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Saturday, March 2, 2024
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महिलाओं को न्याय की लड़ाई के लिए अब उठ खड़े होना चाहिए

Fr Cedric Prakash SJ

देश में महिलाओं के ख़िलाफ़ हुई कुछ घटनाएं

  • 13 फरवरी को कानपुर देहात में प्रशासन द्वारा अतिक्रमण हटाने के लिए चलाए गए अभियान के दौरान एक मां और उसकी बेटी को ज़िंदा जला दिया गया. एक 44 वर्षीय मां और उसकी 21 वर्षीय बेटी की हत्या की इस घटना की वजह से पुलिस और ग्रामीणों के बीच भारी तनाव पैदा हो गया.
  • कुछ दिन पहले, 7 फरवरी को, कर्नाटक के कोप्पल जिले में, जब एक दलित महिला अपनी गाय वापस लेने गई तो उस को तथाकथित ऊंची जाति के व्यक्ति द्वारा न सिर्फ़ चप्पलों से पीटा गया बल्कि गाली भी दी गई थी. महिला का जानवर रास्ता भटक जाने के कारण उस व्यक्ति के खेत में घुस गया था.
  • जनवरी की शुरुआत में, बिहार के रोहतास जिले में उरांव जनजाति की एक तीस वर्षीय आदिवासी महिला जब रोहतासगढ़ किले के पास एक जंगली इलाके में जलाऊ लकड़ी इकट्ठा कर रही थी तो उस वक्त वन विभाग के अधिकारियों द्वारा कथित रूप उसका से बलात्कार किया गया और उसकी हत्या कर दी गई.
  • कुछ समय पहले, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं सहित सौ से अधिक मुस्लिम महिलाओं की तस्वीरें आपत्तिजनक रुप से एक ऐप पर नीलामी के लिए डाल दी गई.
  • सितंबर 2020 को यूपी के हाथरस में 19 साल की एक दलित लड़की के साथ हुई सामूहिक बलात्कार की घटना ने पूरे देश को सकते में डाल दिया था. दुख की बात है कि कुछ दिन पहले, 2 मार्च को यूपी की एक अदालत ने इस मामले में चार में से तीन आरोपी पुरुषों को बरी कर दिया, चौथे मुजरिम को भी केवल गैर इरादतन हत्या और एससी/एसटी अधिनियम की धाराओं के तहत दोषी माना गया, बलात्कार का नहीं.

देश में महिलाओं के खिलाफ हुई इन सभी जघन्य अपराध की घटनाओं को कुछ मीडिया चैनलों और पोर्टल्स द्वारा ऐसे रिपोर्ट किया गया, मानो ऐसी घटनाएं अपेक्षित हों. त्रासदी यह है कि ये घटनाएं सिर्फ एक बार नहीं हुई हैं, बल्कि ये सभी घटनाए हमारे पितृसत्तात्मक समाज में व्यवस्थित गलत धारणा को दर्शाती हैं जिसका आधार रूढ़िवादी मानसिकता है. 2018 के थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन के सर्वे के अनुसार, महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के मामले में भारत सबसे खतरनाक देश है.

भारत में महिलाओं की स्थिति दयनीय है: वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) ने 2022 के लिए अपने ग्लोबल जेंडर गैप (GGG) इंडेक्स में 146 देशों में से भारत को 135वां स्थान दिया है.

भारत के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की हालिया रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध पिछले वर्ष की तुलना में 2021 में 15.3 तक प्रतिशत बढ़ गए हैं, पिछले वर्ष ऐसे 4,28,278 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि 2020 में 3,71,503 मामले दर्ज किए गए.

एनसीआरबी की रिपोर्ट यह भी बताती है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध की दर (प्रति 1 लाख जनसंख्या पर घटनाओं की संख्या) 2020 में 56.5 प्रतिशत से बढ़कर 2021 में 64.5 प्रतिशत हो गई. ये हालात भारत जैसे देश के लिए एक शर्म का विषय है जो जी-20 की अध्यक्षता कर रहा है खुद को विश्व नेता बनने के बहुत सारे कवर-अप और दिखावों और पाखंड के साथ जोर-शोर से प्रयास कर रहा है.

जैसा कि एक और अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च को है, उस दौरान फिर से दिखावटी कार्यक्रमों का सामान्य दौर चलेगा और सिर्फ़ नाम करने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा भाषण दिए जायेंगे. इन दिखावटी कार्यक्रमों में एक के बाद एक वाकपटु पुरुष वक्ता महिलाओं के प्रति संरक्षण देने वाले रवैये का प्रदर्शन. लेकिन, दुर्भाग्य से, दुखद और क्रूर वास्तविकता यह है कि ऐसा लगता है कि हालत में बदलाव बहुत मुश्किल है.

भारत में, अधिकांश महिलाएं पितृसत्तात्मक और पुरुष-प्रधान समाजों में दोयम दर्जे के नागरिकों के रूप में रहती है, इस स्थिती की हमेशा आलोचना की जाती रही है. इसके अलावा, सभी प्रमुख धर्मों में पुरुष वर्चस्व अभी भी जारी है.

दिलचस्प बात यह है कि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2023 और उसके बाद के अभियान का विषय #EmbraceEquity या ‘समानता अपनाओ’ है. आभियान का कॉन्सेप्ट नोट बताता है कि “इक्विटी या समानता सिर्फ कहने के लिए अच्छा नहीं है, बल्कि यह बेहद ज़रूरी है. लैंगिक समानता पर ध्यान रखना हर समाज के डीएनए का हिस्सा होना चाहिए. समानता का मतलब एक समावेशी दुनिया का निर्माण करना है. हम में से प्रत्येक अपने प्रभाव क्षेत्र में समानता का समर्थन भी कर सकता है और उसे अपना भी सकता है.

हम सभी लैंगिक रूढ़िवादिता को चुनौती दे सकते हैं, भेदभाव को खत्म कर सकते हैं, पूर्वाग्रह की ओर ध्यान आकर्षित कर सकते हैं और समावेशी सोच की तलाश कर सकते हैं. मिलीजुली कोशिशें ही बदलाव के लिए प्रेरित करती है. ज़मीनी कार्रवाई से लेकर बड़े दायरे में सक्रियता तक, हम सभी समानता को गले लगा सकते हैं. लैंगिक समानता स्थापित करना केवल इसके लिए लड़ाई लड़ने वाली महिलाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ये सहयोगी महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक उन्नति के लिए भी अविश्वसनीय रूप से महत्वपूर्ण हैं…। हर जगह हर कोई एक भूमिका निभा सकता है.”

गौरतलब है कि 14 फरवरी को ‘वन बिलियन राइज़िंग’ आंदोलन की वर्षगांठ भी थी. यह आन्दोलन मानव इतिहास में महिलाओं के खिलाफ हिंसा (सिसजेंडर, ट्रांसजेंडर, और फ्लूइड आइडेंटिटी वाले लिंग आधारित हिंसा के अधीन) को समाप्त करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण सामूहिक कार्रवाई है. हर 3 में से 1 महिला को उसके जीवनकाल में पीटा जाता है या बलात्कार किया जाता है इस प्रकार के चौंका देने वाले आंकड़ों पर कार्रवाई के आह्वान के रूप में यह अभियान 2012 में 14, वेलेंटाइन डे पर शुरू किया गया था.

विश्व की आबादी 7 अरब होने के साथ ही, अब यह आंदोलन एक अरब से अधिक महिलाओं और लड़कियों को जोड़ता है. 2023 के अभियान का विषय ‘राइज़ फॉर फ्रीडम’ है. अभियान में कहा गया है, “इस वर्ष, हम दुनिया से स्वतंत्रता के लिए उठने का आह्वान करते हैं. पितृसत्ता से और उसकी सभी संतानों से मुक्ति…। पूंजीवाद, दंडमुक्ति, गरीबी, दमन, विभाजन, शोषण, शर्म, नियंत्रण, व्यक्तिवाद, लालच, हिंसा से मुक्ति…और इस उदय में…नई संस्कृति का निर्माण करेंगे.”

सच है, ऐसी कई महिलाएं हैं (और हैं) जिन्होंने समानता को अपनाने का साहस किया और इस नई संस्कृति को बनाया है. इनकी सूची अंतहीन है लेकिन इसमें सावित्रीबाई फुले के कार्य भी शामिल हैं, जिन्हें देश की पहली महिला शिक्षक भी माना जाता है. 10 मार्च 1897 को उनकी मृत्यु हुई थी. उन्हें भारत में महिलाओं के लिए शिक्षा के अवसरों की नींव रखने का श्रेय दिया जाता है. और उन्होंने ब्रिटिश शासन के दौरान महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष में एक प्रमुख भूमिका निभाई. वह एक कवयित्री भी थीं; उनकी कविताएँ भेदभाव खिलाफ़ और शिक्षा की आवश्यकता के लिए थीं. अपनी ज़िंदगी का अधिकतर हिस्सा उन्होंने अस्पृश्यता, सती प्रथा, बाल विवाह और महिलाओं को प्रभावित करने वाली अन्य सामाजिक बुराइयों के खिलाफ ज़ोरदार अभियान चला कर गुज़ारा. अपनी एक कविता में, वह लिखती हैं, “उत्पीड़ित और छोड़े गए लोगों के दुखों का अंत हो…जाति की ज़ंजीरें टूटे.”

सावित्री बाई फुले के साथ फातिमा शेख भी थीं जो भारत की पहली मुस्लिम महिला शिक्षिका थीं. सावित्रीबाई और फातिमा ने मिलकर 1800 के दशक में एक शैक्षिक क्रांति की शुरुआत की.

फातिमा शेख ने देश का पहला गर्ल्स स्कूल शुरू करने में अहम भूमिका निभाई थी. 1848 में, ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले को उनके ब्राह्मण विरोधी विचारों के कारण अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर किया गया. उस समय महिलाओं और निचली जातियों को शिक्षित करना पाप माना जाता था. अपने भाई उस्मान शेख के साथ, फातिमा शेख ने उन्हें शरण दी और अपने घर में एक स्कूल शुरू किया. शेख ने फुले के साथ शिक्षण संस्थान के प्रबंधन में सहायता के लिए एक शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम भी चलाया.

आज हमारे बीच जस्टिस बी वी नागरत्ना जैसी महिला न्यायमूर्ति भी हैं जो सुप्रीम कोर्ट में सक्रीय हैं. हाल ही में, उन्होंने अन्य जजों से असहमति जताते हुए दो निर्णय सुनाए; दोनों में 4:1 के अनुपात से असहमति के फैसले थे. अन्य चार जिन्होंने राय दी, वे सभी पुरुष जज थे. न्यायमूर्ति नागरत्ना बेहिचक और अविचलित रही हैं: उनके विचारों ने बेशक बहुत लोगों का ध्यान आकर्षित किया है. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दोनों (बहुसंख्यक सत्ता-समर्थक मीडिया सहित) ने उनके विचारों को जगह दी है और ज़रूरी कवरेज भी दिया है.

कई संपादकीय और ऑप-एड उनके निर्णयों पर समीक्षा करते हैं – कानूनी दिग्गजों, शिक्षाविदों और अन्य बुद्धिजीवियों के साथ उनके निर्णयों की आलोचना करने के लिए एक-दूसरे के साथ होड़ करते हैं. सुप्रीम कोर्ट अभी भी पुरुषों का गढ़ है. चार अन्य पुरुषों के साथ एक बेंच पर अकेली महिला होना शायद बहुत आसान नहीं है. अलग तरीके से सोचने के लिए धैर्य और दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है! न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना ने निस्संदेह यह साबित कर दिया है कि निर्णय लेने वाले पुरुषों के खिलाफ खड़े होने की उनकी क्षमता की कोई मिसाल नहीं मिलती है! महिला विरोधी माहौल को वो बहुत पहले चुनौती दे चुकी हैं.

फिर यूं भी हमारे पास ज़िक्र करने को इक्कीस साल पहले की भयानक त्रासदी भी है, जिसने गुजरात को अपनी चपेट में लिया था. सब कुछ बिलकिस बानो पर गुज़रा. 27 फरवरी 2002 को S-6 डिब्बे में आग लगने और 59 व्यक्तियों (मुख्य रूप से ‘कारसेवकों’) की दुखद मौत के बाद, अगले दिन गुजरात के कई हिस्सों में दंगो का दौर शुरू हो गया. जान पर मंडराते खतरें को भांप कर, सत्रह लोगों का एक समूह दाहोद जिले के रंधिकपुर के अपने पैतृक गांव से भाग गया. समूह में बिलकिस, उसकी तीन वर्षीय बेटी सालेहा, उसकी माँ और चौदह अन्य लोग शामिल थे.

बिलकिस के परिवार ने इस उम्मीद में दूसरे गांव छपरवाड़ में शरण ली कि वे वहां सुरक्षित रहेंगे. लेकिन वहां 3 मार्च को, उन पर दरांती, तलवार और लाठियों से लैस लगभग 20-30 लोगों ने हमला कर दिया. हमलावरों में ग्यारह पुरूष आरोपी थे, जिन्हें अभी हाल ही में रिहा किया गया है. बिलकिस, उसकी मां और तीन अन्य महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया और उन्हें बेरहमी से पीटा गया था. सत्रह मुसलमानों में से आठ मृत पाए गए थे, छह लापता थे. इस हमले में केवल बिलकिस, एक आदमी और तीन साल का एक बच्चा बच पाया था. बिल्किस कम से कम तीन घंटे तक बेहोश रही; होश आने के बाद, उसने एक आदिवासी महिला से कपड़े उधार लिए और शिकायत दर्ज कराने के लिए लिमखेड़ा पुलिस स्टेशन गई. सीबीआई के अनुसार, वहां के हेड कांस्टेबल ने “भौतिक तथ्यों को दबा दिया और बिलकिस की शिकायत का एक विकृत और छोटा संस्करण लिखा”.

जिस तकलीफ के साथ बिल्कीस उन दंगों का ज़िक्र करती है उससे लगता है कि बिलकिस ने उस त्रासदी की भयावहता को कई बार जिया है. बड़े दर्द के साथ वह कहती हैं, “मेरे परिवार के चारों पुरुषों को बेरहमी से मार दिया गया. कई पुरुषों द्वारा महिलाओं को नग्न किया गया और बलात्कार किया गया था. उन्होंने मुझे पूरी तरह से जकड़ लिया था. उस वक्त मेरी 3 साल की बेटी सालेहा मेरी गोद में थी. उन्होंने उसे छीन लिया और अपनी पूरी ताकत से उसे हवा में फेंक दिया. जब उसका छोटा सा सिर चट्टानों पर फेंक के मारा गया तो मेरा दिल बदहवास हो गया. चार आदमियों ने मेरे हाथ-पैर पकड़ लिए और एक-एक करके उन्होंने मेरा बलात्कार किया. अपनी वासना पूरी करने पर उन्होंने मुझे लात-घूंसों से मारा और रॉड से मेरे सिर पर मारा. मुझे मरा हुआ समझकर उन्होंने मुझे झाड़ियों में फेंक दिया.”

बिलकिस ने आगे बताया कि, “चार-पांच घंटे के बाद मुझे होश आया. मैंने अपने शरीर को ढँकने के लिए कुछ चिथड़ों की तलाश की लेकिन मुझे कुछ नहीं मिला. मैंने बिना भोजन और पानी के एक पहाड़ी की चोटी पर डेढ़ दिन बिताया. मैं मौत के लिए तरसी. अंत में, मैं एक आदिवासी इलाका खोजने में कामयाब हुई. वहां मैंने खुद को हिंदू बताकर शरण ली. जिन आदमियों ने हम पर हमला किया उन्होंने हमारे लिए गालियों का इस्तेमाल किया. ऐसी गालियां जिन्हें मैं कभी नहीं दोहरा सकती.”

घटना का ज़िक्र करते हुए बिलकिस ने बताया, “मेरे सामने उन्होंने मेरी मां, बहन और 12 अन्य रिश्तेदारों को मार डाला. हमारे साथ रेप और हत्या करने के दौरान वे गालियां दे रहे थे. मैं उन्हें नहीं बता सकती थी कि मैं पांच महीने की गर्भवती हूं क्योंकि उनके पैर मेरे मुंह और गर्दन पर थे. मैं उन सभी लोगों को जानती हूं, जिन्होंने मेरे साथ रेप किया. हम उन्हें दूध बेचते आए हैं. वे हमारे ग्राहक थे. अगर उन्हें ज़रा भी शर्म होती तो वे मेरे साथ ऐसा नहीं करते. मैं उन्हें कैसे क्षमा कर सकती हूं?”

न्याय के लिए उनकी ज़िद का ही नतीजा था कि इस नृशंस अपराध के मुजरिमों में से ग्यारह को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई. 15 अगस्त 2022 को न्याय का खुला उपहास करते हुए, उन सभी को उनकी सज़ा में छूट दे दी गई और उन्हें रिहा कर दिया गया!

बिलकिस का संघर्ष अभी भी जारी है: वह लड़ रही है ताकि इन अपराधियों को वापस जेल भेजा जा सके. 17 अगस्त 2022 को एक सार्वजनिक बयान में, उन्होंने कहा था कि, “दो दिन पहले 15 अगस्त, 2022 को पिछले 20 वर्षों पुराने ट्रॉमा ने फिर से मुझे घेर लिया. जब मैंने सुना कि मेरे परिवार और मेरे जीवन को तबाह करने वाले और मुझसे मेरी 3 साल की बेटी को छीनने वाले 11 सज़ायाफ्ता लोग आज़ाद हो गए हैं, तो मेरे पास दुख को बयान करने के लिए कोई शब्द नहीं थे. मैं अभी भी सुन्न हूँ. आज मैं बस इतना ही कह सकती हूं कि किसी भी महिला के लिए इंसाफ इस तरह कैसे खत्म हो सकता है?”

बिलकिस कहती हैं, “मैंने अपने देश के उच्चतम न्यायालयों पर भरोसा किया. मुझे व्यवस्था पर भरोसा था, और मैं धीरे-धीरे अपने दुखों के साथ जीना सीख रही थी. इन दोषियों की रिहाई ने मेरी शांति छीन ली है और न्याय में मेरे विश्वास को आघात पहुंचाया है. मेरा दुख और मेरा डगमगाता विश्वास अकेले मेरे लिए नहीं बल्कि हर उस महिला के लिए है जो अदालतों में न्याय के लिए संघर्ष कर रही है. इतना बड़ा और अन्यायपूर्ण निर्णय लेने से पहले किसी ने भी मेरी सुरक्षा और कुशलक्षेम के बारे में नहीं पूछा. मैं गुजरात सरकार से अपील करती हूं, मुझे बिना डर ​​और शांति से जीने का मेरा अधिकार वापस दें. मेरे परिवार और मेरा सुरक्षित रहना सुनिश्चित करें.” ब्लिकिस न्याय की प्रतीक्षा कर रही है!

सावित्रीबाई और फातिमा के लिए, नागरत्ना और बिलकिस के लिए और कई अन्य महिलाओं के लिए यह आसान नहीं रहा है जिन्होंने व्यवस्था को चुनौती दी और बदलाव की दिशा में काम किया! ये ऐसी महिलाएं हैं जो सभी बाधाओं के खिलाफ उठ खड़ी हुई हैं, तन्हा रास्ता तय किया है और साहसपूर्वक समानता को अपनाने का फैसला किया. ये सभी अमेरिकी नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और कवि माया एंजेलो के अमर शब्दों का जीता जागता प्रतीक हैं:

हाँ, महिलाओं को अब उठना चाहिए और समानता को अपनाना चाहिए!

(फादर सेड्रिक प्रकाश एसजे एक मानवाधिकार, सुलह और शांति कार्यकर्ता/लेखक हैं. [email protected])

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