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Saturday, April 13, 2024
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“फ़िलिस्तीनी आवाम फ़िलिस्तीन की भूमि पर ही जीने और मरने के लिए दृढ़ है”: फ़िलिस्तीनी राजदूत

इंडिया टुमारो

नई दिल्ली | भारत में फिलिस्तीन के राजदूत अदनान अबू अल-हैजा ने इज़राइल पर फिलिस्तीनियों को उनकी मातृभूमि से बेदखल करने की रणनीति लागू करने का आरोप लगाते हुए शुक्रवार को एक कार्यक्रम में दिए अपने एक भावुक संबोधन में कसम खाई कि फिलिस्तीनी लोग फ़िलिस्तीन की भूमि पर ही जीने और मरने के लिए दृढ़ हैं.

फ़िलिस्तीन के लोगों के साथ मज़बूती से एकजुटता दिखाते हुए, इंडियंस फॉर पेलेस्टाइन संगठन ने इंटरनेशनल कोर्ट एंड जस्टिस फॉर गाज़ा (आईसीजे) के हालिया फैसले के निहितार्थों पर चर्चा करने और उन्हें समझने के लिए नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में एक सार्वजनिक मीटिंग का आयोजन किया था. इस आयोजन में राजनीतिक प्रतिनिधियों, कानूनी विशेषज्ञों, पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और संबंधित नागरिकों सहित विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों और लोगों ने भाग लिया.

फिलीस्तीनी राजदूत अदनान ने कार्यक्रम में एक भावुक कर देने वाला भाषण दिया. अपने भाषण में उन्होंने गाज़ा पट्टी की गंभीर स्थिति पर प्रकाश डाला, जहां लगभग 150 दिनों से लगातार इज़राईल द्वारा किए जा रहे हमले के कारण डेढ़ लाख से अधिक लोग भूख का सामना कर रहे हैं.

राजदूत ने एक मज़बूत अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई का आह्वान किया क्योंकि फिलीस्तीनी क्षेत्र लगातार मानवीय संकट का सामना कर रहा है, उन्होंने 1967 के अनुसार भूमि पर फिलिस्तीन राज्य,जिसकी राजधानी पूर्वी येरुशलम है, की स्थापना के लिए एक राजनीतिक समाधान की आवश्यकता पर ज़ोर दिया, .

अदनान ने गाज़ा पट्टी की गंभीर स्थितियों पर प्रकाश डालते हुए अपनी बात की शुरुआत की, जहां डेढ़ लाख से अधिक लोग गंभीर भूख के संकट से जूझ रहे हैं. उन्होंने इज़राइल पर फ़िलिस्तीनियों को उनकी मातृभूमि से निकालने की रणनीति अपनाने का आरोप लगाया, और इस बात पर ज़ोर दिया कि फ़िलिस्तीनी लोग फ़िलिस्तीन की भूमि में जीने और मरने के लिए दृढ़ हैं. राजदूत ने खुलासा किया कि गाज़ा पर लगभग 150 दिनों से लगातार किए जा रहे इज़राइल के हमलों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भले ही स्तब्ध कर दिया है, लेकिन पिछले 75 वर्षों से फिलिस्तीनी के हालात पर करीब से नज़र रखने वालों के लिए 7 अक्टूबर की घटनाएं एक आश्चर्य नहीं है.

अदनान ने संयुक्त राष्ट्र के 800 से अधिक प्रस्तावों का हवाला देते हुए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की निष्क्रियता की निंदा की. उन्होंने कहा कि ये प्रस्ताव कभी लागू नहीं किए गए, और इन प्रस्तावों की इज़राइल द्वारा बार-बार उपेक्षा की गई है. संयुक्त राज्य अमेरिका पर 1948 से लगातार 114 बार से अधिक वीटो का इस्तेमाल करके फिलिस्तीनी लोगों के खिलाफ इज़राइली हमले में शामिल रहा है. अदनान ने ज़ोर देकर कहा कि फिलिस्तीनी संघर्ष 100 साल से अधिक पुराना है, 1917 में हुए बाल्फोर घोषणा के महत्व और ब्रिटिशों के प्रवेश पर भी अदनान ने अहम बात रखी.

राजदूत ने 7 अक्टूबर की घटनाओं के पीछे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दो कारणों को रेखांकित किया. नेतन्याहू द्वारा फ़िलिस्तीनी राज्य के अस्तित्व से लगातार इनकार, वेस्ट बैंक में इज़राइल द्वारा लगातार फिलीस्तीन की ज़मीन पर अतिक्रमण और बस्तियों का निर्माण यह सभी अप्रत्यक्ष कारणों के रूप में वर्गीकृत किए. उन्होंने फ़िलिस्तीनियों के सामने आने वाली कठिनाइयों पर प्रकाश डाला, जिसमें 645 सैन्य चौकियों का अस्तित्व, घर बनाने पर प्रतिबंध और फ़िलिस्तीनी स्वामित्व वाली संरचनाओं का विध्वंस शामिल है.

इसके बाद अदनान ने गाज़ा की बदतरीन स्थिति की ओर ध्यान दिलाया और इसे एक खुली जेल बताया जहां 23 लाख लोग 17 साल से रह रहे हैं. इज़राइली नाकाबंदी के कारण मानवीय सहायता तक सीमित पहुंच के कारण क्षेत्र में गरीबी दर 70% तक पहुंच गई है. राजदूत ने गाज़ा में जीवन की गंभीर कठिनाइयों का खुलासा किया, वहां 80% इमारतें इज़राइल द्वारा नष्ट कर दी गईं है, जिनमें घर, स्कूल, अस्पताल और धार्मिक संस्थान सभी शामिल रहे हैं. उन्होंने इज़राइल पर जानबूझकर मानवीय सहायता के प्रवेश में बाधा डालने का आरोप लगाया, जिससे विशेष रूप से गाज़ा के उत्तरी हिस्से में गंभीर भूख संकट बढ़ गया.

राजदूत ने इजरायली सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-ग्विर की विशेष निंदा की, उन्हें “फिलीस्तीनी कैदियों को प्रताड़ित कर मज़ा लेने वाला बताया. बेन-ग्विर की निगरानी में, इज़राइली सेना फिलिस्तीनियों को यरूशलेम से विस्थापित करने और अल-अक्सा मस्जिद जैसे पवित्र स्थलों तक उनकी पहुंच को प्रतिबंधित करने के प्रयास तेज़ कर रही है.

7 अक्टूबर की घटनाओं के पीछे के प्रत्यक्ष कारणों की ओर बढ़ते हुए, अदनान ने दिसंबर 2022 में गठित वर्तमान इज़राइली सरकार की चरमपंथी प्रकृति पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि इस सरकार के शासन के तहत 7 अक्टूबर, 2023 से पहले 260 फिलिस्तीनी मारे गए थे. उन्होंने फिलीस्तीनी भूमि की निरंतर ज़ब्ती, नई इज़राइली बस्तियों का फिलीस्तीन की भूमि पर निर्माण और पूर्वी यरुशलम से फ़िलिस्तीनी लोगों के विस्थापन की निंदा की.

अदनान ने अल-अक्सा मस्जिद, इसके प्रवेश समय के विभाजन और इसके परिसर के भीतर एक मंदिर बनाने की योजना के संबंध में इज़राइल की कार्रवाइयों को उत्तेजक और अपमानजनक करार दिया. अदनान ने गवाही दी, “कोई भी गाज़ा में रहने वाले लोगों के हालात को बयान नहीं कर सकता.” उन्होंने इज़रायल की कार्रवाइयों की तुलना नाज़ी शासन की कार्रवाइयों से की, और इसे फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ नरसंहार के समान बताया.

राजदूत ने इज़राइल पर फिलिस्तीनी टैक्स के पैसे को जब्त करने और शहीदों, घायल व्यक्तियों और बंदियों के वेतन को रोकने का आरोप लगाया. उन्होंने इज़राइल द्वारा पत्रकारों को जानबूझकर निशाना बनाने का खुलासा किया. इज़रायली अपराधों को छुपाने के लिए 125 पत्रकारों की हत्या कर दी गई. अदनान ने इज़राइल पर नरसंहार का आरोप लगाया, जिसमें लगभग 30,000 फिलिस्तीनी मार दिए गए, जिनमें ज्यादातर महिलाएं और बच्चे शामिल थे. अब तक 69,000 से अधिक फिलीस्तीनी घायल हुए हैं.

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया पर अपना ध्यान केंद्रित करते हुए, अदनान ने संयुक्त राष्ट्र, इसके महासचिव और मध्य पूर्व के समन्वयक पर इज़राइल के हमलों की आलोचना की. उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि सात देशों ने यूएनआरडब्ल्यूए को अपना दान रोक दिया, जिससे इसके 13,000 कर्मचारियों की आजीविका खतरे में पड़ गई. राजदूत ने तर्क दिया कि फिलिस्तीनी शरणार्थियों की वापसी के अधिकार यूएनआरडब्ल्यूए से संबंधित हैं इसलिए इसके प्रति इज़राइल शत्रुता रख रहा है, जैसा कि UNGA संकल्प 194 द्वारा स्थापित किया गया है.

राजदूत अदनान ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से तेज़ी से कार्रवाई करने का अनुरोध किया और कहा कि यदि राजनीतिक समाधान और फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना नहीं हुई तो अगला युद्ध और भी विनाशकारी होगा. अदनान ने अपनी अंतिम टिप्पणी में चिन्ता प्रकट करते हुए कहा कि “अगर उन्होंने कोई राजनीतिक समाधान नहीं खोजा और फिलिस्तीन राज्य की स्थापना नहीं की…तो अगला युद्ध बहुत बुरा होगा.”

अदनान ने दक्षिण अफ्रीका, कोलंबिया, बोलीविया, चिली, ब्राजील, आयरलैंड, बेल्जियम, स्पेन और कई अन्य देशों को उनके समर्थन के लिए धन्यवाद दिया और वैश्विक मंच पर जवाबदेही का आह्वान किया.

मीटिंग की शुरुआत मॉडरेटर जीन ड्रेज़ और आयशा किदवई के परिचयात्मक नोट के साथ हुई, इन्होंने प्रभावशाली सत्रों की एक कड़ी के लिए मंच तैयार किया. पहले सत्र में वकील आनंद ग्रोवर, पूर्व राजनयिक केपी फैबियन, पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन और फिलिस्तीनी राजदूत जैसी प्रतिष्ठित हस्तियां शामिल हुईं, जिन्होंने आईसीजे के फैसले और फिलिस्तीन की गंभीर स्थिति पर प्रकाश डाला.

गाज़ा की नागरिक और फिलिस्तीनी कामकाजी महिला समिति और फिलिस्तीनी पीपुल्स पार्टी की प्रतिनिधि अरवा अबू हशश ने गाज़ा में चल रहे अत्याचारों की गंभीरता पर ज़ोर देते हुए एक मार्मिक संदेश दिया. फ़िलिस्तीनी राजदूत, अदनान अबू अल हैजा ने विभिन्न देशों द्वारा व्यक्त की गई एकजुटता को स्वीकार किया और सार्थक कार्रवाई का आग्रह किया.

आनंद ग्रोवर, केपी फैबियन और सिद्धार्थ वरदराजन जैसे वक्ताओं ने अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई की कमी के बारे में अपनी चिंता व्यक्त की और इज़राइल के साथ भारत के रणनीतिक संबंधों की ओर ध्यान आकर्षित किया.

इस अवसर पर बोलते हुए, आनंद ग्रोवर ने कहा, “दक्षिण अफ्रीका जैसा साहस अन्य देशों, विशेषकर भारत से गायब है. हमें न्याय के लिए खड़ा होना चाहिए और इज़राइल को जवाबदेह बनाना चाहिए.

सिद्धार्थ वरदराजन ने इज़राइल को ड्रोन के निर्यात जैसे विशिष्ट उदाहरणों का हवाला देते हुए, इज़राइल के कार्यों में भारत सरकार की मिलीभगत पर प्रकाश डाला.

सलमान खुर्शीद (कांग्रेस), अमरजीत कौर (एआईटीयूसी), सुभाषिनी अली (सीपीआईएम), और दीपांकर भट्टाचार्य (सीपीआईएमएल-लिबरेशन) सहित राजनीतिक नेता फिलिस्तीन के साथ एकजुटता व्यक्त करने के लिए दूसरे सत्र में शामिल हुए. उन्होंने तत्काल युद्धविराम की आवश्यकता पर ज़ोर दिया और इज़राइल के लिए मोदी सरकार के समर्थन की निंदा की.

सलमान खुर्शीद ने कहा, ”यह सिर्फ फिलिस्तीन का संघर्ष नहीं है, यह मानवता के लिए संघर्ष है. भारत को आईसीजे के फैसले का समर्थन करना चाहिए और तत्काल युद्धविराम की मांग करनी चाहिए.

सुभाषिनी अली ने कहा, “यह युद्ध धर्म को लेकर नहीं है, यह साम्राज्यवाद को लेकर है. उपनिवेशवाद(, क्यूंकि भारत ख़ुद ब्रिटिश का गुलाम रहा है) के बाद के राष्ट्र के रूप में भारत को फ़िलिस्तीन के साथ खड़ा होना चाहिए. उनका संघर्ष हमारा संघर्ष है.”

कौर ने इज़राइल के लिए जाने वाले हथियारयुक्त माल को संभालने के लिए डॉक श्रमिकों के इनकार की बात करते हुऐ कहा कि यह फ़िलिस्तीन के लिए भारतीय लोगों के समर्थन का प्रमाण है.

एक प्रतीकात्मक एकजुटता प्रदर्शन के रुप में अकादमिक व्यक्तित्व और लेखक अपूर्वानंद ने हाल ही में प्रकाशित फिलिस्तीनी कविताओं के हिंदी संकलन से एक कविता पढ़ी. मीटिंग सर्वसम्मति से अपनाए गए एक प्रस्ताव के साथ समाप्त हुई, जिसमें भारत सरकार से आईसीजे के फैसले का सार्वजनिक रूप से समर्थन करने और गाज़ा में मानवाधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ रुख अपनाने का आग्रह किया गया.

प्रस्ताव में हालिया मीडिया रिपोर्टों पर गहरा दुख व्यक्त किया गया है, जिनमें बताया गया है कि अदानी-एलबिट एडवांस्ड सिस्टम्स इंडिया लिमिटेड, एक संयुक्त उद्यम, ने गाज़ा के विरुद्ध चल रहे युद्ध के बीच इज़राइल को बीस हर्मीस-900 सैन्य ड्रोन भेजे हैं. यह साझेदारी फिलीस्तीन इज़राइल संघर्ष में फिलीस्तीन के विरुद्ध भारत की संभावित भागीदारी को लेकर चिंता पैदा करती है, इसके अलावा कथित तौर पर कई अन्य भारतीय कंपनियां इज़राइली हथियार निर्माताओं के साथ सब्सिडी वाले संयुक्त उद्यमों में लगी हुई हैं.

महत्वपूर्ण चिंता का विषय फिलिस्तीनी श्रमिकों के स्थान पर भारतीय श्रमिकों की भर्ती में भारत सरकार द्वारा कथित सुविधा प्रदान करना है, जिनके परमिट निलंबित हैं. इस कदम की न केवल फिलिस्तीनी श्रमिकों के खिलाफ इज़राइल के फैसले का समर्थन करने के लिए बल्कि क्षेत्र में तैनात भारतीय श्रमिकों के सामने आने वाले संभावित खतरों की अनदेखी करने के लिए भी आलोचना की गई है. प्रस्ताव में भारत सरकार पर गाज़ा में हो रहे नरसंहार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन को दबाने और आगे चलकर इज़राइल का खुला समर्थन करने का आरोप लगाया गया.

प्रस्ताव में 11 प्रमुख भारतीय बंदरगाहों पर 3,500 श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करने वाले भारतीय जल परिवहन श्रमिक संघ के हालिया फैसले की सराहना की गई. भारतीय जल परिवहन श्रमिक संघ ने इज़राइल या किसी अन्य देश के ऐसे हथियारबंद कार्गो को लोड करने या उतारने में सहयोग से इंकार कर दिया, जिसका उपयोग फिलिस्तीन के विरूद्ध हो सकता है.

फ़िलिस्तीन के लिए भारतीयों ने तत्काल युद्धविराम के लिए अपना आह्वान दोहराया और भारत सरकार से इज़राइल के लिए अपने रणनीतिक समर्थन पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया.

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