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Sunday, June 23, 2024
Home अन्तर्राष्ट्रीय संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद का महिला शिक्षा को लेकर दोहरा मापदंड क्यों?

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद का महिला शिक्षा को लेकर दोहरा मापदंड क्यों?

-हुमा मसीह

नई दिल्ली | संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने सोमवार को मानवाधिकार परिषद के 54वें सत्र के उदघाटन सत्र में बोलते हुए दुनियाभर में मानवाधिकार के कई मुद्दों पर अपनी बात साझा की.

उन्होंने महिलाओं के शिक्षा के मुद्दे पर भी अहम बातें कहीं.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि “तालिबान के क़ब्जे के बाद से अफगानिस्तान में मानवाधिकारों की स्थिति लगातार गिर रही है, जिससे महिलाओं और लड़कियों के अधिकार खत्म हो रहे हैं.”

यूएन के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से किए गए ट्वीट में कहा गया है कि, “लड़कियों का स्थान स्कूल में है. शिक्षा विलासिता नहीं है – यह एक मानवाधिकार है. शिक्षा को नकारा जाना, युवतियों और लड़कियों के मानवाधिकारों का हनन करता है और उन्हें हिंसा, गरीबी और शोषण के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकता है. सभी विद्यार्थियों को सीखने का अधिकार मिलना चाहिए.”

महिला शिक्षा के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग द्वारा अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करना बहुत सराहनीय और अहम है. यह देखना सुखद है कि मानवाधिकार परिषद अफगानिस्तान की महिलाओं की शिक्षा को लेकर चिंतित है.

लेकिन जब एक ऐसे विश्व में जहां विकसित कहे जाने वाले राष्ट्रों द्वारा महिलाओं को कानून बनाकर शिक्षा से वंचित किया जा रहा हो क्या वहां संयुक्त राष्ट्र द्वारा सिर्फ़ अफगानिस्तान की महिलाओं के शिक्षा के मुद्दे पर चिंता व्यक्त करना काफी होगा?

फ़्रांस में हिजाब की आड़ में मुस्लिम लड़कियों को शिक्षा से दूर करने पर मानवाधिकार परिषद ख़ामोश क्यों?

हाल ही में फ्रांस में हिजाब पहनने वाली लड़कियों के स्कूलों में आने पर पाबंदी लगा दी गई है. उन्हें मजबूर किया जा रहा है कि यदि वे शिक्षा हासिल करना चाहती हैं तो उन्हें अपना पहनावा छोड़ना होगा और तथाकथित आधुनिक कहे जाने वाले पहनावे को अपनाना होगा.

यहीं नहीं फ्रांस के शिक्षा मंत्री गेब्रियल अटाल ने मुस्लिम लड़कियों द्वारा सिर ढके जाने को राजनीतिक आक्रमण की संज्ञा भी दे डाली, हालांकि वो यह स्पष्ट करने में विफल रहे की किसी मुस्लिम महिला द्वारा सर ढके जाना किस तरह से राजनीतिक आक्रमण है.

फ्रांस के शिक्षा मंत्री गेब्रियल अटाल ने तर्क दिया कि यह ड्रेस (अबाया/हिजाब) शिक्षा के क्षेत्र में फ्रांस के सख्त धर्मनिरपेक्ष कानूनों का उल्लंघन करता है.

भारत के कर्नाटक में स्कूली छात्राओं को शिक्षा से दूर रखने के लिए हिजाब पर लगाया था प्रतिबन्ध

इससे पहले फ्रांस की ही भांति भारत के कर्नाटक राज्य में भी स्कूलों में हिजाब पर पाबंदी लगाई गई थी.

फ्रांस और भारत दोनों ही देशों में हिजाब मामले पर संबंधित अदालतों द्वारा भी पाबंदी को अलग अलग तर्क के आधार पर सही ठहराया गया था.

दोनों देशों में हिजाब पर पाबंदी के बाद कई हिजाबी लड़कियों को सिर्फ़ सर ढकने के वजह से स्कूलों से निकाल दिया गया. सिर्फ़ सिर ढकने के कारण मुस्लिम लड़कियों को सरकारी संस्थानों में शिक्षा के अधिकार से वंचित किया जा रहा है.

अफगानिस्तान की महिलाओं की शिक्षा पर चिंता प्रकट करने वाले संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग को फ्रांस और भारत में हिजाबी लड़कियों को शिक्षा से वंचित किए जाने पर चुप्पी साधे देखना बेहद चिंताजनक है.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद फ़्रांस में महिलाओं को शिक्षा से दूर करने की सरकारी नीति पर क्यों ख़ामोश है?

आखिर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद भारत और फ्रांस में हिजाबी लड़कियों को शिक्षा से वंचित किए जाने के मामले पर पक्षपाती रवैया क्यों अपना रहा है? क्या हिजाबी लड़कियों के शिक्षा अधिकार की सुरक्षा उसी प्रकार नहीं की जानी चाहिए जिस प्रकार संयुक्त राष्ट्र अफगानिस्तान की महिलाओं के मामले में कर रहा है?

गौरतलब है कि फ्रांस विकसित और भारत विकासशील राष्ट्र की श्रेणी में आता है. अफगानिस्तान जैसे राष्ट्र को तो बाकी दुनिया द्वारा शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में यूं भी अविकसित ही माना जाता है.

ऐसे अविकसित राष्ट्रों में महिलाओं के साथ बाकी लोगों को भी शैक्षिक सुविधाएं न मिल पाने की बातें बाकी दुनिया से छिपी नहीं है. हालांकि वहां महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अवश्य उपयोगी क़दम उठाया जाना चाहिए.

लेकिन वे देश जो विकसित या विकासशील राष्ट्र होने के बावजूद अपने यहां अल्पसंख्यकों या महिलाओं के साथ भेदभाव करते हैं उन राष्ट्रों के इस जुर्म पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद को चुप्पी नहीं साधना चाहिए, बल्कि इसे एक गंभीर मामला मानते हुए ऐसे देशों का नाम उल्लेख करते हुऐ उन्हें सुझाव देने चाहिए.

FIFA ने हिजाब को लेकर अपने नियम बदले

हिजाब को अपनी यूनिफार्म में अपनाने वाले फीफा जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था से लेकर देश विदेश की कई शैक्षिक संस्थाओं में हिजाब किसी भी प्रकार के नियमों का उल्लंघन नहीं कर रहा है, केवल फ्रांस और भारत के कर्नाटक के इस्लामोफोबिक नेताओं को हिजाब से दिक्कत है.

हिजाब पहनने वाली महिलाएं हर क्षैत्र में सफल हो रही हैं वो सिर्फ़ उन्हीं क्षेत्रों में सफल नहीं हैं जहां समावेशी विरोधी नियम बनाकर हिजाब पर पाबंदी लगाई जा रही है.

हिजाब पहनने वाली लड़कियों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए फ्रांस का ताज़ा उदाहरण हमारे सामने है. भारत के कर्नाटक राज्य में पिछली सरकार ने नियम बनाकर उन्हें शिक्षा प्राप्त करने दूर रखा और भाजपा शासित अन्य राज्यों में ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं जहां हिजाब पहनने वाली छात्राओं को प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने से वंचित किया गया है.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद फ्रांस या भारत में हिजाब की अड़ में लड़कियों को शिक्षा से दूर करने के इन मामलों पर शातिराना चुप्पी साधे हुए है.

मुस्लिम महिलाओं को पहनावे/ ड्रेस को चुनने की आज़ादी क्यों नहीं?

एक तरफ जहां लिब्रल तबका लड़कियों और महिलाओं को कपड़े और पहनावे को चुनने की आज़ादी का घोर समर्थन करता है और उसके लिए सैकड़ों तर्क गढ़ता है, वहीं मुस्लिम लड़कियों, छात्राओं द्वारा हिजाब या सर ढकने के चुनाव की आज़ादी के समर्थन में यह वर्ग क्यों नहीं बोलता?

हम इसे वैश्विक विडंबना कहें या त्रासदी लेकिन मुस्लिम महिलाओं को कपड़ो को चुनने की आज़ादी से रोकने वाले वही लोग हैं जो खुद के लिए लिबरल, आधुनिक और नारीवादी होने का दावा करते हैं.

भारत हो या फ्रांस या बाकी दुनिया के हिजाब विरोधी लोग, इनमें से कोई भी हिजाब जैसे पहनावो पर स्वस्थ संवाद नहीं कर रहे हैं बल्कि सत्ता का दुरपयोग कर सीधे कानून बनाकर हिजाबी लड़कियों को शिक्षा के मूलभूत अधिकार से वंचित कर रहे हैं और ऐसा करने के बाद भी ये खुद को विकसित और विकासशील कहलवा रहे हैं.

यह एक विडंबना है कि खुद के लिए कपड़े चुनने की आज़ादी का अधिकार सुरक्षित रख हिजाबी लड़कियों का अधिकार छीन कर ये खुद को लिबरल, आधुनिक और नारीवादी कहलाते हैं.

शिक्षा के संस्थान हिजाब विरोधियों के, वहां चलने वाले सिलेबस और पाठ्यक्रम भी उनके अगर ये हिजाब विरोधी वाकई लोकतांत्रिक हैं तो फिर सिखाएं ये अपने संस्थानों में हिजाबी लड़कियों को कि हिजाब किस प्रकार मानवाधिकार विरोधी है.

हिजाबी लड़कियों का हिजाब ज़बरदस्ती उतरवाकर आप कैसा लोकतंत्र और लिब्रल समाज बना रहे हैं?

सभ्य समाज और लोकतन्त्र शैक्षिक संस्थाओं और वैचारिक मंचो का तरीका होता है कि वो विरोधी माने जा रहे विचार पर उस विचार को मानने वालों के साथ चर्चा करवाते हैं. लेकिन हिजाब के मामले में पूरी दुनिया में देखा जा रहा है कि बिना किसी भी स्वस्थ विर्मश के हिजाब का बहिष्कार किया जा रहा है.

हिजाब पर यदि कहीं चर्चा भी हो रही है तो उन सभी चर्चाओं में हिजाब विरोधी आपस में मिल बैठ कर संवाद कर रहे हैं, हिजाब पहनने वाली महिलाओं को तथाकथित लिबरल, आधुनिक और नारीवादी कहलाने वालो द्वारा इन चर्चाओं में कोई स्थान नहीं दिया जा रहा है.

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