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Sunday, March 3, 2024
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ज्ञानवापी मस्जिद में नमाज़ पर पाबंदी नहीं, हिन्दू पक्ष को दक्षिणी तहखाने में मिली पूजा की इजाज़त

-सैयद ख़लीक अहमद

नई दिल्ली | वाराणसी की अंजुमन मसाजिद इंतज़ामिया कमेटी के संयुक्त सचिव सैयद मोहम्मद यासीन ने कहा है कि वाराणसी की अदालत द्वारा हिंदू पक्ष को मस्जिद के दक्षिणी तहखाने में पूजा करने की अनुमति देने के बाद भी ज्ञानवापी मस्जिद में नमाज़ हमेशा की तरह अदा की जा रही है. हिन्दुओं को पूजा की अनुमति के लिए कोर्ट का आदेश बुधवार को आया है.

उन्होंने कहा कि गुरुवार को फज्र की नमाज़ भी स्थानीय प्रशासन या किसी बाहरी व्यक्ति की ओर से बिना किसी बाधा के मस्जिद में अदा की गई.

संयुक्त सचिव सैयद मोहम्मद यासीन ने इंडिया टुमारो से बात करते हुए ये स्पष्टीकरण दिया क्योंकि कुछ सोशल मीडिया यूज़र्स
यह झूठी खबर फैला रहे थे कि वाराणसी ज़िला अदालत के आदेश के बाद ज्ञानवापी मस्जिद में एक मूर्ति स्थापित की गई थी और उसके बाद हिंदू पक्ष द्वारा पूजा शुरू हुई. इससे देशभर के मुसलमानों में चिंता और आक्रोश व्याप्त हो गया था.

मस्जिद के नीचे तहखाने के बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि मस्जिद के दो तहखाने हैं. एक दक्षिणी तरफ जिसका प्रवेश द्वार काशी विश्वनाथ मंदिर की तरफ खुलता है और दूसरा “तहखाना” उत्तर की तरफ खुलता है. दोनों तहखाने ज़मीन से लेकर मस्जिद की छत तक एक मोटी दीवार से अलग होते हैं.

दक्षिणी तहखाना स्थानीय प्रशासन के कब्ज़े में था और इसका इस्तेमाल वार्षिक हिंदू पूजा-नवान्न पथ-अनुष्ठानों के लिए उपयोग की जाने वाली बांस की लकड़ियाँ और अन्य सामग्री रखने के लिए किया जाता था. यह तहखाना साल में एक बार केवल बांस और लकड़ी का सामान निकालने और फिर उन्हें तहखाने में जमा करने के लिए खोला जाता था.

जहां तक उत्तरी तहखाने का सवाल है, उन्होंने कहा कि वहां दो दुकानें थीं: एक चूड़ियों की दुकान थी जिसे एक मुस्लिम विक्रेता चलाता था और दूसरी उस हिंदू को किराए पर दी गई थी जो वहां चाय की दुकान चलाता था. इन दोनों दुकानदारों द्वारा मस्जिद प्रबंधन समिति को किराया दिया जाता था.

6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद, वाराणसी रेंज के तत्कालीन पुलिस उप महानिरीक्षक (डीआईजी) चमन लाल ने मस्जिद प्रबंधन समिति को उत्तरी तहखाने की दोनों दुकानों को खाली कराने और उन्हें अपने निरीक्षण के अधीन रखने की सलाह दी.

मोहम्मद यासीन के अनुसार, डीआइजी ने आशंका व्यक्त की थी कि कोई अयोध्या जैसी स्थिति पैदा करने के लिए दोनों दुकानदारों में से किसी का भी दुरुपयोग कर सकता है, ज्ञात हो कि बाबरी मस्जिद के केंद्रीय गुंबद के नीचे एक मूर्ति को गुप्त रूप से स्थापित करने के बाद ही वहां विवाद शुरू हुआ था.

मस्जिद प्रबंधन समिति ने डीआइजी की सलाह पर कार्रवाई करते हुए दोनों दुकानें खाली करा लीं. सचिव मोहम्मद यासीन ने आगे बताया, “समिति ने दोनों दुकानदारों को पैसे का भुगतान किया और परिसर खाली कराने के लिए दोनों के लिए वैकल्पिक दुकानों की व्यवस्था की.”

उन्होंने बताया, “तब से तहखाने की चाबियां मस्जिद कमेटी के पास ही हैं.”

मोहम्मद यासीन ने कहा कि, जहां तक मस्जिद परिसर में लोहे की ग्रिल से बैरिकेडिंग करने का सवाल है, यह 1993 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर किया गया था. उनके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने मोहम्मद असलम उर्फ भूरे की याचिका पर बैरिकेडिंग का आदेश दिया था, जिन्होंने 1991 में बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि स्थल पर यथास्थिति की मांग की थी. बैरिकेडिंग का आदेश यह सुनिश्चित करने के लिए दिया गया था कि ज्ञानवापी मस्जिद को कोई नुकसान न हो. क्योंकि कट्टरपंथी हिंदूवादी संगठन इस मस्जिद पर भी अपना दावा जता रहे थे.

भूरे की याचिका पर ही 24 अक्टूबर 1994 को यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को बाबरी मस्जिद मामले में अदालत की अवमानना का दोषी ठहराया गया था. भूरे की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के यथास्थिति आदेश के बावजूद कल्याण सिंह सरकार द्वारा बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि स्थल के आसपास निर्माण गतिविधियों की अनुमति देने के संदर्भ में कोर्ट द्वारा सिंह को दोषी ठहराया गया.

अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि, “दुखद (स्थिति) है कि एक राजनीतिक दल के नेता और मुख्यमंत्री को अदालत की अवमानना के अपराध के लिए दोषी ठहराया गया. लेकिन कानून की महिमा को बरकरार रखने के लिए यह किया जाना चाहिए.”

हिंदू पक्ष को दक्षिणी तहखाने तक पहुंचने की अनुमति देने के लिए स्थानीय प्रशासन द्वारा मस्जिद की बैरिकेडिंग को काटने पर मोहम्मद यासीन ने आपत्ति जताई.

उन्होंने कहा कि चूंकि बैरिकेडिंग सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर की गई थी, इसलिए इसे आंशिक रूप से भी शीर्ष अदालत के आदेश पर ही हटाया जा सकता है. कोई अन्य अदालत इस संबंध में कोई आदेश पारित नहीं कर सकती.

उन्होंने इस बात पर अफसोस जताया कि स्थानीय प्रशासन को इस बात की कोई परवाह नहीं है.

उन्होंने कुछ अखबारों की रिपोर्टों में किए जा रहे दावों का खंडन किया कि ब्रिटिश काल से ही दक्षिणी तहखाने में हिंदू पूजा की जाती थी, लेकिन कानून और व्यवस्था की स्थिति का हवाला देते हुए मुलायम सिंह यादव सरकार ने इसे रोक दिया था. उन्होंने कहा कि इस दावे का कोई सबूत नहीं है.

सचिव मोहम्मद यासीन ने कहा कि 1942 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले में भी ज्ञानवापी मस्जिद का मस्जिद दर्जा बरकरार रखा गया था लेकिन अब अदालत इसे स्वीकार नहीं कर रही है. 1942 के फैसले में यह भी कहा गया था कि ज्ञानवापी मस्जिद और वह चबूतरा जिस पर वह खड़ी है, दोनों वक्फ संपत्ति है.

सचिव मोहम्मद यासीन ने यह भी कहा कि मस्जिद की पश्चिमी दीवारों से सटी दो कब्रों पर हर साल उर्स आयोजित किया जाता था. लेकिन, ब्रिटिश काल में निजी कारणों से आयोजकों ने उर्स बंद कर दिया था.

हालाँकि, दो साल पहले, उर्स आयोजकों के वंशजों ने उन्हें दो कब्रों के उर्स की अनुमति देने के लिए वाराणसी ज़िला अदालत से संपर्क किया था. सचिव मोहम्मद यासीन ने कहा कि अदालत ने हिंदुओं के आवेदन पर निर्णय लिया और मस्जिद के दक्षिणी तहखाने में पूजा की अनुमति दे दी, लेकिन उर्स की अनुमति के लिए मुस्लिम वादियों पर ध्यान नहीं दिया गया.

उन्होंने कहा कि मस्जिद में नमाज़ पढ़ने से रोकने के लिए हिंदू पक्ष की ओर से भी कई याचिकाएं दायर की गई हैं. हालाँकि वाराणसी कोर्ट ने नमाज़ पर प्रतिबंध नहीं लगाया, लेकिन हिंदू याचिकाकर्ताओं की याचिका के आधार पर नमाज़ियों की संख्या केवल 20 तक सीमित कर दी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 17 मई 2022 को अपने आदेश में नमाज़ जारी रखने का आदेश दिया और मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए व्यक्तियों की संख्या पर लगी रोक हटा दी.

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