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Wednesday, April 17, 2024
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न्याय की गुहार लगाता भारत का पीड़ित तबका

-फादर सेड्रिक प्रकाश एसजे

नई दिल्ली | भारत में एक बड़ा वर्ग लगातार न्याय के लिए गुहार लगा रहा है और इंसाफ पाने के लिए उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही है. न्याय की मांग करने वाले ये लोग समाज के विभिन्न वर्गों से आते हैं और विशेष रूप से उन समूहों से जो अभी भी शोषित और बहिष्कृत हैं. देश में न्याय के लिए उठने वाली आवाज़ आप को अन्दर तक हिला देने वाली हैं. कोई भी विवेकपूर्ण व्यक्ति इन आवाज़ों को अनसुना नहीं कर सकता हालांकि, ये दुखद सच्चाई यह है कि ये चीखें और आवाज़ें अनसुनी रह जाएंगी; जिन लोगों को इन पुकारों को सुनना और उनका जवाब देना चाहिए, उन्होंने अपने कानों को बंद कर लिया है और अपने दिलों को कठोर कर लिया है.

जुनैद और नासिर के लिए भी न्याय की आवाज़ उठ रही है. 16 फरवरी को हरियाणा के भिवानी जिले में हिंदुत्वा भीड़ द्वारा इन दो मुस्लिम पुरुषों का कथित रूप से अपहरण कर, पीट-पीटकर मार डाला गया और आग लगा दी गई. वे राजस्थान के भरतपुर के गोपालगढ़ गांव के रहने वाले थे. यह घटना उनके गांव से 100 किलोमीटर दूर हुई, हिंदुत्वा समूह के लोगों ने मृत मुस्लिम पुरुषों पर गौ तस्करी का आरोप लगाया था. जुनैद और नासिर को पिरूका के जंगलों से अगवा कर लिया गया था और भिवानी के बरवास गांव ले जाया गया, जहां उन्हें मार कर जला दिया गया.

जुनैद और नासिर के परिवार के सदस्यों ने भी यह कहा है कि उन्हें हिंदुत्वा संगठन बजरंग दल के सदस्यों ने मारा और इस विभत्स हत्याकांड के पीछे बजरंग दल के नेता मोनू मानेसर का हाथ है. हालांकि कुछ दूसरे लोगों को गिरफ्तार किया गया है, लेकिन सड़को पर उनके समर्थक उन्हें तुरंत रिहा करने और उनके जघन्य अपराध को उचित ठहराने की मांग कर रहे हैं.

न्याय के लिए दर-दर भटक रहे दर्शन सोलंकी! यह अठारह वर्षीय दलित छात्र मुंबई में आईआईटी में पढ़ रहा था. मूल रूप से अहमदाबाद के रहने वाले उनके पिता, रमेशभाई, प्लंबर के रूप में काम करते हैं और उनकी माँ तरलिकाबेन घरेलू कामगार के तौर पर काम करती हैं. 12 फरवरी को दर्शन ने आत्महत्या कर ली! उसने कोई सुसाइड नोट नहीं छोड़ा! हालाँकि, उनके अधिकांश साथी छात्र और दूसरे जो उन्हें जानते थे, यह बताया कि दर्शन को अपनी जातीय पृष्ठभूमि के कारण भेदभाव और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा. कई लोग इसे ‘संस्थागत हत्या’ मानते हैं. भारत के प्रमुख शैक्षणिक संस्थान में प्रवेश किए हुए उसे अभी तीन महीने ही हुए थे. दुर्भाग्य से, एक दलित छात्र की मौत पहला मामला नहीं है. ऐसे और भी मामले हैं.

आशाबेन (बदला हुआ नाम) न्याय के लिए गुहार लगा रही है! वह अभी भी नाबालिग है, झारखंड की 17 वर्षीय आदिवासी. उसे एक संपन्न दंपति द्वारा घरेलू कामगार के रुप में रखा गया था, जिन्होने उसके साथ पाँच महीने तक दुर्व्यवहार किया और उसे परेशान किया. उन्हें बचाए जाने पर, आशाबेन कहती हैं, “उन्होंने मुझे डंडों, रस्सी से मारा… उन्होंने मुझे लोहे के गर्म चिमटे से मारा और मेरे हाथ और होठों पर ब्लेड से निशान बनाए. वह (घर की मालकिन) माचिस की तीली जलाकर कागज़ जलाती और मुझे उससे मारती… एक बार उन्होंने मेरा गला घोंटने की कोशिश की और मुझे जान से मारने की धमकी दी, मुझे खाने के लिए केवल एक ही वक्त रात को भोजन दिया जाता था, चावल का एक छोटा कटोरा, और अक्सर बचा हुआ खाना खाना पड़ता था.”

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि, “बहुत दिनों से भूखा होने के कारण कूड़ेदान से खाना उठाकर खाती थी…अक्सर ड्राइंगरूम में फर्श पर सोना पड़ता था…बिना कपड़ों के. उन्होंने मेरे साथ लाए कपड़े फाड़ दिए. उसने मेरे कपड़े उतारे और मेरे गुप्तांग पर डंडे से वार किया.’ आज देश में लाखों आशाबेन हैं! उनके मालिक उनकी दौलत, हैसियत, ताक़तवरों से निकटता और किसी के प्रति जवाबदेही न होने की वजह से बच जाते हैं!”

2002 के गुजरात नरसंहार के पीड़ित, जीवित बचे लोग न्याय के लिए गुहार लगा रहे हैं! अब से कुछ ही दिनों में (27/28 फरवरी) गुजरात में उन त्रासद दिनों की एक और बरसी आ जायेगी! यह निस्संदेह, स्वतंत्र भारत का सबसे काला अध्याय था. पीड़ित-बचे हुए लोगों के लिए न्याय की अथक कोशिश करने वाले व्यक्तियों और समूहों का शुक्रिया. कुछ मामलों में न्याय दिया भी गया है. हालांकि, सच्चाई यह है लगातार कई सप्ताह तक गुजरात को घेरे रखने वाले उन जघन्य अपराधों में मिलीभगत के बावजूद, प्रत्यक्ष संलिप्तता साबित करने प्रामाणिक और निर्विवाद सबूतों के बावजूद दंगो के ज़िम्मेदार लोगों, मास्टरमाइंड, सरगनाओं को अभी भी सज़ा के दायरे में नहीं लाया गया है.

अभी भी कई आरोपी सड़कों पर बेखौफ घूम रहे हैं और चालाकी से खुद को प्रतिरक्षा के लबादे से ढक ले रहे हैं. क्या दुनिया कभी बिलकिस बानो, ज़किया जाफरी, रूपा मोदी और सैकड़ों अन्य लोगों की पीड़ा और आघात को भूल सकती है जो अपने प्रियजनों को खो चुके हैं? नाज़ी शासन के दौरान हुए होलोकास्ट जैसे 2002 के गुजरात नरसंहार मानव जाति की स्मृति में हमेशा के लिए अंकित हो गए हैं, यह हमेशा रडार पर रहेगा – जब तक कि न्याय के लिए पुकार सुन नहीं ली जाती.

बिलकिस बानो भी न्याय के लिए गुहार लगा रही है! हाँ, अपने लिए, अपने चाहने वालों के लिए और सभी महिलाओं के लिए जो एक बेरहम, क्रूर, पितृसत्तात्मक समाज के शिकार हुए हैं! आज वह इस अपमान को स्वीकार नहीं कर पा रही है कि उस विभत्स हिंसा के ग्यारह अपराधियों को जेल की सज़ा से छूट दे दी गई है और अब वे बेदाग घोषित कर दिये गए हैं.

बिल्किस बानो पीड़ा के साथ कहती हैं, “मेरे परिवार के चारों पुरुषों को बेरहमी से मार दिया गया. कई पुरुषों द्वारा महिलाओं को नग्न किया गया और बलात्कार किया गया था. उन्होंने मुझे पूरी तरह से जकड़ लिया था. उस वक्त मेरी 3 साल की बेटी सालेहा मेरी गोद में थी. उन्होंने उसे छीन लिया और अपनी पूरी ताकत से उसे हवा में फेंक दिया. जब उसका छोटा सा सिर चट्टानों पर फेंक के मारा गया तो मेरा दिल बदहवास हो गया. चार आदमियों ने मेरे हाथ-पैर पकड़ लिए और एक-एक करके उन्होंने मेरा बलात्कार किया. अपनी वासना पूरी करने पर उन्होंने मुझे लात-घूंसों से मारा और रॉड से मेरे सिर पर मारा. मुझे मरा हुआ समझकर उन्होंने मुझे झाड़ियों में फेंक दिया.”

बिलकिस ने आगे बताया कि, “चार-पांच घंटे के बाद मुझे होश आया. मैंने अपने शरीर को ढँकने के लिए कुछ चिथड़ों की तलाश की लेकिन मुझे कुछ नहीं मिला. मैंने बिना भोजन और पानी के एक पहाड़ी की चोटी पर डेढ़ दिन बिताया. मैं मौत के लिए तरसी. अंत में, मैं एक आदिवासी कॉलोनी खोजने में कामयाब हुई. वहां मैंने खुद को हिंदू बताकर शरण ली. जिन आदमियों ने हम पर हमला किया उन्होंने हमारे लिए गालियों का इस्तेमाल किया. ऐसी गालियां जिन्हें मैं इसे कभी नहीं दोहरा सकती.”

घटना का ज़िक्र करते हुए बिलकिस ने बताया, “मेरे सामने उन्होंने मेरी मां, बहन और 12 अन्य रिश्तेदारों को मार डाला. हमारे साथ रेप और हत्या करने के दौरान वे गालियां दे रहे थे. मैं उन्हें नहीं बता सकती थी कि मैं पांच महीने की गर्भवती हूं क्योंकि उनके पैर मेरे मुंह और गर्दन पर थे. मैं उन सभी लोगों को जानती हूं, जिन्होंने मेरे साथ रेप किया. हम उन्हें दूध बेचते आए हैं. वे हमारे ग्राहक थे. अगर उन्हें ज़रा भी शर्म होती तो वे मेरे साथ ऐसा नहीं करते. मैं उन्हें कैसे क्षमा कर सकती हूं?”

न्याय की गुहार लगाते प्रवासी मज़दूर! अनुमानित 400 मिलियन लोग भारत के अनौपचारिक क्षेत्र में कम दैनिक मज़दूरी पर और बिना किसी अनुबंध, पेंशन, सवेतनिक अवकाश, स्वास्थ्य लाभ और खराब कामकाजी परिस्थितियों के साथ काम करते हैं. उनमें से अधिकांश प्रवासी श्रमिक हैं; वे पूरे देश में फैले हुए हैं और विभिन्न भाषाएं बोलते हैं. प्रवासी श्रमिक आमतौर पर अपना बचाव नहीं कर सकते. जब वे दूसरे राज्य में जाते हैं तो वे स्थानीय भाषा नहीं बोलते हैं.

मज़दूरों के काम करने की परिस्थितियां अनुकूल या सुरक्षित हैं कि नहीं यह जांचने के लिए कोई भी परिसर का निरीक्षण नहीं करता है. वे मजदूर स्थानीय राज्य सरकार के रिकॉर्ड में भी नहीं हैं. वे लगभग अदृश्य हैं. 2020 में जब लॉकडाउन की घोषणा की गई थी तब पीड़ित प्रवासी श्रमिकों की न मिटने वाली छवियां हमेशा के लिए किसी की भी याद में बनी रहेंगी. इसके अलावा, कोविड महामारी के चरम पर, सरकार ने चार श्रम कानून पारित किए, जिनके बारे में ज़्यादा तर लोगों को लगता है कि वो कानून श्रमिकों के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं और नियोक्ताओं, विशेष रूप से कॉर्पोरेट क्षेत्र के पक्ष में हैं!

ईसाई न्याय के लिए गुहार लगा रहे हैं! इस छोटे से अल्पसंख्यक समुदाय के लिए जीवन इतना बुरा कभी नहीं रहा! लगातार भयंकर रूप से ईसाइयों पर हमला किया जाता है और उन्हें सताया जाता है, गिरजाघरों और पवित्र वस्तुओं को तोड़ा और अपवित्र किया जाता है, ईसाई पादरियों और प्रार्थना के लिए इकट्ठे हुए लोगों पर झूठे मुकदमे लगाए जाते हैं. 19 फरवरी को, 15,000 से अधिक ईसाई नई दिल्ली में जंतर मंतर पर एक प्रार्थनापूर्ण और शांतिपूर्ण विरोध के लिए एकत्रित हुए. एक के बाद एक वक्ताओ ने ईसाइयों को परेशान करने, डराने और हमला करने के लिए खुले तौर पर उकसाने के लिए मौजूदा शासन की आलोचना की.

विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और संघ परिवार की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) जैसे फासीवादी संगठनों को ईसाई संस्थानों पर हमला करने के लिए पूर्ण वैधता प्रदान की जाती है, वो यह चाहते हैं कि हिंदू देवी-देवताओं को ईसाई संस्थानों में स्थापित किया जाए और उनकी पूजा की जाए. ऐसी ही एक घटना 20 फरवरी को गुजरात के अमरेली के सेंट मैरी स्कूल में हुई! दिन भर गुंडों ने प्रधानाध्यापक, कर्मचारियों और छात्रों को परेशान किया. न तो सरकारी शिक्षा अधिकारी और न ही स्थानीय पुलिस गुंडों को कोई कार्यवाही करके रोकना उचित समझती है. कई अन्य मामले ऐसे हैं जब संघ परिवार से जुड़े संगठनों ने ‘जबरन धर्मांतरण’ जैसे झूठे आरोपों से ईसाइयों को डराया और धमकाया है.

अल्पसंख्यक न्याय के लिए आवाज़ लगा रहे हैं! ईसाईयों और बहुत बड़े पैमाने पर मुसलमानों की छवि राक्षस के रुप में बताकर बदनाम किया जाता है और उनके साथ भेदभाव किया जाता है. हाल के वर्षों में इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), नागरिकता का राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी), कश्मीर की विशेष संवैधानिक स्थिति के बारे में अनुच्छेद 370 और 35ए को निरस्त करना. कई राज्यों में तथाकथित ‘धर्मांतरण विरोधी’ कानून को पूरी तरह से देश में अल्पसंख्यकों को व्यवस्थित रुप से निशाना बनाने के लिए डिज़ाइन और निर्देशित किया गया है.

इसी प्रकार और भी बहुत से मामले हैं जैसे कि अल्पसंख्यक और अन्य कमज़ोर समूह क्या खाते, पहनते, देखते और पढ़ते हैं, यह बहुसंख्यक समुदाय के कई लोगों के लिए आपत्ति का विषय बन गया है. अल्पसंख्यकों की आजीविका खत्म की जा रही है; अल्पसंख्यक समुदाय के किसी व्यक्ति को सरकारी नौकरी नहीं दी जाती है – भले ही वह व्यक्ति आवश्यक योग्यता रखता हो. अल्पसंख्यकों के खिलाफ ज़हरीले नफरत भरे भाषण रोज़मर्रा का हिस्सा बन गए हैं. जो लोग ऐसे बयान देते हैं वे खुले आम ऐसा करते हैं- क्योंकि वे जानते हैं कि उनपर कोई कार्रवाई नहीं होगी.

न्याय की गुहार लगाते मतदाता! कर्नाटक विधानसभा चुनाव से पहले, हज़ारों योग्य मतदाताओं, मुख्य रूप से ईसाई और मुस्लिम मतदाताओं का नाम रहस्यमय तरीके से उनके नाम हटा दिए गए. यह न्याय का उपहास है. पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में भी चुनाव होने वाले हैं. हाल के लगभग हर चुनाव में देखा जा रहा है कि कैसे लोगों के वास्तविक मुद्दों: उनकी आजीविका, रोज़गार के अवसर, खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण न्याय और आवास को दरकिनार कर दिया जाता है और धार्मिक, संप्रदाय और जाति के मुद्दों पर चालाकी से उनका ध्रुवीकरण किया जाता है.

मतदाताओं को किसी खास पार्टी/उम्मीदवार को वोट देने के लिए मजबूर किया जाता है या धमकी दी जाती है. गुजरात में हाल के चुनाव लोकतंत्र के नाम पर महज़ एक दिखावा थे, सत्तारूढ़ शासन के माफिया ने चुनाव से पहले कई मतदाताओं से वोटिंग आईडी (ईपीआईसी) छीन लिए और उनके वोटों का इस्तेमाल किया. कुछ को ऐसा करने के लिए या किसी विशेष उम्मीदवार/पार्टी को वोट देने के लिए पैसे दिए गए थे. गोमांस और शराब और अन्य ‘उपहार’ खुलेआम बांटें गए. चुनिंदा ईवीएम में चुनाव से पहले और बाद में भी छेड़छाड़ की गई.

मानवाधिकार रक्षक न्याय के लिए लड़ रहे हैं! उन लोगों का शुक्रिया जिन्होंने गरीबों, शोषितों और समाज के अन्य कमज़ोर वर्गों के लिए अपने बेख़ौफ़ बाहर निकलने का साहस पैदा किया है – वास्तविकता अभी भी बाहर आनी बाकी है. कई मानवाधिकार रक्षक अभी भी अपने साहसी और निस्वार्थ कार्यों की कीमत चुका रहे हैं. भीमा-कोरेगांव साज़िश मामले में वर्नोन गोंज़ाल्विस, अरुण फरेरा और दूसरे लोग अभी भी जेल में बंद हैं. फादर स्टेन स्वामी, जिनकी 5 जुलाई 2021 को संस्थागत रूप से हत्या कर दी गई थी उन की बेगुनाही साबित करने का संघर्ष अभी भी जारी है. तीस्ता सीतलवाड़, आर.बी. श्रीकुमार और संजीव भट्ट को परेशान किया गया और उन पर मनगढ़ंत मामले थोपे गए हैं. यह उनके लिए और उनके परिवारों के लिए आसान नहीं है, न्याय का पहिया वास्तव में बेहद धीमी गति से चलता है. हालांकि, वे दृढ़ हैं, न्याय के लिए बिल्कुल आखिरी दम तक लड़ने के लिए दृढ़ हैं!

इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ें : INDIA CRIES FOR JUSTICE

प्रेस की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति न्याय की मांग कर रही है! ‘गोदी’ मीडिया के प्रभुत्व वाले देश में, सत्ता से सच बोलना मुश्किल है! 2 फरवरी को, पत्रकार सिद्दीक कप्पन को जेल में 846 दिन (28 महीने) बिताने के बाद ज़मानत पर रिहा कर दिया गया था. लखनऊ जेल से रिहा होने पर कप्पन ने मीडिया से कहा कि उन्हें नहीं पता कि उन्हें एक मामले में गलत तरीके से क्यों फंसाया गया और जेल क्यों भेजा गया. हालांकि, वह यूपी के हाथरस जा रहे थे, जहां सत्तारूढ़ शासन से संबंधित दबंग लोगों ने एक दलित लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया था.

कोई भी मीडिया हाउस (चाहे वह प्रिंट हो या इलेक्ट्रॉनिक), अगर वह सरकार से लोहा लेता है- तो उसे सरकारी विज्ञापनों (राजस्व) से वंचित कर दिया जाता है और ईडी, सीबीआई, आयकर, एनआईए और अन्य वैधानिक निकाय पर छापे मार रहे हैं और उन पर कठिनाइयां पैदा कर रहे हैं. हाल ही में मुंबई और दिल्ली में बीबीसी के दफ्तरों पर छापे इसका एक बेहतरीन उदाहरण हैं.

एक स्वतंत्र प्रेस लोकतंत्र में एक अनिवार्य शर्त है, विश्व के नेताओं और सरकारों ने इस मुद्दे पर भारत को आड़े हाथों लिया है. इसके अलावा, मोदी पर बीबीसी की फिल्म पर प्रतिबंध लगाना- जो शोध के बाद सटीक, प्रामाणिक और उद्देश्यपूर्ण है, स्पष्ट रूप से इस बात का एक उदाहरण है कि सरकार बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटना चाहती है. एक फासीवादी शासन का एक क्रूर रवैया जो सच्चाई का सामना करने के लिए बहुत डरा हुआ है!

आज भारत न्याय के लिए कराह रहा है! जुनैद और नासिर, दर्शन और आशाबेन, 2002 के गुजरात नरसंहार के पीड़ित- बिलकिस बानो, रूपा मोदी और जखिया जाफरी, प्रवासी और मज़दूर, अल्पसंख्यक- मुस्लिम, ईसाई और अन्य, मानवाधिकार रक्षक- वर्नोन, अरुण, तीस्ता, श्रीकुमार, संजीव और कई अन्य; मतदाता और भी बहुत से लोग लोग जो बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास करते हैं न्याय की गुहार लगा रहे हैं. केरल के मछुआरे, मेगा प्रोजेक्ट करने वाले और खनन माफिया विस्थापित हो गए हैं और पर्यावरण के बारे में चिंतित हैं; LGBTQIA समुदाय, छोटे किसान और छोटे निवेशक जो एक भ्रष्ट शासन का शिकार हो गए हैं, जिसे अडानी जैसे साठगांठ वाले पूंजीपतियों ने अपहरण कर लिया है. कई और हैं; सूची अंतहीन है! मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने एक बार कहा था- “अन्याय चाहे कहीं पर भी हो वो हर जगह न्याय के लिए खतरा है.”

आज भारत में अन्याय सर्वव्यापी है! जब तक समाज के हर वर्ग के लिए न्याय का उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता और उसे वास्तविक नहीं बनाया जाता, तब तक न्याय की पुकार तेज़ होती रहेगी!

लेकिन क्या कोई इसे सुन रहा है?

(फादर सेड्रिक प्रकाश एसजे एक मानवाधिकार कार्यकर्ता और लेखक हैं। संपर्क: [email protected])

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