान परिषद के सदस्यों के खिलाफ चलने वाले मुकदमों को वापस नहीं ले सकेंगी। इससे राज्य सरकारों की माननीयों के खिलाफ चलने वाले मुकदमों को वापस लेने की शक्ति खत्म हो गई है। राज्य सरकारें अपने फायदे के लिए और अपनी पार्टी के नेताओं को खुश करने के लिए राजनेताओं के खिलाफ चलने वाले मुकदमों को वापस लेने का काम करती रहती हैं।

सरकारें चाहे जिस राजनीतिक दल या राजनीतिक पार्टी की हों, लेकिन वह राजनेताओं के खिलाफ चलने वाले मुकदमों को वापस लेने का काम करती हैं। इस प्रकार राज्य सरकारें राजनेताओं के खिलाफ चलने वाले मुकदमों को वापस लेकर उन्हें खुश करने का प्रयास करती हैं। बदले में यह राजनेता राज्य में राजनीतिक दलों की सरकारों को बनवाने/बिगाड़ने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। राजनीतिक फायदे को ध्यान में रख करके राज्य सरकार राजनेताओं के खिलाफ चलने वाले मुकदमों को वापस लेने और उन्हें खुश रख कर अपने साथ बनाए रखने का काम करती हैं।

कभी किसी ने यह खबर नहीं सुना होगा कि सम्बंधित राज्य सरकार ने किसी आम आदमी या निर्दोष लोगों के ऊपर से मुकदमा हटाया है। आम आदमी और निर्दोष लोगों के ऊपर लादे गए मुकदमे नहीं हटाये जाते हैं। वे बेचारे मुकदमा लड़ते रहते हैं और बहुत सी तकलीफों को झेलते रहते हैं, लेकिन राज्य सरकार फर्जी मुकदमों को वापस नहीं लेती हैं। अब राज्य सरकारों की सांसदों और विधायकों के खिलाफ चलने वाले मुकदमों को वापस लेने वाली शक्तियों के खत्म होने से राज्यों की सरकारों को बड़ा झटका लगा है। इससे राज्य सरकारें और राजनीतिक दल और उनके राजनेता सीधे तौर पर प्रभावित होंगे।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से राज्य सरकारों के साथ ही साथ केंद्र सरकार भी प्रभावित होगी। क्योंकि केंद्र में सरकार बनाने के लिए भी बड़ा जोड़तोड़ करना पड़ता है और सारे राजनीतिक मूल्यों को तिलांजलि देनी पड़ती है, तब जाकर कहीं सरकार बनती है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यूपी की राजनीति और सरकार भी प्रभावित होगी। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने राजनेताओं के ऊपर से आपराधिक मामलों के वापस लिए जाने के मामले के परीक्षण की जो तारीख तय की है, उसमें यूपी सरकार के मंत्री सुरेश राणा, कपिल देव अग्रवाल और भाजपा विधायक संगीत सोम शामिल हैं। इसके अलावा भाजपा के पूर्व सांसद भारतेंदु सिंह और विश्व हिंदू परिषद की नेता साध्वी प्राची शामिल हैं।

इनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं, क्योंकि इनके मुकदमों की वापसी सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुकदमों की परीक्षण की निर्धारित तारीख 16 सितंबर 2020 के बाद हुई है। इनके मुकदमों को योगी आदित्यनाथ की राज्य सरकार ने हाई कोर्ट की अनुमति के बगैर वापस लिया है। इसलिए अब इनके मुकदमों का परीक्षण होगा, जिसमें इन्हें दिक्कत पेश आएगी।

इलाहाबाद की भाजपा सांसद रीता बहुगुणा जोशी के खिलाफ लखनऊ की अदालत में एक मुकदमा चल रहा था, जिसे 21 फरवरी 2021 को योगी आदित्यनाथ की सरकार ने वापस ले लिया। यह मुकदमा रीता बहुगुणा जोशी जब कांग्रेस में थीं, तब उनके खिलाफ दर्ज किया गया था। यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने तो अपने खिलाफ चल रहे मुकदमों को पहले ही वापस ले लिया था। यूपी में राजनेताओं के खिलाफ चलने वाले 76 केस योगी आदित्यनाथ की सरकार ने बगैर हाई कोर्ट की मंजूरी के वापस लिया है।

सुप्रीम कोर्ट में न्यायमित्र विजय हंसारिया ने जब यह कहा कि, यूपी में राज्य सरकार ने राजनेताओं के खिलाफ चलने वाले 76 मामले वापस ले लिया है और वह भी हाई कोर्ट की मंजूरी के बगैर। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने आश्चर्य व्यक्त किया। सर्वोच्च अदालत ने राजनेताओं के खिलाफ चलने वाले मुकदमों को वापस लिए गए मामले के परीक्षण के लिए बड़े सख्त निर्देश दिए हैं। राजनेताओं द्वारा परीक्षण को प्रभावित न किया जा सके, इसके लिए सर्वोच्च अदालत ने राजनेताओं के मामले के परीक्षण करने वाले जजों के तबादलों पर रोंक लगा दिया है। पीठ ने कहा है कि, विशेष अदालतों में सांसदों व विधायकों के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामलों की सुनवाई करने वाले ट्रायल जज अगले आदेश तक मौजूदा पदों पर बने रहेंगे।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस प्रकार का आदेश दिए जाने से राज्य सरकारों को तगड़ा झटका लगा है, क्योंकि राज्य सरकार अब जजों को तबादला नहीं करवा पाएंगी। सर्वोच्च अदालत को यह लगा कि राज्य सरकार मामलों को प्रभावित करने के लिए संबंधित जजों का जोड़तोड़ करके उनका तबादला करवा सकती हैं और अपने मनमाफिक जजों को बैठा करके अपने पक्ष में मनमाना फैसला करवा सकती हैं। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने सम्बंधित जजों के तबादलों पर रोंक लगा दी है।

राजनेताओं के खिलाफ चल रहे मामले की वापसी और अब उनके परीक्षण करने के आदेश से योगी आदित्यनाथ की सरकार और मुकदमा वापस हुए राजनेताओं की दिक्कतें बढ़ सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से योगी आदित्यनाथ को जोरदार झटका लगा है और इससे योगी आदित्यनाथ के साथ भाजपा भी काफी परेशान है। भाजपा को इस संकट का हल नज़र नहीं आ रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और सीबीआई जैसी एजेंसियों द्वारा स्थिति रिपोर्ट दाखिल न करने पर कड़ी नाराज़गी जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि, सरकार ने कुछ नहीं किया। हमारे पास अब शब्द नहीं हैं। सब कुछ कह चुके हैं, जो हम कह सकते थे। हमें बताया गया, सरकार सांसदों व विधायकों पर मुकदमें को पूरा करने के बारे में गम्भीर है। लेकिन सरकार ने कुछ नहीं किया। हम इतना ही कह सकते हैं।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार का बचाव करते हुए कहा कि, सरकार निर्वाचित प्रतिनिधियों के खिलाफ मुकदमे को तेजी से पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है। तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से रिपोर्ट दाखिल करने के लिए अंतिम अवसर मांगा। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि, आखिरी मौका दे रहे हैं। इसके बाद हम मान लेंगे कि आपके पास कहने के लिए कुछ नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी ने बताया कि, यूपी सरकार ने मुजफ्फरनगर दंगा मामले में संगीत सोम,सुरेश राणा, कपिल देव और साध्वी प्राची का केस वापस ले लिया है। चीफ जस्टिस एन वी रमन्ना की पीठ ने इस पर हैरानी जताते हुए कहा कि, राज्य सरकारें सेक्शन 321 के तहत मिली ताकत का गलत इस्तेमाल कर रही हैं।

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर की है। अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल कर मांग की थी कि, विशेष अदालतें बनाकर माननीयों के खिलाफ मुकदमों में तेज़ी से सुनवाई की जाए। राजनेताओं के विरुद्ध अदालतों में चलने वाले आपराधिक मामलों के बारे में प्रसिद्ध एडवोकेट लाखन सिंह का साफ और स्पष्ट कहना है कि, कानून से ऊपर कोई नहीं है। इस देश में एक ही कानून सब पर लागू होता है। कानून के दायरे में कोई छोटा और बड़ा नहीं हो सकता है।

उन्होंने कहा कि, कानून सबके ऊपर समान रूप में लागू होता है। अगर कानून का प्रयोग छोटा और बड़ा देखकर किया जाएगा तो इसमें समानता कहां पर रह जाएगी। इससे राज्य और संविधान की कल्पना खंडित हो जाएगी। किसी भी सरकार को आपराधिक कृत्य करने वाले व्यक्ति या राजनेता के मुकदमों को वापस लेने का अधिकार संविधान और देश का कानून नहीं देता है। जब सरकार गलत निर्णय लेने का काम करेंगी तो सुप्रीम कोर्ट को देश एवं जनता के हितों की रक्षा करने के लिए सामने आना ही पड़ेगा।सुप्रीम कोर्ट का फैसला राज्य सरकारों के लिए सबक है। इस फैसले से सरकार को सतर्क हो जाना चाहिए और कानून का दुरुपयोग करने से बाज़ आना चाहिए।

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