Saturday, September 24, 2022
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पीएम मोदी को लिखे गए ‘ओपेन लेटर’ में मौलाना मौदूदी को क्यों बनाया गया निशाना?

सैयद ख़लीक अहमद

नई दिल्ली | क्या विभाजन के बाद से अब तक किसी भारतीय मुस्लिम नेता ने 2047 तक पूरे भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने का कोई आह्वान किया है? अंतर्राष्ट्रीय स्तर के इस्लामी विद्वान मौलाना अबुल आला मौदूदी जिनकी रचनाएँ वैश्विक स्तर पर मुसलमानों को प्रभावित करती आई हैं, क्या उन्होंने कभी भी अपने किसी लेख में विश्वभर में “गैर-मुसलमानों के नरसंहार” का आह्वान किया है?

27 जुलाई, 2022 को “शिक्षाविदों द्वारा पीएम मोदी को लिखे गए खुले पत्र” में इसी प्रकार के और कई दूसरे बड़े आरोप लगाए गए हैं. ये पत्र सोशल मीडिया पर भी वायरल है.

पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले 25 शिक्षाविद जिनमें से अधिकांश भारत से और कुछ विदेश से भी हैं. इन शिक्षाविदों ने पत्र में यह आरोप लगाया है कि यह विचार और विशेष रूप से मौलाना मौदूदी के राजनीतिक विचार राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा हैं.

इसलिए पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले इन शिक्षाविदों ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया और जामिया हमदर्द में इस्लामी अध्ययन के पाठ्यक्रमों से मौलाना मौदूदी और मिस्र के इस्लामी विद्वान सैयद कुतुब शहीद के लेखन पर प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ, भारत में उनकी सभी पुस्तकों के प्रकाशन और प्रसार पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है. सोशल मीडिया पर पत्र आने के बाद एएमयू ने मौलाना मौदूदी और सैय्यद कुतुब को तुरंत अपने पाठ्यक्रम से हटा दिया और उनकी पुस्तकों को अपने पुस्तकालयों से भी हटा दिया है.

मुख्यधारा के मीडिया द्वारा इस मुद्दे पर फैलाई जा रही है सनसनी

मुख्यधारा के मीडिया और कई जाने-माने समाचार पोर्टल्स और वेबसाइट्स ने पत्र के आधार पर लंबी चौड़ी कहानियां गढ़ कर प्रकाशित कर भी दी हैं, लेकिन इनमें से किसी ने भी पत्र के हस्ताक्षरकर्ताओं से उनके आरोपों पर सवाल करने के लिए संपर्क करना ज़रूरी नहीं समझा. हालांकि प्रोफ़ेशनलिज़्म की ये मांग होती है कि कम से कम हस्ताक्षरकर्ताओं से पत्र में लगाये गए आरोपों का सत्यापन करना चाहिए था या उनसे सवाल करना चाहिए कि हस्ताक्षरकर्ताओं को मौदुदी और सैयद कुतुब के लेखन के बारे में क्या जानकारी है?

इस मुद्दे पर खबरें बनाने वाले पत्रकारों को हस्ताक्षर करने वालों से सवाल करना चाहिए था कि क्या उन्होंने मौलाना मौदूदी या सैय्यद कुतुब की कोई किताब पढ़ी है? और ये भी पूछा जाना चाहिये कि मौलाना मौदूदी ने भारत व बाकी दुनिया के गैर-मुसलमानों के नरसंहार का आह्वान अपनी किस किताब में किया है? और वे प्रमुख मुस्लिम नेता कौन हैं जिन्होंने विभाजन के बाद वर्ष 2047 तक पूरे भारत को इस्लामी राष्ट्र बनाने के अपने दृढ़ संकल्प की घोषणा की है? क्योंकि पत्र में इन नेताओं के नाम का उल्लेख नहीं हैं. इस गैर पेशेवर पत्रकारिता के कारण तो केवल वही तथाकथित मुख्यधारा मीडिया के पत्रकार ही जानते हैं जिन्होंने अपने मीडिया प्रतिद्वंद्वियों से आगे बढ़ने की जल्दबाज़ी में तथ्यों को क्रॉस-चेक किये बिना ही इस मुद्दे पर कहानियां गढ़ कर प्रकाशित कर दी हैं. हस्ताक्षरकर्ताओं से पुष्टि किए बिना ही पत्र के आधार पर सनसनीखेज़ ख़बर प्रकाशित करने के कारण निस्संदेह इस्लामी पाठ्यक्रम पढ़ाने वाले विश्वविद्यालयों को बहुत नुकसान पहुँचा है और बड़े पैमाने पर लोगों को गलत संदेश भी गया है.

इंडिया टुमारो ने उन हस्ताक्षरकर्ताओं से पत्र के सम्बंध में संपर्क करने का प्रयास किया जिनके फोन नंबर और ईमेल पते इंटरनेट पर उपलब्ध थे, या उनके कार्यालयों द्वारा उपलब्ध कराए गए थे.

क्या खुले पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों ने मौलाना मौदूदी की किताबें पढ़ी हैं?

25 हस्ताक्षरकर्ताओं में से (उनमें से तीन विदेश में रह रहे हैं) केवल पांच हस्ताक्षरकर्ताओं से ही फोन पर बात करना संभव हो पाया. यहां पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि सभी पांचों ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि उन्होंने मौलाना मौदूदी को बिल्कुल नहीं पढ़ा है और न ही उनमें से किसी ने यह माना कि वे पत्र का मसौदा तैयार करने में शामिल थे. फिर किसने पत्र का मसौदा तैयार किया? और किस आधार पर लेखकों और हस्ताक्षरकर्ताओं ने न्याय के लिए लड़ने वाले और देश में सांप्रदायिक सद्भाव स्थापित करने के प्रयास के लिए बौद्धिक और अकादमिक हलकों में एक विशेष पहचान रखने वाले जमाअत इस्लामी हिन्द जैसे सामाजिक संगठन के खिलाफ बेबुनियाद और गंभीर आरोप लगा दिए? किस आधार पर मौलाना मौदुदी जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त इस्लामी विद्वान पर आरोप लगाए गए? जिन हस्ताक्षरकर्ताओं के साथ इंडिया टुमारो ने टेलीफोन पर बातचीत की, उनके जवाबों से यह आभास हुआ कि पत्र वैश्विक स्तर पर इस्लामोफोबिया में विशेषज्ञता रखने वाले किसी थिंक टैंक के व्यक्ति द्वारा तैयार किया गया है और हस्ताक्षरकर्ताओं ने निराधार आरोपों को आधार प्रदान करने के एक गलत इरादे के साथ बिंदीदार रेखाओं पर हस्ताक्षर किये हैं.

हस्ताक्षर करने वालों में सबसे पहले व्यक्ति प्रोफेसर आनंद कुमार हैं. वह हिमाचल प्रदेश के शिमला में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज़ में नेशनल फेलो हैं. उन्होंने फोन पर बताया कि वह मौदूदी की राजनीतिक विचारधारा से परिचित हैं. जब उनसे मौदूदी की किताबें पढ़ने पर हां या ना में जवाब मांगा गया तो वो चिढ़ने लगे. हालाँकि हमने पहले ही अपने पूरे नाम के साथ एक पत्रकार के रूप में अपना परिचय दिया था, उन्होंने फिर से दोबारा मेरा नाम पूछा. मुस्लिम नाम सुनने के फ़ौरन बाद उन्होंने मुझसे कहा कि, “मुझे आपसे बात करने में कोई दिलचस्पी नहीं है” और तुरंत कॉल काट दिया.

पत्र के एक अन्य हस्ताक्षरकर्ता प्रो. भरत गुप्त हैं, जो दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग से सेवानिवृत्त हुए हैं. प्रो भरत ने पत्र की सामग्री को उचित ठहराने की हर सम्भव कोशिश की, लेकिन उन्होंने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि उन्होंने मौदूदी की कोई किताब नहीं पढ़ी हैं. उन्होंने कहा, ‘मैं आगे कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता’. उन्होंने इस सवाल का कोई जवाब नहीं दिया कि कैसे कोई किसी विद्वान की किताबें और साहित्य पढ़े बिना उसके खिलाफ बेबुनियाद आरोप लगा सकता है.

यही सवाल हमने दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रो. संगीत कुमार रागी से भी किया. क्या उन्होंने मौदुदी की किताबें पढ़ी हैं? इसका उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन दावा किया कि “पत्र जिम्मेदारी की भावना के साथ लिखा गया है”. जब हमने अपने सिर्फ इसी सवाल पर ज़ोर दिया तो उन्होंने कहा, “मैं आपके प्रति जवाबदेह नहीं हूं.”

जब उनसे पूछा गया कि वह एक ऐसे लेखक के खिलाफ इतने बड़े आरोप कैसे लगा सकते हैं, जिनकी किताबें उन्होंने पढ़ी ही नहीं है, तो फिर दुबारा उन्होंने यही जवाब दिया कि “मैं आपके प्रति जवाबदेह नहीं हूं.”

पत्र पर हस्ताक्षर करने वाली महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी ऑफ बड़ौदा (गुजरात) में पत्रकारिता और जनसंचार विभाग में पढ़ाने वाली डॉ निधि शेंदुरनिकर से इस मुद्दे पर सवाल किए जाने पर उन्होंने जवाब दिया, “मैं टिप्पणी नहीं करना चाहती.” हालांकि, उसने माना कि उसने मौदूदी को नहीं पढ़ा है.”

हमने जम्मू विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संकाय में प्रो. हरिओम महाजन को भी फोन किया. उन्होंने कहा कि वह मौदूदी की पढ़ी हुई किताबों का नाम देंगे. लेकिन अब तक वो कोई नाम नहीं बता पाए हैं. VIMHANS, दिल्ली में सर्जन डॉ शिल्पी तिवारी और गुजरात की एमएस यूनिवर्सिटी ऑफ बड़ौदा में इतिहास विभाग के प्रोफेसर डॉ दिलीप कटारिया को किए गए कॉल का कोई हमें कोई जवाब नहीं मिल पाया.

अन्य हस्ताक्षरकर्ता जैसे भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी), बैंगलोर के प्रो कांची गोपीनाथ, केंद्र सरकार कॉलेज, दमन और दीव के सेवानिवृत्त व्याख्याता डॉ अनिल कुमार वाजपेयी, तमिलनाडु शहरी अध्ययन संस्थान के पूर्व निदेशक प्रो पी कनागसाबापति, नेशनल सेंटर फॉर हिस्टोरिकल रिसर्च एंड कम्पेरेटिव स्टडीज के नीरज अत्री और जीजीएस मेडिकल कॉलेज पंजाब के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ सतीश मल्होत्रा, इन सभी के कॉन्टेक्ट नम्बर उपलब्ध न होने के कारण संपर्क नहीं हो पाया.

इसी तरह, हरियाणा में ऋषिहुड विश्वविद्यालय से डॉ भक्ति देवी, डॉ माला कपाड़िया, प्रो प्रशांत सिंह, साहिल अग्रवाल और डॉ सौम्या डे से संपर्क नहीं किया जा सका. डॉ. भक्ति देवी को भेजी गई प्रश्नावली का कोई उत्तर नहीं मिला. इसी तरह, हरियाणा के अंबाला जिले में एमएमडी विश्वविद्यालय के डॉ प्रेम प्रकाश खोसला, हरियाणा के भिवानी की चौधरी बंसी लाल विश्वविद्यालय के प्रो वेद प्रकाश कुमार, और अहमदाबाद के बाहरी इलाके में स्थित इंडस यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर इंडिक स्टडीज के डॉ रितेंद्र शर्मा और डॉ अंकुर कक्कड़ से भी कॉन्टेक्ट नम्बर की अनुपलब्धता के कारण संपर्क नहीं हो पाया.

जब वरिष्ठ पत्रकार और कार्यकर्ता मधु किश्वर से पूछा गया कि मौदूदी की किस किताब से उन्होंने यह उल्लेख किया है कि मौदुदी ने पूरी दुनिया में गैर-मुसलमानों के नरसंहार का आह्वान किया है? तो उन्होंने कॉल कट कर दी. हालांकि, एक लिखित जवाब में उन्होंने कहा, “मैं आपके साथ इस तरह से एंगेज होना नहीं चाहती, मुझे जो कुछ भी कहना होगा, मैं उसे अपनी वेबसाइट पर पोस्ट कर दूंगी या प्रेस को जारी कर दूंगी.”

विदेशी हस्ताक्षरकर्ताओं में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ गौतम सेन, लागार्डिया कम्युनिटी कॉलेज की प्रो लक्ष्मी बंदलामुडी, सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्यूयॉर्क की प्रो. उमा अय्यर, ब्रोंक्स कम्युनिटी कॉलेज, सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्यूयॉर्क के शिक्षक भी शामिल हैं. नेट पर उपलब्ध उनके संक्षिप्त बायोडाटा के अनुसार, डॉ गौतम सेन वर्तमान में वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ हिंदू एकेडमिक्स के अध्यक्ष और धार्मिक विचारों और नीति फाउंडेशन के सह-निदेशक हैं. कई प्रयासों के बावजूद तीन विदेशी हस्ताक्षरकर्ताओं से संपर्क नहीं किया जा सका. प्रो. उमा अय्यर को भेजी गई प्रश्नावली का कोई उत्तर नहीं मिला.

मौलाना मौदूदी के साहित्य से आरोपों की पुष्टि नहीं होती है

पत्र लेखकों ने अपने आरोपों को प्रमाणित करने के लिए 23 संदर्भ दिए हैं लेकिन कोई भी संदर्भ मूल स्रोतों, यानी मौलाना मौदूदी की किताबों से नहीं है.

संदर्भों में mdpi.com स्विट्जरलैंड में प्रकाशित एक वेबसाइट शामिल है. यह वैज्ञानिक पत्र प्रकाशित करता है. लेकिन वैज्ञानिक पेपर प्रकाशित करने वाली वेबसाइट पर धर्म पर एक पेपर कैसे प्रकाशित हुआ, यह एक बड़ी पहेली है.

पत्र में उल्लिखित आरोपों के संबंध में इस्तेमाल किए गए अन्य संदर्भो में theconversation.comassets.publishing.service.gov.uktheprint.indawn.com और magazine.outlookindia.com जैसी वेबसाइटों और न्यूज़ पोर्टल्स के लिंक शामिल हैं.

पत्र में आउटलुक पत्रिका में प्रकाशित इस्लामोफोबिक नोबेल पुरस्कार विजेता सर वीएस नायपॉल का एक साक्षात्कार, प्रेसीडेंसी कॉलेज, कोलकाता विश्वविद्यालय के नवरस जे आफरीदी, मिडिलसेक्स विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर केविन मैकडोनाल्ड, “मुस्लिम ब्रदरहुड रिव्यू: मेन फाइंडिंग्स” शीर्षक से प्रकशित यूके हाउस ऑफ कॉमन्स की एक रिपोर्ट, वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण स्वामी, पाकिस्तानी पत्रकार नदीम एफ प्राचा, और न्यू एज इस्लाम में प्रकाशित एक लेख संदर्भ के तौर पर शामिल किए गए हैं, जिसमें दावा किया गया है कि कैसे मौदूदी की शिक्षाएं भारत के लिए एक गंभीर खतरा हैं. इसलिए, उन्होंने भारत में मौदूदी की पुस्तकों के प्रकाशन-प्रसार और भारतीय विश्वविद्यालयों में इस्लामी पाठ्यक्रमों में इसके शिक्षण पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है. पत्रकार सुल्तान शाहीन द्वारा स्थापित बहुभाषी समाचार पोर्टल ‘न्यू एज इस्लाम’ भारतीय मुसलमानों के बीच बहुत अधिक विश्वसनीय रूप में नहीं जाना जाता है.

पत्र में कहा गया है कि उनका जोश बंटवारे के दौरान भी हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करवाने के प्रति कम नहीं हुआ. उन्होंने अमेरिकी इतिहासकार विल ड्यूरेंट की किताब, द सर्वे ऑफ सिविलाइजेशन : अवर ओरिएंटल हेरिटेज से एक पैराग्राफ उद्धृत किया है. ड्यूरेन्ट ने अपने लेखन में इस्लाम और मुसलमानों के प्रति अपनी शत्रुता दिखाई है. पत्र में ड्यूरेंट की किताब से उद्धृत एक पैराग्राफ में दावा किया गया है कि भारत के अंदर रहने वाले मुसलमान भारतीय सभ्यता के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं.

पत्र में दावा किया गया है कि पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) मौदूदी की विचारधारा से प्रेरित है.

पत्र में इंडियन मुजाहिदीन, इस्लामिक स्टेट के भारत प्रांत, जेकेएलएफ, हुर्रियत और रज़ा अकादमी के निर्माण के लिए भी मौदूदी की विचारधारा को ही ज़िम्मेदार बताया गया है. इसमें कहा गया है कि मौदूदी द्वारा स्थापित जमात-ए-इस्लामी हिंद (JIH) “भारत के सम्पूर्ण इस्लामीकरण के लिए प्रतिबद्ध है” जिसका उद्देश्य “भारत के गैर-मुसलमानों का नरसंहार” है.

पत्र में आगे कहा गया है कि अल-कायदा, आईएसआईएस, हमास, हिजबुल्लाह, मुस्लिम ब्रदरहुड, तालिबान आदि जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन “मौदूदी की मूल विचारधारा और राजनीतिक इस्लाम के ढांचे से अपनी प्रेरणा प्राप्त करते हैं.”

पत्र में दावा किया गया है कि मौदूदी की शिक्षाओं के प्रभाव के कारण ही भारत में इस्लामवादी समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का विरोध कर रहे हैं, जो पूरी तरह से झूठ है.

क्या मौलाना मौदूदी के लेखन में गैर-मुसलमानों के खिलाफ नरसंहार का आह्वान है?

क्या मौलाना मौदुदी ने गैर-मुसलमानों के खिलाफ हिंसा और नरसंहार का आह्वान किया था? मौलाना मौदूदी की किताबें पढ़ने वाले इस बात का खंडन करते है. उनका कहना है कि मौदूदी की किसी भी किताब में एक भी वाक्य ऐसा नहीं है जिसमें उन्होंने चरमपंथ, आतंकवाद, भूमिगत गतिविधियों या किसी समुदाय के खिलाफ हिंसा का समर्थन किया हो. एएमयू, जामिया मिल्लिया इस्लामिया और जामिया हमदर्द जैसे विश्वविद्यालय जहां मौलाना मौदुदी की किताबें पढ़ाई जाती रही हैं, उन्होंने कोई आतंकवादी पैदा नहीं किया है.

मीडियाकर्मियों के साथ एक साक्षात्कार में, एक इस्लामी विद्वान डॉ. रज़ीउल इस्लाम नदवी ने कहा कि यह आरोप कि मौदूदी ने गैर-मुसलमानों के खिलाफ नरसंहार का आह्वान किया था सिर्फ अफवाहों पर आधारित हैं. उनका कहना है कि मौलाना मौदूदी पर लगे तमाम आरोप निराधार हैं. मौलाना मौदूदी ने कभी भी किसी भी प्रकार की हिंसा का समर्थन नहीं किया.

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में इस्लामी अध्ययन विभाग के अध्यक्ष मोहम्मद इस्माइल और एएमयू के ही ओबैदुल्लाह फहद भी डॉ. नदवी की ही बातों का समर्थन करते है. दरअसल मौलाना मौदुदी ने अपने विचारों में हमेशा राजशाही, तानाशाही और वंशवादी शासन का विरोध किया है और इसी वजह से सऊदी अरब में उनकी किताबों पर प्रतिबंध है.

सैय्यद कुतुब भी सरकारों के गठन के संबंध में मौलाना मौदूदी के विचारों से सहमत हैं. ये दोनों लोकतंत्र का समर्थन करते हैं और उनकी लोकतंत्र की विचारधारा इस्लाम के सिद्धांतों पर आधारित है, जो निस्संदेह लोकतंत्र की पश्चिमी परिभाषा से भिन्न हैं.

क्यों निशाने पर हैं मौलाना मौदूदी?

मौलाना मौदूदी ने जब गैर-मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की कोई अपील नहीं की, लोकतंत्र के लिए खड़े रहे, वंशवादी शासन और तानाशाही की निंदा करते हैं, तो आखिर मौलाना मौदुदी को क्यों निशाना बनाया जा रहा है? शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों ने जो मुसलमानों के संबंध में वैश्विक विकास को लेकर ताज़ातरीन जानकारियां रखते हैं, कहते हैं कि मौदूदी और मिस्र के विद्वान सैय्यद कुतुब की शिक्षाओं ने हमेशा मुसलमानों को दुनिया भर में, अमेरिका, यूरोप और किसी भी जगह की स्थानीय गैर-मुस्लिम संस्कृतियों में विलीन हो जाने से बचाया है.

यदि कोई इन दोनों लेखकों के साहित्य को पढ़ता है तो वह यही पायेगा कि उनकी शिक्षाएं कुरान और पैगंबर मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सुन्नत पर आधारित हैं. जटिल धार्मिक शब्दावली का उपयोग किए बिना, उन्होंने मुस्लिम समाज से सभी पूर्व-इस्लामिक और गैर-इस्लामी प्रथाओं को खत्म करने का तार्किक विचार प्रस्तुत किया है. चूंकि संस्कृति धर्म से उत्पन्न होती है, इसलिए इसमें उस धर्म के प्रभाव होते हैं जिससे यह विकसित हुई है. इसलिए गैर मुस्लिमों के धर्मों और स्थानीय परंपराओं के आधार पर गैर-मुस्लिम संस्कृतियों में उनके धर्म के तत्व होंगे जो इस्लाम की शिक्षाओं के विपरीत हो सकते हैं, जो एक एकेश्वरवादी धर्म है, जिसमें संप्रभुता केवल ईश्वर की है. कभी-कभी संस्कृति और धर्म इतना अधिक मिल जाते हैं कि संस्कृति ही धर्म बन जाती है और धर्म संस्कृति बन जाता है. इसलिए, संस्कृति और धर्म को अलग नहीं किया जा सकता है.

मौदूदी और सैय्यद कुतुब के साहित्य को पढ़ने के बाद ही धर्म के ये बारीक बिंदु बिल्कुल स्पष्ट हो जाते हैं. दोनों लेखकों द्वारा प्रयुक्त भाषा इतनी सरल है कि इसे विद्वान और आम आदमी समान रूप से समझ सकते हैं. यूरोप में इन दोनों लेखकों के साहित्य का प्रसार यूरोपीय सरकारों की स्थानीय संस्कृति में मुसलमानों को आत्मसात करने या दूसरे शब्दों में, उन्हें ईसाई धर्म में परिवर्तित करने की एक बड़ी योजना में एक बड़ी बाधा के रूप में सामने आया है.

मिस्र में सैय्यद कुतुब द्वारा स्थापित संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड के स्वयंसेवकों ने मुसलमानों द्वारा यूरोपीय संस्कृति में खुद को आत्मसात करने के खिलाफ एक प्रमुख भूमिका निभाई है. इसलिए, यूरोपीय देशों में स्थानीय मीडिया और विश्व स्तर पर पश्चिम नियंत्रित अंतरराष्ट्रीय मीडिया द्वारा मुस्लिम ब्रदरहुड के खिलाफ एक दुष्प्रचार अभियान शुरू किया गया था.

इसी तरह, मौलाना मौदुदी का साहित्य, जो कि भारत में उतना लोकप्रिय नहीं है, परंतु यह भारत में सांस्कृतिक मुसलमानों के हिन्दुकरण के लिए एक बाधा है. आरएसएस के एक वरिष्ठ विचारक राम माधव ने इस साल जून में द प्रिंट के साथ एक साक्षात्कार में स्पष्ट रूप से कहा कि भारतीय मुसलमानों की एक अलग धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान और उम्मा का कॉन्सेप्ट (धर्म से बंधी और राष्ट्र की सीमाओं से ऊपर उठकर एक समुदाय का विचार ) की अवधारणा भारतीय समाज मे मुस्लिमों के मेल के लिए एक बड़ी बाधा है. एक दूसरे से जुड़े ये घटनाक्रम काफी हद तक भारत में मौलाना मौदुदी को निशाना बनाये जाने का कारण हैं.

इस स्टोरी को अंग्रेज़ी में पढ़ें: Why Was Maulana Maududi On The Target In The ‘Open Letter To PM Modi’?

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