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Monday, July 15, 2024
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क्या अंग्रेज़ी अख़बार और मुख्यधारा मीडिया के ‘साक्षात्कार’ भाजपा के पक्ष में माहौल बना रहे?

-सैयद ख़लीक अहमद

नई दिल्ली | लोकसभा चुनावों के छठे चरण (25 मई) के समापन के बाद, दिल्ली और देशभर के मुख्यधारा के विभिन्न समाचार पत्र और न्यूज़ पोर्टल ने सोमवार को भाजपा अध्यक्ष और अन्य वरिष्ठ भाजपा नेताओं के साक्षात्कार लिऐ हैं. बीजेपी नेताओं के साक्षात्कार प्रकाशित करने वाले प्रमुख अखबारों में द इंडियन एक्सप्रेस, द टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स जैसे बड़े समाचार पत्र समूह शामिल हैं. अगले कुछ दिनों में अन्य राष्ट्रीय और महत्वपूर्ण क्षेत्रीय समाचार पत्र भी मुख्यधारा के समाचार पत्रों की तरह ऐसा कर सकते हैं.

गौर करने वाली बात है कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी या इंडिया गठबंधन के किसी अन्य नेता का कोई भी
साक्षात्कार नहीं लिया गया है, जैसे कि विपक्षी दल के नेता भारत की मुख्यधारा मीडिया के लिए कोई मायने ही नहीं रखते.

इन सभी साक्षात्कारों में समान विषयवस्तु यह है कि 25 मई को समाप्त हुए छठे चरण के अंत में भाजपा 300 से अधिक सीटें जीतने के लिए तैयार है और नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार प्रधान मंत्री बनेंगे. सातवें चरण में बीजेपी और उसके सहयोगियों को जो सीटें मिलेंगी वो तो अतिरिक्त सीटें होंगी.

इन सभी साक्षात्कारों में एक और सामान्य निष्कर्ष यह भी शामिल है कि भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार सही ट्रैक पर है. ऐसा लगता है कि यह तीनों अख़बार जो कर रहे हैं वह नतीजे आने से पहले ही भाजपा के पक्ष में माहौल बनाना है.

वैसे तो मीडिया घरानों द्वारा भाजपा नेताओं के साक्षात्कार लेने और उनके बयान प्रकाशित करने में कुछ भी गलत नहीं है लेकिन इस पूरे प्रकरण में ग़लत बात यह है कि उन्होंने विपक्षी नेताओं को इस तरह नज़रअंदाज़ कर दिया जैसे कि विपक्ष का कोई अस्तित्व ही नहीं है और केवल भाजपा ही चुनावी मैदान में है.

अखबार अपने पाठकों पर केवल एक ही पक्ष की खबरें थोप रहे हैं और वो पक्ष है “भाजपा 2024 के लोकसभा चुनावों में विजेता के रूप में जीत दर्ज कर रही है और मोदी फिर से प्रधान मंत्री होंगे.”

इन सभी साक्षात्कारों पर गौर करने से पता चलता है कि साक्षात्कार लेने वालों के प्रश्न बहुत सामान्य थे या फिर जैसे पार्टी और इसके नेताओं द्वारा तय किए गए हो. किसी ने भी गृह मंत्री अमित शाह से 19 अप्रैल के बाद से बीजेपी के चुनावी भाषणों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस्तेमाल की गई सांप्रदायिक और ध्रुवीकरण वाली भाषा के बारे में सवाल नहीं किया.

हैरत की बात यह है कि इंडियन एक्सप्रेस ने भी ऐसा सवाल नहीं किया, जो अख़बार सत्ता की आलोचना के लिए ही जाना जाता है. कांग्रेस नेता जयराम रमेश के अनुसार, पीएम मोदी का 19 अप्रैल का हुआ चुनावी अभियान हिंदू-मुस्लिम को बांटने और “साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण” करने पर आधारित था. मोदी के इन भाषणों में किसानों, युवाओं, महिला श्रमिकों, एससी, एसटी और ओबीसी के मुद्दों पर कोई बात नहीं की गई.

हालाँकि, इंडियन एक्सप्रेस के मुख्य संपादक राज कमल झा और राजनीतिक टिप्पणीकार नीरजा चौधरी ने भाजपा के सत्ता में आने पर संविधान को बदलने, दलितों, आदिवासियों और ओबीसी के लिए आरक्षण नीति को ख़त्म करने की भाजपा की योजनाओं पर शाह को घेरने का साहस जुटाया. उन्होंने राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी के संबंध में शाह से कई अप्रिय सवाल भी पूछे.

शाह ने साक्षात्कार का इस्तेमाल राहुल गांधी पर देश में राजनीतिक विमर्श को ख़राब करने का आरोप लगाने के लिए किया, लेकिन दोनों साक्षात्कार लेने वालों ने शाह से इस पर कोई प्रश्न नहीं किया कि कैसे कई भाजपा नेताओं ने इन चुनावों में ऐसी भाषाओं का इस्तेमाल किया जिनका भारत के इतिहास में अब तक सार्वजनिक विमर्श में कभी इस्तेमाल नहीं किया गया.

बिहार में तो मोदी ने अपने चुनावी भाषण में यह धमकी तक दे डाली थी कि चुनाव के बाद बिहार के पूर्व उप-मुख्यमंत्री और राजद नेता तेजस्वी यादव को गिरफ्तार कर लिया जाएगा. राजस्थान में एक रैली में पीएम ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि देश की संपत्ति ज़्यादा बच्चे पैदा करने वाले लोगों को बांट दी जाएगी. “ज़्यादा बच्चे पैदा करने वाले” यह संदर्भ आमतौर पर मुसलमानों को बदनाम करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

क्या ये सभी साक्षात्कार भाजपा को बढ़ावा देने और उसका विज्ञापन करने के लिए प्रकाशित किए गए? कई मीडिया विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा ने मुख्यधारा मीडिया को अपने नियंत्रण में कर लिया है और अपने लक्ष्यों को किसी भी तरह से हासिल करने के लिए “साम, दाम, दंड, भेद” की प्राचीन भारतीय रणनीति का उपयोग करके मीडिया को अपने अनुरुप कर लिया है.

कठिन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में भी साम, दाम, दण्ड, भेद की यही रणनीति लागू की जाती है और इसे काफी वैध माना जाता है. “साम” का अर्थ है किसी के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए संवाद कर समझाने की रणनीति अपनाना, “दाम” में लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहन या लालच का उपयोग किया जाता है, “दंड” में बल, धमकी का उपयोग करके काम करवाया जाता है और “भेद” प्रतिद्वंद्वी समूहों के बीच विभाजन और मतभेद पैदा करने या विरोधी की कमज़ोरी का इस्तेमाल की रणनीति है.

अतः भाजपा अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए मीडिया पर दबाव बनाए हुए है, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है. बीबीसी के जिल मैकगिवरिंग को दिए एक साक्षात्कार में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी ने कहा था कि, “एक क्षेत्र जहां मैं बहुत कमज़ोर रहा हूं, और वह था मीडिया को संभालना.” जिल मैकगिवरिंग ने अपनी डॉक्यूमेंट्री इंडिया: द मोदी क्वेश्चन में इसका ज़िक्र किया है.

चूंकि मीडिया घराने कमाई के लिए और अपने मीडिया संस्थान चलाने के लिए विज्ञापनों पर निर्भर हैं, इसलिए सरकार के लिए इन मीडिया समूहों को अपनी बात मनवाने के लिए मजबूर करना आसान है क्योंकि सरकार सबसे बड़ी विज्ञापनदाता और राजस्व का स्रोत है.

सरकार कॉरपोरेट घरानों पर कुछ खास अखबारों को विज्ञापन न देने का दबाव भी बना सकती है. इसलिए, सरकार द्वारा अलग अलग बहाने लगाकर विज्ञापन जारी करने पर रोक लगाने से किसी अखबार या प्रकाशन को राजस्व की कमी हो सकती है.

अधिकांश समाचार पत्र और मीडिया घराने व्यावसायिक उद्यम बन गए हैं और लोगों तक सच पहुंचाने का मिशन खो चुके हैं. मीडिया मालिकों की रुचि पैसा कमाने में है और इसलिए वे आसानी से सरकार की मांगों के आगे झुक जाते हैं. तीन प्रमुख अंग्रेजी भाषा के दैनिक समाचार पत्रों के साक्षात्कारों से यह बात काफी हद तक समझ में आती है.

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