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Sunday, June 23, 2024
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लोकसभा चुनाव: राजनीतिक दलों के घोषणापत्र में मुसलमानों के बुनियादी मुद्दों का अभाव

इंडिया टुमारो

नई दिल्ली | लोकसभा चुनाव-2024 के लिए राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणापत्रों के तुलनात्मक विश्लेषण से पता चलता है कि ऐसे मुद्दों को समझने और उन्हें स्थान देने में पार्टी नेताओं की स्पष्ट दृष्टि, विज़न और रोडमैप की कमी है जो विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय की आशाओं और सपनों को पूरा करता हो.

यह विश्लेषण – लोकसभा चुनाव 2024 के लिए राजनीतिक दलों के घोषणापत्र और भारतीय मुस्लिम – विषय पर आयोजित चर्चा में डायलॉग4चेंज के संस्थापक मोहम्मद इनाम द्वारा प्रस्तुत किया गया है.

मोहम्मद इनाम, भारतीय मुसलमानों की राजनीतिक स्थिति पर प्रकाश डालते हैं और चर्चा करते हैं कि उनके लिए आगे का मार्ग क्या होगा. इनाम ने 18 मई को जमात-ए-इस्लामी हिंद मुख्यालय में इस विषय पर विस्तार से बात की.

उनका विचार है कि भारत में मुस्लिम राजनीति की सबसे बड़ी समस्या स्पष्ट राजनीतिक दृष्टिकोण की कमी है जबकि “सांप्रदायिक ताकतें मुसलमानों को अलग-थलग करना चाहती हैं”.

वक्ता ने सुझाव दिया है कि मुसलमानों को पूरी ताकत से मुख्यधारा में बने रहने की कोशिश करने की ज़रूरत है.

इनाम ने कहा कि, मुस्लिम समुदाय बहुत लंबे समय से व्यवस्थित भेदभाव, आर्थिक अभाव और बहिष्कार का शिकार रहा है, जिससे उन्हें गरीबी के निम्न स्तर पर रखा गया है.

उन्होंने आगे कहा कि घोषणापत्र राजनीतिक दलों की समावेशिता और सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता का लिटमस टेस्ट है.

मोहम्मद इनाम के इस विश्लेषण में दावा किया गया है कि मुस्लिम समुदाय देश के 125 से अधिक जिलों के 720 विधानसभा क्षेत्रों और 150 से अधिक लोकसभा क्षेत्रों में मज़बूती के साथ ज़मीनी स्तर पर मौजूद है.

हालांकि, कठोर वास्तविकता यह है कि मुसलमानों की महत्वपूर्ण उपस्थिति के बावजूद, “भारत में मुसलमानों ने कभी भी आबादी के अपने हिस्से के अनुपात में अन्य धार्मिक समूहों की तरह लोकतंत्र का लाभ नहीं उठाया है(उनके लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व, सरकारी रोजगार में हिस्सेदारी और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में शामिल होने के संदर्भ में).”

अध्यन में कहा गया है कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर चुप रहती है. “ऐसा लगता है कि ‘सबका साथ, सबका विकास’ की व्यापक दृष्टि मुसलमानों के कल्याण और विकास के मुद्दों पर गंभीरता से काम करेगी. हालाँकि, अल्पसंख्यकों के लिए कोई विशेष पहल उन्हें रास नहीं आती है.”

मोहम्मद इनाम उन पार्टियों के घोषणापत्रों पर विस्तार से चर्चा करते हैं जो धर्मनिरपेक्षता में विश्वास करने का दावा करती हैं लेकिन वे “वास्तव में समावेशी विकास के लिए एक पूर्ण दृष्टिकोण प्रदान नहीं करती हैं.”

उनका कहना है कि कभी-कभी धर्मनिरपेक्ष पार्टियां भी प्रतिक्रिया के डर से मुसलमानों का खुलकर समर्थन करने से झिझकती हैं. “इससे मुसलमान मुख्यधारा की राजनीति से और भी अधिक बहिष्कृत महसूस करते हैं.”

उन्होंने मुस्लिम समुदाय के लिए पार्टियों के घोषणापत्रों में क्या नहीं या किन मुद्दों की कमी है इसकी एक सूची तैयार की है. उनका कहना है कि हालांकि घोषणापत्र सामान्य सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर तो बात करते हैं, लेकिन वे मुसलमानों के लिए समग्र विकास को लेकर कोई ठोस योजना पेश नहीं करते हैं.

इस अध्यन के मुताबिक, पार्टियों के घोषणापत्रों में दीर्घकालिक योजनाएं नदारद हैं, जो मुस्लिम समुदाय के सतत विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं. यह अध्यन घोषणापत्रों में विशिष्ट समय सीमा की कमी की ओर इशारा करता है. इसमें कहा गया है, “समय सीमा के बिना, प्रगति को मापना और नेताओं को जवाबदेह ठहराना कठिन है.”

अपने विषय पर चर्चा करते हुए मोहम्मद इनाम कहते हैं, “मुसलमानों द्वारा सामना की जाने वाली सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को दूर करने के लिए सकारात्मक कार्रवाई महत्वपूर्ण है. दुर्भाग्य से, घोषणापत्रों में इस संबंध में मज़बूत योजनाएं शामिल नहीं हैं.”

उनका सुझाव है कि शिक्षा, रोज़गार और अन्य क्षेत्रों में समान स्तर के लिए सकारात्मक कार्रवाई की आवश्यकता है.

उनका कहना है कि मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधित्व और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में उनके शामिल होने के लिए राजनीतिक भागीदारी आवश्यक है.

इनाम कहते हैं, “हालांकि, घोषणापत्र यह बताने में विफल रहे हैं कि वे राजनीतिक और प्रशासनिक भूमिकाओं में मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व कैसे बढ़ाएंगे.”

इस अध्यन में कहा गया है कि कई मुस्लिम-बहुल क्षेत्र उपेक्षा से पीड़ित हैं और उनमें बुनियादी सुविधाओं और बुनियादी ढांचे की कमी है, लेकिन “घोषणापत्र इन अन्यायों को संबोधित नहीं करते हैं, जिससे ये समुदाय पीछे रह जाते हैं.”

इसके अनुसार, “इन क्षेत्रों में समान विकास सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हस्तक्षेप और निवेश”, जीवन की गुणवत्ता और विकास के अवसरों में सुधार की आवश्यकता है.

यह अध्यन राजनीतिक प्रक्रिया से मुसलमानों के अदृश्य होने पर भी चर्चा करता है. इसमें कहा गया है कि मुसलमानों को राजनीतिक पहल और चुनावी अभियानों से बाहर रखा जा रहा है. “इसका मतलब है कि उनकी आवाज़ें नहीं सुनी जाती हैं और उनके मुद्दों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में संबोधित नहीं किया जाता है.”

इस विशलेषण में कहा गया है कि मुस्लिम जाति की पहचान का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए किया जा रहा है. “मुसलमानों को एक साथ लाने के बजाय, यह उन्हें विभाजित करता है और उनके लिए सामान्य लक्ष्यों की दिशा में काम करना कठिन बना देता है.”

इस अध्यन से पता चलता है कि, मुस्लिम समुदाय को यह एहसास है कि राजनेता उन्हें हल्के में लेते हैं और अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए उनकी ज़रूरतों को नज़रअंदाज कर दिया जाता है.

मोहम्मद इनाम का कहना है कि राजनेताओं को मुस्लिम विरोधी बयानबाजी करते देखना परेशान करने वाला है जो केवल मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव को बढ़ाता है और उन्हें अधिक असुरक्षित महसूस कराता है.

अपने संबोधन में वह भारतीय मुसलमानों को सशक्त बनाने का सुझाव देते हैं क्योंकि “यह केवल नैतिक रूप से ही सही काम नहीं है; यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है.”

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