Friday, August 12, 2022
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AMU ने मौदूदी और सैयद क़ुतुब की किताबों को पाठ्यक्रम से हटाया; जामिया ने धर्मनिर्पेक्ष बताया

सैयद ख़लीक अहमद

नई दिल्ली | एक ओर जहां अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) ने दो अन्तर्राष्ट्रीय इस्लामी विद्वानों – सैयद अबुल अला मौदूदी और सैयद कुतुब शहीद की किताबों को वर्तमान शैक्षणिक वर्ष के इस्लामिक अध्ययन के अपने पाठ्यक्रम से हटा दिया है तो वहीं जामिया मिलिया इस्लामिया का इस सम्बन्ध में कहना है कि उसका पाठ्यक्रम देश के सेक्युलर मूल्यों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है और विश्वविद्यालय में इस्लामी अध्ययन पाठ्यक्रम में विश्व के सभी धर्मों के मूल सिद्धांतों को पढ़ाया जाता है, जिनमें भारत में उनकी उत्पत्ति भी शामिल है.

यह मुद्दा उस समय चर्चा में आया जब कथित तौर पर सरकार समर्थक 24 दक्षिणपंथी पृष्ठभूमि वाले विद्वानों ने कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र भेजा, जिसमें मौलाना मौदूदी और सैयद कुतुब शहीद के धार्मिक और राजनीतिक विचारों को केंद्रीय और सरकार द्वारा वित्त पोषित विश्वविद्यालय (एएमयू और जामिया) और निजी तौर पर संचालित जामिया हमदर्द के इस्लामी अध्ययन पाठ्यक्रमों में पढ़ाने पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी. पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों ने दावा किया कि दो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध उक्त इस्लामी विद्वानों के लेखन हिंसा और आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं.

हालांकि पत्र लिखने वाले ये दक्षिणपंथी विद्वान उक्त दोनों लेखकों की किताबों में से एक भी पैराग्राफ ऐसा नहीं बता पाए जो हिंसा को उकसाता हो या हिंसा का समर्थन करता हो. मौलाना मौदूदी का जन्म अविभाजित भारत में हुआ था और 1947 में विभाजन के समय वह पाकिस्तान चले गए थे और सैयद कुतुब मिस्र के इस्लामी विद्वान थे. दोनों समकालीन थे और उन्होंने अपनी-अपनी पीढ़ियों के मुसलमानों को इस्लामी विचारों और लेखन से प्रभावित किया साथ ही उनके लेखन आज भी दुनिया भर के मुसलमानों को प्रभावित करते हैं.

जामिया मिलिया इस्लामिया के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उनके विश्वविद्यालय में देश के धर्मनिर्पेक्ष स्वभाव को बनाए रखते हुए इस्लामिक अध्ययन को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में पढ़ाया जाता रहा है.

उक्त अधिकारी ने बताया कि, “विश्वविद्यालय ज्ञान के केंद्र होते हैं जहां छात्रों को विभिन्न विचारधाराओं के बारे में पढ़ाया जाता है. छात्रों को किसी भी तरह के विचारों और विचारधाराओं की आलोचना और विरोध करने के लिए भी उन विचारों या विचारधाराओं का ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता होती है. छात्रों को महत्वपूर्ण विचारधाराओं के बारे में कैसे पता चलेगा अगर उन्हें इसके बारे में पढ़ाया ही न जाये या अध्ययन करने की अनुमति न दी जाये. जामिया देश का एक प्रमुख केंद्रीय विश्वविद्यालय है, जिसने विज्ञान, तकनीक और अन्य क्षेत्रों में कई उपलब्धि हासिल की है. जेएमआई को हाल ही में एनआईआरएफ रैंकिंग 2022 के अनुसार देश के तीसरे सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया था.”

मौलाना मौदूदी या सैयद कुतुब पर जामिया पाठ्यक्रम में कोई अनिवार्य पेपर या वैकल्पिक पेपर नहीं हैं. कुछ विषयों के लिए ही उनकी पुस्तकें पढ़ने का सुझाव दिया जाता है. छात्र इसी विषय पर अन्य लेखकों की किताबें पढ़ने के लिए स्वतंत्र हैं. पाठ्यक्रम के रेफरेंस सेक्शन में मौलाना मौदुदी की मात्र दो पुस्तकें दीनियात (इस्लामी धार्मिक विश्वास) और तफ़हीमुल कुरआन (कुरान को समझने की ओर) हैं.

प्रतिबन्ध के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय को अब तक प्रधानमंत्री कार्यालय, शिक्षा मंत्रालय या विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से मौलाना मौदूदी और सैयद कुतुब को इस्लामिक अध्ययन पाठ्यक्रम से बाहर करने का कोई निर्देश नहीं मिला है.

अधिकारी ने पीएम को पत्र लिखने वालों की काबिलियत पर सवाल उठाया और पूछा कि, “क्या उन्हें लगता है कि जामिया चलाने वालों को नहीं पता कि देश के लिए क्या अच्छा है या क्या बुरा? मीडिया द्वारा प्रकाशित उनके पत्र की सामग्री से ऐसा लगता है कि पत्र लिखने वाले विद्वान शिक्षा के बारे में चिंतित नहीं हैं. बल्कि उनका कुछ उल्टा एजेंडा है. क्या अब किसी भी राह चलते व्यक्ति की मांग पर पाठ्यक्रम में बदलाव करेंगे?”

जामिया अपने इस्लामी अध्ययन पाठ्यक्रम में सभी प्रमुख विश्व धर्मों को शामिल करता है

विश्विद्यालय के इस्लामिक स्टडीज़ सेक्शन में प्रमुख इस्लाम के अलावा हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, यहूदी धर्म, ईसाई धर्म, जैन धर्म, सिख धर्म, बहाइज्म, कन्फ्यूशीयनिज्म, ताओइज्म और शिंटोइज्म भी पढ़ाये जाते हैं. हिंदू धर्म के पाठ्यक्रम में शामिल विषयों में हिंदू धर्म की बुनियादी विशेषताएं, भगवान, मनुष्य और ब्रह्मांड की अवधारणा, मानव भाग्य और मुक्ति, और हिंदू धर्म के विभिन्न संप्रदाय शामिल हैं. बौद्ध धर्म के तहत विषयों में बुद्ध का जीवन, बुनियादी बौद्ध अवधारणाएं, चार महान सत्य, अष्टांगिक मार्ग और भारत में बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म का संगम शामिल हैं.

इसी तरह, यहूदी धर्म खंड के तहत विषयों में यहूदी धर्म में ईश्वर, सृजन और मनुष्य का अर्थ, यहूदी धर्म में रहस्योद्घाटन, नैतिकता और न्याय की अवधारणा, “चुने हुए लोग” और इज़राइल शामिल हैं. ईसाई धर्म में शामिल विषय यीशु, ईसाई दृष्टिकोण, ईसाई धर्म की बुनियादी शिक्षाएं, प्रमुख संप्रदाय या ईसाई धर्म की शाखाएं: रोमन कैथोलिकवाद, पूर्वी रूढ़िवादी और प्रोटेस्टेंटवाद, और ईसाई मिशन: विचारधारा और इतिहास हैं.

एएमयू ने अपने पुस्तकालयों से मौदूदी और सैयद कुतुब पर आधारित किताबें हटाईं

यह पुष्टि करते हुए कि एएमयू ने मौदुदी और सैयद कुतुब को अपने पाठ्यक्रम से हटा दिया है, विश्वविद्यालय के इस्लामी अध्ययन विभाग के अध्यक्ष और प्रोफेसर मोहम्मद इस्माइल ने इंडिया टुमारो को बताया कि उन्होंने विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर तारिक मंसूर के निर्देश पर यह फैसला किया.

मौलाना मौदुदी की 100 से ज़्यादा किताबें और सैयद कुतुब की 40 किताबें एएमयू लाइब्रेरी से हटा ली गई हैं.

मौलाना मौदूदी और सैयद कुतुब के विचारों का समर्थन करते हुए प्रोफेसर इस्माइल ने कहा कि ये दोनों इस्लामिक विचारक एएमयू के इस्लामिक अध्ययन पाठ्यक्रम का हिस्सा रहे हैं और उनकी किताबें विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों द्वारा पढ़ी जाती थीं. “हालांकि, उनकी किताबें पढ़ने वाला कोई भी आतंकवादी नहीं बना,” प्रो. इस्माइल ने पीएम मोदी को भेजे गए पत्र के जवाब में एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी में यह बात कही. पाठ्यक्रम के विषयों में मौलाना मौदुदी के महत्वपूर्ण कार्य, उनके विचार और कुरान के उनके तफ़सीर (व्याख्यान) में मुख्य बिंदु शामिल थे – जिसका शीर्षक तफ़हीमुल कुरान और इस्लामिक स्टेट की अवधारणा है. अध्ययन के लिए सुझाई गई किताबों में सैयद कुतुब की दि माइलस्टोन भी शामिल है.

प्रो. इस्माइल से जब मौलाना मौदूदी और सैयद कुतुब की किताबों में मौजूद सामग्री के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि, “उनकी शिक्षाएँ बहुत प्रगतिशील हैं और सामाजिक समानता, समतावाद, जनकल्याण पर ध्यान केंद्रित करती हैं और मुस्लिम देशों सहित सभी देशों में लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकारों के समर्थन बहस करती हैं.”

उन्होंने कहा, “जहां तक ​​उनके राजनीतिक विचारों का सवाल है तो दोनों लेखकों का ज़ोर सरकार के लोकतांत्रिक स्वरूप पर ही रहा है. सैयद कुतुब और मौलाना मौदूदी की किताबों को विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम से हटाए जाने का कोई ठोस आधार मुझे नज़र नहीं आता है.”

प्रोफेसर ने आगे कहा कि, “दोनों ने अपने लेखन में राजशाही और वंशवादी शासन की कड़ी निंदा की है और कहा है कि सरकार के ये रूप इस्लाम की राजनीतिक शिक्षाओं के विपरीत हैं. इसीलिए सऊदी अरब के साम्राज्य ने मौलाना मौदूदी की सभी पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाया हुआ है.”

पीएम को पोस्ट किए गए पत्र के संबंध में प्रो. इस्माइल ने कहा कि पत्र में कहीं भी मौदुदी या सैयद कुतुब के लेखन से एक भी ऐसे वाक्य या पैराग्राफ का उल्लेख नहीं है जिसे आपत्तिजनक कहा जा सके.

पश्चिमी दुनिया मौदुदी की निंदा करती है क्योंकि उसकी आवाज़ पश्चिमी उपनिवेशवाद के खिलाफ ज़ोरदार प्रहार करती हैं

प्रो. ओबैदुल्ला फहद, जो एएमयू के इस्लामिक स्टडीज विभाग में पढ़ाते हैं, ने सोशल मीडिया पर प्रसारित एक वीडियो में कहा कि, “पश्चिमी दुनिया ने मौलाना मौदूदी के खिलाफ बदनामी का अभियान शुरू किया है, क्योंकि पश्चिमी उपनिवेशवाद के खिलाफ मुस्लिम दुनिया में मौदूदी की आवाज़ ही सबसे मज़बूत है.”

प्रो फ़हद कहते हैं कि, “मैं मौलाना मौदूदी को पिछले 50 सालों से पढ़ रहा हूं. मैं उनके कार्यों के बारे में पढ़ाता रहा हूं और अपने अकादमिक करियर के दौरान उनके काम पर कई रिसर्च प्रोजेक्ट्स का पर्यवेक्षण भी किया है लेकिन मुझे उनके काम में एक शब्द भी नहीं मिला जो हिंसा और आतंकवाद को बढ़ावा देता हो या भूमिगत गतिविधियों को प्रोत्साहित करता हो. मौदूदी लोगों को पैगंबर मोहम्मद द्वारा अपनाए गए शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीकों का पालन करने की सलाह देते हैं.”

उन्होंने कहा, “जब उन्हें पाकिस्तान में अयूब खान के शासन के दौरान जेल में डाल दिया गया था तो उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को सरकार के खिलाफ हिंसा या भूमिगत गतिविधियों का सहारा नहीं लेने का निर्देश दिया था. उन्होंने ऐसे समय में भी उन्हें देश के कानून का पालन करने के लिए कहा था.”

प्रो फ़हद दावा करते हैं कि, “मौलाना मौदुदी को दुनिया भर के बुद्धिजीवियों और शिक्षाविदों द्वारा पढ़ा जाता है क्योंकि उनके लेखन में उच्च कोटि के तर्क मौजूद हैं.”

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