Saturday, September 24, 2022
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मायावती के भाजपा पर लगातार हमले से नए राजनीतिक समीकरण की उम्मीद जताते विश्लेषक

अखिलेश त्रिपाठी | इंडिया टुमारो

लखनऊ | बसपा सुप्रीमो मायावती ने हाल ही में दिए अपने कुछ बयानों से ख़ुद के ‘भाजपा समर्थक’ होने के आरोपों पर विराम लगाया है और भाजपा की बी टीम होने की बात को झुठला दिया है जिससे भाजपा खेमे में हलचल देखी जा सकती है। मायावती के इस नए कदम से यूपी की राजनीति में आगे चलकर बड़े राजनीतिक परिवर्तन का होना तय हो गया है।

पिछले कुछ दिनों में बसपा सुप्रीमो मायावती का भाजपा पर निशाना साधते हुए कई ऐसा बयान आया है जिससे राजनीतिक विश्लेषक उत्तर प्रदेश में नए राजनीतिक समीकरण की आहट का अनुमान लगा रहे हैं। कुछ दिनों पहले मदरसा सर्वे के योगी सरकार के फैसले पर मायावती ने विरोध जताते हुए इसे मुसलमानों का दमन कहा था।

नरेंद्र मोदी के 2014 में देश के प्रधानमंत्री बनने के बाद बसपा देश और उत्तर प्रदेश की राजनीति में खात्मे की ओर बढ़ने लगी थी। यूपी की राजनीति में एक बड़ा स्थान रखने वाली बसपा 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में सिमट कर रह गई और उसके मात्र 19 विधायक निर्वाचित हुए। इसके बाद बसपा सुप्रीमो मायावती ने राजनीति में रहते हुए भी चुप्पी साध ली। वे यदा-कदा ही राजनीतिक मसलों और जनता से जुड़े हुए मामलों पर ही बोलती थीं।

उनकी इस भूमिका से उनका परम्परागत वोटर उनसे नाराजज़ होने लगा। इसकी रिपोर्ट जब उनके लोगों ने मायावती को देना शुरू किया, तो मायावती इसको लेकर चिंतित हो उठीं और उन्होंने राजनीति में फिर से अपने को सक्रिय किया। इसके बाद मायावती ने फिर से बसपा को मज़बूत करने और उसका जनाधार बढ़ाने का फैसला लिया। इसी फैसले के तहत मायावती ने सारे बैर-भाव को छोड़कर अखिलेश यादव से चुनावी गठबंधन किया और सपा-बसपा ने मिलकर 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ा।

इस चुनाव में बसपा को 10 और सपा को 5 सीटों पर विजय प्राप्त हुई। 1 सीट रायबरेली की कांग्रेस को मिली,जहां से उसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी लोकसभा सदस्य के रूप में चुनी गईं। यूपी की 80 में शेष 64 सीटों पर भाजपा के सदस्य लोकसभा सदस्य चुने गए।

कुछ समय तक सपा और बसपा के संबंध ठीक से चलते रहे। इसके बाद अचानक एक दिन ऐसा आया कि जब मायावती ने अपनी तरफ से सपा से नाता तोड़ लिया और आगे सपा से किसी तरह का संबंध न रखने की घोषणा की। बताया जाता है कि इस गठबंधन को मायावती ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दबाव में तोड़ा, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इशारे पर सीबीआई ने मायावती को डराना-धमकाना शुरू कर दिया था। मायावती को लगा कि अगर वह अखिलेश यादव के साथ खड़ी रहेंगी, तो भाजपा उनके पुराने मामले खोलकर उनको तंग कर सकती है।

इसीलिए उन्होंने भाजपा के आगे खुद को सरेंडर कर दिया। इस तरह भाजपा ने मायावती को अखिलेश यादव से दूर कर यूपी में खुद को मजबूत बनाने का काम किया। मायावती ने जनता से जुड़े हुए मुद्दों पर बोलना बंद कर दिया और इस तरह से उन्होंने मौन रहकर भाजपा के हर सही-गलत फैसले का समर्थन किया। लोग खुलेआम कहने लगे कि मायावती मौन रहकर भाजपा का समर्थन कर रही हैं और बसपा भाजपा की बी टीम हो गई है।

इसका असर यह हुआ कि बसपा का परंपरागत समर्थक और वोटर बसपा का साथ छोड़ने लगा। क्योंकि यूपी में योगी आदित्यनाथ की सरकार में दलितों का खूब उत्पीड़न होने लगा और दलितों की बात को सुनने वाला कोई नहीं रहा। मायावती के मौन धारण करने से उनके समर्थक ही नहीं उनसे दूर हुए बल्कि बसपा के विधायक भी एक-एक कर उनका साथ छोड़ गए और दूसरे राजनीतिक दलों में शामिल हो गए।

इस तरह से बसपा यूपी की राजनीति में सिमट कर रह गई और एक तरह से खत्म हो गई। लेकिन इसके बावजूद मायावती ने इस सत्य को स्वीकार नहीं किया। मायावती का सत्य से सामना तब हुआ, जब 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा का सूपड़ा साफ हो गया और उसको केवल 1 सीट मिली। मायावती को इससे बड़ा झटका लगा।

मायावती को यह महसूस हुआ कि अगर राजनीति में रहना है और अपने अस्तित्व एवं बसपा के वजूद को बचाना है, तो खुद को भाजपा समर्थक की छवि से और बसपा को भाजपा की बी टीम होने से मुक्त करना होगा। वरना राजनीति में वह खत्म हो जाएंगी और उनका कोई नामलेवा नहीं बचेगा।इसी सबको ध्यान में रखकर मायावती ने भाजपा पर तगड़ा हमला बोला है और भाजपा के लिए खतरे की घंटी बजा दी है।

मायावती ने खुद की भाजपा समर्थक छवि को तोड़ते हुए और बसपा को भाजपा की बी टीम होने से मुक्त करते हुए भाजपा पर तगड़ा हमला बोला है तथा भविष्य में बनने वाले विपक्षी पार्टियों के गठबंधन के साथ खड़ा होने का संकेत दिया है। यूपी में जनता से जुड़े हुए मुद्दों पर मायावती के चुप्पी साधे रहने से भाजपा की ओर से आम लोगों को यह समझाने और बताने का काम किया जाता था कि बसपा भाजपा के साथ है।

इस प्रकार की बात भाजपा की ओर से कहने से बसपा खत्म होने के कगार पर पहुंच गई थी। लेकिन अब बदली हुई परिस्थितियों में मायावती ने अपने अस्तित्व को बचाने और बसपा को बचाने के लिए भाजपा पर तगड़ा हमला बोल कर भाजपा को सन्नाटे में ला दिया है। भाजपा को मायावती की ओर से इस तरह के तगड़ा हमला करने की कतई उम्मीद नहीं थी, लेकिन मायावती ने भाजपा पर तगड़ा हमला बोल कर उसके लिए खतरे की घण्टी बजा दी है।

मायावती ने भाजपा पर पहली बार हमला तब बोला, जब विधानसभा सत्र शुरू होने के एक दिन पहले भाजपा की तरफ से यह बयान दिया गया कि यूपी में प्रतिपक्ष बेरोजगार है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए भाजपा पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि, “भाजपा का यह कहना कि प्रतिपक्ष यहां बेरोजगार है, यह इनकी अहंकारी सोच व गैर जिम्मेदाराना रवैये को उजागर करता है। यूपी विधानसभा मानसून सत्र से पहले भाजपा का ऐसा बयान गलत है। सरकार की सोंच जनहित व जनकल्याण के प्रति ईमानदारी एवं वफादारी साबित करने की होनी चाहिए, न कि प्रतिपक्ष के विरुद्ध द्वेषपूर्ण रवैये की। यूपी सरकार अगर प्रदेश के समुचित विकास व जनहित के प्रति चिंतित व गम्भीर होती, तो उनका यह विपक्ष विरोधी बयान नहीं आता।”

बसपा सुप्रीमो मायावती के इस तरह की बात कहने से भाजपा को तगड़ा झटका लगा है। भाजपा को मायावती से इस तरह की उम्मीद नहीं थी। भाजपा यह समझती थी कि मायावती हमेशा उसके साथ हैं। राजनीति में वही सफल राजनेता होता है, जो उचित समय पर सही समय का इस्तेमाल कर अपने विरोधी राजनीतिक दल को सबक सिखाने का काम करता है। मायावती ने यह साबित कर दिखा दिया है कि उनको राजनीति में नौसिखिया न समझा जाए।

मायावती ने विपक्षी पार्टियों को धरना-प्रदर्शन करने की अनुमति न देने के मामले को लेकर भी भाजपा की योगी आदित्यनाथ की सरकार पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने कहा है कि, “विपक्षी पार्टियों को धरना-प्रदर्शन की अनुमति न देना भाजपा सरकार की तानाशाही है। बात-बात पर मुकदमे व लोगों की गिरफ्तारी कर विरोध को कुचलने की सरकार की धारणा अति घातक है। बेरोजगारी, गरीबी, बदहाल सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य व कानून व्यवस्था के खिलाफ धरना -प्रदर्शन न करने देने से पहले भाजपा सोंचे। विधान भवन के सामने बात -बात पर सड़क जाम करके आम जन जीवन ठप करने का भाजपाइयों का इतिहास रहा है।”

मायावती द्वारा भाजपा और योगी आदित्यनाथ सरकार के खिलाफ जिस प्रकार से आक्रामक रुख अपनाते हुए हमला बोला गया है, उससे बड़े-बड़े राजनैतिक पंडित भी हैरान हैं। राजनैतिक पंडित मायावती के ताजा कदम से अपनी तरह से अलग-अलग इसके अर्थ निकाल रहे हैं। लेकिन सच यही है कि अब आगे चलकर मायावती अपने और बसपा के अस्तित्व को बचाने के लिए यूपी में गैर भाजपाई गठबंधन के साथ भविष्य में खड़ी नजर आएंगी।

मायावती ने भाजपा और योगी आदित्यनाथ की सरकार पर तगड़ा हमला बोल कर भाजपा को बैकफुट पर तो पहुँचाया ही है, इसके साथ ही उन्होंने इशारों ही इशारों में सपा और अखिलेश यादव का समर्थन किया है। मायावती का यह राजनैतिक कदम यह संकेत देता है कि मायावती अब भाजपा से पीछा छुड़ाने के लिए जदयू, राजद, सपा और रालोद के बनने वाले गैर भाजपाई गठबंधन के साथ जाने का पूरा मन बना चुकी हैं, इसीलिए उन्होंने भाजपा पर तगड़ा हमला बोला है।

गैर भाजपाई गठबंधन के नेता नीतीश कुमार चाहते हैं और वह प्रयास कर रहे हैं कि बसपा सुप्रीमो मायावती उनके गठबंधन के साथ आ जाएं, जिससे 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को तगड़ी चुनावी शिकस्त दी जाए और केंद्र सरकार से मोदी सरकार को बेदखल किया जाए। नीतीश कुमार के साथ ही मायावती भी अब यह मन बना चुकी हैं कि अपने परंपरागत 12 प्रतिशत वोटरों के साथ नीतीश कुमार के गैर भाजपाई गठबंधन के साथ जाने में ही उनकी भलाई है।

यही वजह है कि उन्होंने अभी से भाजपा पर हमला बोलना शुरू कर दिया है और सपा के साथ भविष्य में खड़े होने का संकेत दिया है। मायावती का यह कदम यूपी की राजनीति में नई इबारत लिखेगा, इसमें कोई दो राय नहीं है।

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