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Monday, July 15, 2024
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बिहार सरकार आरक्षण कोटा मामले में पटना हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में देगी चुनौती

सैयद ख़लीक अहमद

नई दिल्ली | बिहार में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों के लिए कोटा में बढ़ोतरी की मांग को भले ही पटना उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया हो, लेकिन इस मुद्दे को कई हलकों से समर्थन मिला है.

राज्य भाजपा प्रमुख और वर्तमान में बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने नीतीश सरकार द्वारा एससी, एसटी और बीसी के लिए निर्धारित 65 प्रतिशत कोटा को पटना हाईकोर्ट द्वारा रद्द करने के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की घोषणा की है.

नवंबर 2023 में जब नीतीश कुमार लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद के समर्थन से राज्य सरकार चला रहे थे और उनके बेटे तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री थे उस वक्त बिहार सरकार द्वारा आरक्षण कानूनों में संशोधन किया गया था.

संशोधित कानून में एससी, एसटी और बी.सी. के लिए आरक्षण 65 प्रतिशत तय किया गया था, जोकि 1992 में इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित किए गए 50 प्रतिशत कोटा से अधिक है.

नीतीश सरकार द्वारा कराए गए जाति सर्वेक्षण के आधार पर कोटा 50 फीसदी से बढ़ाकर 65 फीसदी किया गया.

जाति आधारित सर्वेक्षण रिपोर्ट से पता चला है कि बिहार की आबादी में पिछड़े समुदायों की हिस्सेदारी 63 प्रतिशत है, एससी की आबादी 19.65 प्रतिशत है और सामान्य वर्ग में आने वाली ऊंची जातियों की आबादी 15.52 प्रतिशत है. ऊंची जाति या सामान्य वर्ग की आबादी में पांच प्रतिशत ऊंची जाति के मुसलमान शामिल भी हैं. एक अलग वर्ग के रूप में मुसलमान समुदाय ली की आबादी में 17.70 प्रतिशत की हिस्सेदारी है.

इसलिए, दशकों से पिछड़े समुदायों के साथ हुए अन्याय को ख़त्म करने के लिए नीतीश सरकार ने कोटा बढ़ाने के मुद्दे पर आगे कदम बढ़ाया. सरकारी विभागों और शैक्षणिक संस्थानों में पिछड़े समुदायों का प्रतिनिधित्व उनकी आबादी के अनुपात में बहुत कम है.

हालांकि, नीतीश सरकार के इस कदम की भाजपा और विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कड़ी आलोचना की थी. इन्होंने जाति आधारित सर्वेक्षण को “समाज को विभाजित करने वाला गुनाह ” करार दिया था.

कई बीजेपी नेता तो सार्वजनिक तौर पर हर स्तर पर आरक्षण को पूरी तरह ख़त्म करने की मांग कर चुके हैं. यही कारण है कि दलित और पिछड़े वर्ग, जिन्होंने पहले 2014 और 2019 के आम चुनावों में भाजपा का भरपूर समर्थन किया था, वह सभी वर्ग 2024 के लोकसभा चुनावों में काफी हद तक भाजपा के खिलाफ हो गए.

सबको हैरान करते हुए पटना उच्च न्यायालय द्वारा आरक्षण कोटा वृद्धि के दावे को रद्द कर दिए जाने के बाद, राज्य भाजपा प्रमुख और उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने गुरुवार को घोषणा की कि राज्य सरकार इस आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देगी. 2024 में जब नीतीश कुमार ने राजद से नाता तोड़ लिया था और राज्य में सत्ता में बने रहने के लिए भाजपा का समर्थन लिया तब सम्राट चौधरी उपमुख्यमंत्री बने थे.

सम्राट चौधरी ने पटना में मीडियाकर्मियों से कहा कि “बिहार सरकार कानूनी राय लेने के बाद पटना उच्च न्यायालय के आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देगी. बिहार में पिछड़े समुदायों, दलितों और आदिवासियों के लिए आरक्षण बढ़ना चाहिए.”

सम्राट चौधरी ने दावा किया कि बिहार में आरक्षण कानूनों में संविधान के प्रावधानों के अनुसार संशोधन किया गया है. उन्होंने कहा कि तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक होने का उदाहरण मिलता है, वहां 69 प्रतिशत आरक्षण है. सम्राट चौधरी खुद ओबीसी समुदाय की कोइरी जाति से आते हैं. वह अच्छे खासे अरसे से बिहार में बीजेपी का ओबीसी चेहरा रहे हैं.

यह सिर्फ बिहार राज्य सरकार का मामला नहीं है जिसने आरक्षण कोटा बढ़ाने की मांग की है. कई राज्यों में ऐसे अलग अलग समुदाय जिन्हें ये लगता है कि सदियों से उनके साथ अन्याय होता रहा है, उन समुदायों की मांगों के आधार पर कई अन्य राज्य सरकारों ने आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन करने वाले कानून पारित किए हैं.

आरक्षण कोटा 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ाने का कानून पारित करने वाले राज्यों में तेलंगाना, हरियाणा, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र शामिल हैं. लेकिन इन कानूनों पर या तो रोक लगा दी गई है या फिर सुप्रीम कोर्ट या संबंधित उच्च न्यायालयों में कानूनी लड़ाई का सामना करना पड़ रहा है.

इस मामले में तमिलनाडु राज्य अपवाद है, जहां कोटा 50 प्रतिशत की सीमा से अधिक हो चुका है. 1992 के इंदिरा साहनी मामले के बाद संविधान में संशोधन करके तमिलनाडु के 1993 के संशोधित आरक्षण कानूनों को नौवीं अनुसूची में रखा गया था.

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