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Sunday, March 3, 2024
Home देश आज़मगढ़ : महापुरुषों, बुद्धजीवियों, कवियों और स्वतंत्रता सेनानियों की ऐतिहासिक भूमि

आज़मगढ़ : महापुरुषों, बुद्धजीवियों, कवियों और स्वतंत्रता सेनानियों की ऐतिहासिक भूमि

-मुहम्मद असदुल्लाह आज़मी

नई दिल्ली | कोई भी शहर अपने इतिहास, अपनी संस्कृति, अपने भौगोलिक स्थिति, अपनी ख़ास पहचान या अपने योगदान के लिए जाना जाता है. ऐसे शहरों में बसने वाले निवासी देश और दुनिया में कहीं भी गर्व के साथ शहरों से अपने जुड़ाव का हवाला देते हैं. ऐसे शहर किसी भी देश या समाज के लिए किसी धरोहर से कम नहीं होते हैं.

उत्तर प्रदेश का आज़मगढ़ भी एक ऐतिहासिक शहर है जहां कई महान हस्तियों ने जन्म लिया, जिन्होंने देश और दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई और इस शहर को विश्व पटल पर अलग पहचान दी- चाहे वह बुद्धजीवी हों, स्वतंत्रता सेनानी हों, साहित्यकार हों, कवि हों, शायर हों, नेता -अभिनेता हों या फिल्म जगत से जुड़ी हुई हस्तियां हों.

महाकवि और साहित्यकार राहुल संस्कृतायन, मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी, इकबाल सुहेल, महाकवि हरि औंध सिंह उपाध्याय, महान शिक्षाविद अल्लामा शिबली नोमानी, महान दार्शनिक व विश्व विख्यात धर्मगुरु हमीदुद्दीन फ़राही मौलाना अमीन अहसन इस्लाही, महान लीडर और वक्ता मौलाना अबुल लैस नदवी जैसे अनगिनत अनमोल मोती जिस सर ज़मीन पर जन्म लिए उस सरजमीं का परिचय कराते हुए मशहूर शायर व राजनीतिज्ञ इकबाल सुहेल ने अपने दो पंक्तियों में कुछ इस तरह बयां किया है:

“इस खित्त-ए-आज़मगढ़ पे मगर फैज़ाने तजल्ली है यक्सर
जो ज़र्रा यहां से उठता है वो नय्यर – ए – आज़म होता है।”

क्या है आज़मगढ़ का इतिहास?

आज़मगढ़ की स्थापना शाहजहां के शासनकाल के दौरान 1665 में विक्रमजीत के बेटे आज़म ने की थी. विक्रमाजीत, परगना निज़ामाबाद में मेहनगर के गौतम राजपूतों के वंशज थे जिन्होंने अपने कुछ पूर्ववर्तियों की तरह इस्लाम अपनाया था.

उत्तर प्रदेश का ज़िला आज़मगढ़ जिसे राजा आज़मशाह ने 1665 में बसाया था 16 वी सदी में मुगल बादशाह जहांगीर की हुकूमत के दौरान 1594 में युसूफ ख़ान को जौनपुर का सूबेदार बनाया गया तब यह इलाका जौनपुर सूबे का हिस्सा था. अभिमन्यु सिंह जहांगीर की फौज में सिपासालार थे. उन दिनों जौनपुर सूबे के पूर्वी हिस्से में बगावत का शुरू हुई. बादशाह जहांगीर ने बगावत को कुचलने और इस इलाके पर अपनी पकड़ को मज़बूत बनाने के लिए यह ज़िम्मेदारी सिपहसालार अभिमन्यु सिंह को दी.

अभिमन्यु सिंह ने अपनी बहादुरी का परिचय देते हुए इलाके में बगावत को ख़त्म कर शांति स्थापित कर दी जिससे बादशाह जहांगीर ने खुश होकर यह इलाका अभिमन्यु सिंह को जागीर के तौर पर दे दिया. आगे चलकर अभिमन्यु सिंह ने इस्लाम धर्म को अपना लिया जिसके बाद उनका नाम दौलत इब्राहिम खान हो गया.

इब्राहिम ख़ान की कोई औलाद नहीं थी जिसकी वजह से उन्होंने अपने भतीजे हरिवंश सिंह को अपना उत्तराधिकारी बनाया. हरिवंश सिंह इस इलाके पर 20 सालों तक राज करते रहे. आगे चलकर हरिवंश सिंह ने भी अपना धर्म तब्दील करते हुए इस्लाम अपना लिया. उनके बेटे विक्रमजीत सिंह भी आगे चलकर मुसलमान हो गए.

विक्रमजीत सिंह के दो बेटे हुए जिनका नाम आज़मशाह और अज़मतशाह था. आज़मशाह ने शाहजहां के शासनकाल में 1665 में फुलवरिया नामक एक प्राचीन गांव के स्थान पर आज़मगढ़ की स्थापना की. समय के साथ आगे चलकर अंग्रेज़ी हुकूमत ने 1832 में इसे जिला घोषित कर दिया गया.

स्वतंत्रता संग्राम में आज़मगढ़:

आज़मगढ़ प्रतिभा संपन्न होने के साथ-साथ अपनी वीरता और संघर्ष के लिए भी जाना जाता है. आज़ादी की लड़ाई में भी आगे-आगे रहा आज़मगढ़ के नाम देश में सबसे पहले अंग्रेजों से आज़ाद होने का रिकॉर्ड दर्ज है. आज़मगढ़ अंग्रेजों की गुलामी से 81 दिन तक आज़ाद रहा, हालांकि इसके बाद अंग्रेजों ने इस पर दोबारा कब्ज़ा कर लिया.

1857 की क्रांति 10 मई को मेरठ से शुरू हुई लेकिन आज़मगढ़ में इसका असर 3 जून को दिखाई दिया जिसे आज़मगढ़ के लोगों ने एक नई धार प्रदान की.

बड़े अफसोस की बात है कि आजमगढ़ जैसी अजीम सरजमी को बटला हाउस कांड के बहाने दूषित मंसिकता के लोगों द्वारा मीडिया के ज़रिय “आतंक की नर्सरी” के नाम से बदनाम करने की नापाक कोशिश की गई पूरे जिले में भय का माहौल पैदा किया गया.

स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका निभाने वाले आज़मगढ़ को आतंक से जोड़ा गया :

पिछले दो दशक ने आज़मगढ़ को निशाना बनाने के कई दुस्साहस किए गए. ज़िले के पढ़े-लिखे नौजवानों को चिंहित् कर आतंक के नाम पर उठाया और फँसाया गया, स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले आज़मगढ़ को आतंक से जोड़ा गया, इसे आतंक की नर्सरी तक कहा गया.

हालांकि, आज़मगढ़ को “आतंक की नर्सरी” का नाम देने वाले शायद यह भूल गए की आज़मगढ़ के शिक्षा का दीप पूरी दुनिया में रौशनी बिखेर रहा है. इस शिक्षा के दीपक को जलाने वाले महान शिक्षाविद अल्लामा शिबली नोमानी, महाकवि राहुल सांकृत्यायन, महाकवि हरिऔध सिंह उपाध्याय, मशहूर शायर इकबाल सुहेल, महान कवि कैफ़ी आज़मी, महान दार्शनिक व धर्म गुरू अल्लामा हमीदुद्दीन फरही, कुरान की सरल व्याख्या करने वाले मौलाना अमीन अहसन इस्लाही और महान लीडर और वक्ता अबुल लैस इस्लाही जैसे अनगिनत लोगों से आज़मगढ़ की पहचान जुड़ी हुई है.

आज़मगढ़ को लाख कोशीशों के बाद भी कभी मिटाया नहीं जा सकता. आज़मगढ़ शहर में महान शिक्षाविद अल्लामा शिबली नोमानी ने दारुल मुसन्निफीन, शिबली कॉलेज के नाम से शिक्षा का एक ऐसा दीप जलाया जो आज भी समाज के हर तबके तक बिना किसी धार्मिक-सामाजिक भेद भाव के अपनी रोशनी बिखेर रहा है और इसके साथ साथ वहां से पढ़कर निकले हुए छात्र भी पूरी दुनिया को अपनी प्रतिभा से रौशन कर रहे हैं.

आज़मगढ़ में ब्रिटिश राज के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप के महान इस्लामी विद्वान शिबली नोमानी द्वारा 1883 में इस प्रसिद्ध संस्था शिब्ली कॉलेज की स्थापना की गई थी. शिब्ली नेशनल कॉलेज वर्तमान में आज़मगढ़ में स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम प्रदान करता है.

आज भी आज़मगढ़ से प्रतिभाएं निकल रही हैं चाहे वह खेल का मैदान हो या सियासत का, इल्म का मैदान हो या समाज सेवा का, सैकड़ों लोग समाज के हर वर्ग में अपना योग दान दे रहे हैं. बुद्धजीवियों, कवियों, कलाकारों द्वारा आज़मगढ़ को विश्वपटल पर नई उचाईयों तक पहुँचाने का यह सिलसिला आगे भी अनवरत जारी रहेगा और आज़मगढ़ को आतंकी की नर्सरी कहने वाले मुंह की खाते रहेंगे.

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