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Wednesday, April 17, 2024
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समान नागरिक संहिता भारत में धार्मिक स्वतंत्रता को ख़त्म करने की साज़िश: मौलाना अरशद मदनी

इंडिया टुमारो

मुंबई | जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना सैयद अरशद मदनी ने कहा है कि भारत में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लाने के प्रयासों का उद्देश्य भारत में धर्म की स्वतंत्रता को समाप्त करना है।

उन्होंने 21 मई को जमीयत उलेमा-ए-हिंद के तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन पर ऐतिहासिक आज़ाद मैदान में एक जनसभा को संबोधित करते हुए यह टिप्पणी की.

इसी क्रम में उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी की हत्या में शामिल साम्प्रदायिक और विभाजनकारी ताकतों के प्रति कांग्रेस का नरम और लचीला रवैया देश को विनाश के रास्ते पर ले जाने वाली ताकतों को मज़बूत करने के लिए ज़िम्मेदार है।

विस्तार से अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि, विभाजन के बाद पूरे देश में मुस्लिम विरोधी दंगे शुरू हो गए थे और महात्मा गांधी ने उन्हें रोकने के लिए कदम उठाए थे। लेकिन सांप्रदायिक ताकतों, यहां तक ​​कि कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं को भी यह पसंद नहीं आया और वे उनके खिलाफ हो गए। परिणामस्वरूप अंततः उनकी हत्या हो गई।

मौलाना मदनी ने कहा कि महात्मा गांधी की हत्या वास्तव में देश की धर्मनिरपेक्षता की हत्या थी, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने उस समय वह नहीं किया जो उसे करना चाहिए था.

उन्होंने आगे कहा कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद नेतृत्व लगातार कांग्रेस नेतृत्व से सांप्रदायिक समूहों की कट्टरता को रोकने के लिए आग्रह कर रहा था लेकिन उन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया। इससे साम्प्रदायिक विचारधारा को बल मिला।

उन्होंने इतिहास के पन्ने पलटते हुए कहा कि आजादी से पहले जमीयत उलमा-ए-हिंद के नेताओं ने कांग्रेस नेताओं से लिखित वादा लिया था कि आजादी के बाद देश का संविधान धर्मनिरपेक्ष होगा, जिसका मतलब था कि सरकार का कोई धर्म नहीं होगा और सभी अल्पसंख्यकों को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता होगी।

लेकिन साम्प्रदायिकता की जड़ें अंदर ही अंदर गहरी होती चली गईं। केंद्र और सभी राज्यों में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद सांप्रदायिक और विभाजनकारी ताकतों के खिलाफ कांग्रेस द्वारा कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। कांग्रेस चाहती तो इस पर एक सख्त कानून पारित कर सकती थी, लेकिन उसने एक लचीली नीति अपनाई और इसके परिणामस्वरूप साम्प्रदायिक संगठन शक्तिशाली हो गए और यह साम्प्रदायिकता अब कांग्रेस को भी निगल चुकी थी।

हालांकि, उन्होंने कर्नाटक चुनाव में सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने के लिए कांग्रेस नेतृत्व की प्रशंसा की।

उन्होंने नफरत फैलाने वाली ताकतों को खारिज करने के लिए कर्नाटक के मतदाताओं की भी सराहना की।

उन्होंने कहा कि, 75 साल पहले अगर कांग्रेस ने सांप्रदायिकता के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया होता तो वह सत्ता से बेदखल नहीं होती और देश बर्बादी के कगार पर नहीं पहुंचता।

यह समझाने के लिए कि इन 75 वर्षों में सांप्रदायिकता ने अपनी जड़ें कैसे मजबूत की हैं, मौलाना मदनी ने राहुल गांधी के साथ हुई एक मुलाकात का ज़िक्र किया जब कांग्रेस सत्ता में थी और शिक्षित मुस्लिम युवाओं को आतंकवाद के मामलों में गिरफ्तार किया जा रहा था। जब वे इस मुद्दे पर राहुल गांधी से मिले तो उन्होंने तत्कालीन गृह राज्य मंत्री को इस मुद्दे को हल करने का निर्देश दिया। उक्त मंत्री ने मामले में गम्भीर रुचि लेते हुए इसे हल करने का आश्वासन दिया, लेकिन दो माह बाद ही मंत्री को बर्खास्त कर दिया गया और केस की फाइल हमेशा के लिए बंद कर दी गई।

मौलाना मदनी ने कहा कि, इस घटना से समझा जा सकता है कि देश की रगों में सांप्रदायिकता का ज़हर किस हद तक समा चुका है. उन्होंने कहा कि सांप्रदायिक ताकतों के हाथों में न तो संविधान सुरक्षित है और न ही संवैधानिक संस्थाएं।

मौलाना मदनी ने कहा, “समान नागरिक संहिता लागू करके नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता को छीनने की साज़िश है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की आड़ में हिन्दू पुनरुत्थानवाद को बढ़ावा देने के प्रयास शुरू हो गए हैं। जमीयत उलमा हिंद इसका पुरज़ोर विरोध करती है और जमीयत उलमा-ए-हिंद की आम सभा की बैठक में इस पर एक प्रस्ताव भी पारित किया गया है।”

उन्होंने कहा कि, सच्चाई यह है कि डर का माहौल बनाकर पूरे देश को पुलिस स्टेट बना दिया गया है। लेकिन विभाजनकारी ताकतें अभी तक राष्ट्रीय एकता, अखंडता और आपसी प्रेम को नष्ट नहीं कर पाइ हैं। कर्नाटक की जनता ने इसका सबूत दिया है। लेकिन कुछ लोग अभी भी इस भ्रम में हैं कि नफरत की राजनीति ही उनकी सत्ता को बचाए रख सकती है।

उन्होंने कहा कि, नफरत को नफरत से नहीं बल्कि प्यार से हराया जा सकता है। यह हमारा देश है, जिसके लिए हमारे बुज़ुर्गों ने बलिदान दिया है, इसलिए इसके विकास और समृद्धि की जिम्मेदारी भी हम पर है।

सम्मेलन में शामिल होने वालों में जमीयत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मुफ्ती सैयद मासूम साकिब, मौलाना महमूद दरियाबादी, जमीयत उलमा-ए-हिंद के उपाध्यक्ष मौलाना सैयद असजद मदनी, मदीना मुनव्वराह के मौलाना अख़लाद रशीदी, मौलाना अशहद रशीदी और जमीयत उलेमा यूपी के अध्यक्ष शामिल थे।

जमीयत उलेमा की सभी राज्य इकाइयों के अध्यक्ष और महासचिव और जमीयत उलेमा जनरल बॉडी के सदस्य भी उपस्थित थे। इसके अलावा मुंब्रा विधायक जितेंद्र आव्हाड और जमात-ए-इस्लामी हिंद मुंबई के महासचिव ने भी सम्मेलन को संबोधित किया.

जमीयत उलेमा महाराष्ट्र के महासचिव मौलाना हलीमुल्ला कासमी और जमीयत उलेमा हिंद के महासचिव ने संयुक्त रूप से मंच का संचालन किया।

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