Saturday, August 13, 2022
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संविधान पर शपथ लेने वाले बुलडोज़र से क्यों चला रहे लोकतंत्र?

-मसीहुज़्ज़मा अंसारी

देश को बुलडोज़र से चलाने की प्रतिस्पर्धा में कई राज्य आगे निकलने की होड़ में लगे हुए हैं. सत्ता समर्थित भीड़ द्वारा हिंसा के बाद बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया के मुसलमानों के घरों पर बुलडोज़र चलाकर उन्हें ‘ज़मीदोज़’ कर, बहुसंख्यक भावना को ख़ुश करके गौरवान्वित महसूस किया जा रहा.

आज़ादी के अमृत महोत्सव पर बुलडोज़र से अल्पसंख्यक घरों को ज़मीदोज़ करने का महोत्सव मनाया जा रहा है. सुनियोजित तरीके से दंगे या हिंसा कराकर वर्ग विशेष को आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से पीछे धकेलने का काम दशकों से जारी है. लेकिन हिंदुत्व के नए अवतारों ने बुलडोज़र से मुसलमानों के घरों को गिराकर न्याय का मखौल उड़ाने की प्रक्रिया में नया कीर्तिमान स्थापित किया है.

देश के पूर्व आईएएस अधिकारी हर्ष मंदर ने कहा था कि अगर राज्य नहीं चाहेगा तो कोई भी हिंसा या बड़ा दंगा नहीं हो सकता है….

एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में साम्प्रदायिक घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है. साल 2014 से 2020 तक देशभर में हुए सांप्रदायिक दंगों में कुल 180 लोगों ने अपनी जान गंवा दी. इनमें से एक तिहाई से अधिक मौतें साल 2020 के में हुईं, इसी वर्ष नॉर्थ ईस्ट दिल्ली में भी दंगे हुए थे.

देश के विभिन्न शहर बने हिंसा की प्रयोगशाला

पिछले कुछ वर्षों में अलग-अलग राज्य की सरकारों द्वारा जनता से बदला लेने जैसी बातें सुनने में आई हैं और सरकारें जो बदलाव के लिए चुनी जाती हैं, बदले की भावना से काम करने लगी हैं जिसका सार्वजनिक तौर पर गुड़गान भी किया जाने लगा है.

अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग के लिए सड़कों पर प्रदर्शन के लिए उतरने वाले मुसलमानों को दंगाई और बलवाई जैसे शब्दों से सुशोभित किया गया है. इस गंदे खेल में मुख्यधारा मीडिया ने भी अपनी भूमिका निभाई है. हालांकि अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरना किसी भी नागरिक का संवैधानिक अधिकार है. लेकिन सरकारों को यह अच्छा नहीं लगता कि उनसे सवाल किया जाए.

सुनियोजित तरीके से शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को हिंसक बनाकर या हिंसक बताकर क़ानूनी कार्रवाई के नाम पर उनके घरों को लगातार गिराया जा रहा है. राज्य सरकारें मुस्लिम घरों को गिराने में जितनी जल्दबाज़ी दिखाती हैं, उतनी जल्दबाज़ी विकास कार्य पर दिखाएं तो देश छोड़कर अन्य देशों में जानेवाले अरबपतियों की संख्या में कमी आएगी.

हाल ही में इलाहाबाद में पैग़म्बर पर अपमानजनक टिप्पणी करने वाले भाजपा के निलंबित प्रवक्ताओं को गिरफ्तार करने की मांग को लेकर प्रदर्शन हुआ जिसमें कुछ अराजक तत्वों ने पुलिस पर पत्थर फेंके. इस घटना के बाद शहर के मशहूर समाजसेवी जावेद मोहम्मद को निशाना बनाते हुए उनके घर को बुलडोज़र से गिरा दिया गया. एक निर्दोष मुसलमान के घर को गिराए जाने का लाइव प्रसारण मुख्यधारा या सरकारी मीडिया ने ‘विजयोत्सव’ के तौर पर दिखाया.

मीडिया ने दिनभर जावेद मोहम्मद की तस्वीर दिखाकर इतनी बार ‘आरोपी’ कहा कि शाम होते होते इलाहाबाद हिंसा के आरोपी के रूप में जावेद मोहम्मद की तस्वीर टीवी स्क्रीन से देश के बहुसंख्यक के ज़ेहन में उतर गई.

हालांकि, बदले की भावना में कई गई जल्दबाज़ी में इलाहाबाद प्रशासन ने कई ऐसी गलतियां कर दीं जिसके लिए उन्हें लंबी क़नूनी लड़ाई का सामना करना पड़ सकता है. जिस घर को जवेद मोहम्मद को बता कर गिराया गया वह आधिकारिक तौर पर वह घर जावेद मोहम्मद की पत्नी का है. उनकी पत्नी और बेटी को इलाहाबाद पुलिस ने 36 घंटे की अवैध हिरासत में रखा जिसपर महिला आयोग ने नोटिस भेजकर जवाब तलब किया है.

इस घटना की देश और दुनिभार में निंदा हो रही और बदले की भावना के नाम पर किया गया कृत्य देश को शर्मसार कर रहा है.

इसी प्रकार रमज़ान में मध्यप्रदेश के खरगोन रामनवमी के जुलूस में मस्जिद के सामने आपत्तिजनक नारे लगाए गए, भड़काऊ नारेबाज़ी की गई, जब मुसलमानों ने विरोध किया तो पुलिस ने बर्बरता की और उनके घरों को गिरा दिया गया. तपती धूप में रमज़ान के महीने में अपने घरों को खंडहर में तब्दील होती वो पथराई आंखे देख रही थीं जिन्हें जीवनभर की कमाई के बाद बनाया गया था और जिसे पल भर में बदले की करवाई के नाम पर ढहा दिया गया. मध्यप्रदेश में दर्जनों मुस्लिम परिवारों ने अपने घरों के खंडहर पर त्रिपाल तानकर रात गुज़ारी और वहीं ईद मनाई. मध्यप्रदेश में हुई हिंसा में एक मुस्लिम युवक की मौत भी हुई थी.

हाल ही में राँची में जुमे की नमाज़ के बाद भाजपा प्रवक्ता की गिरफ्तारी की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे मुस्लिम युवकों पर पहले लाठियां बरसाई गईं और फिर अंधाधुन गोलियां चलाई गई. इसमें दो मुस्लिम युवकों साहिल और मुदस्सिर की मौत हो गई. पुलिस ने अपने बयान में कहा कि हवाई फायरिंग की थी जबकि मारे गए मुदस्सिर को सर में और साहिल को गुर्दे में गोली लगी. एक और युवक को 6 गोलियां लगी, दर्जनों मुस्लिम युवकों को गोली लगी है जिनका रांची के रिम्स में इलाज चल रहा है.

रांची में हुई मुस्लिम प्रदर्शनकारियों पर बर्बरता ने नया आयाम तय किया है. मृतकों और घायलों पर मामला दर्ज किया गया है. मात्र एक प्रदर्शन करने पर गोलियां बरसाना और 2 युवकों जान से मार देना और एक युवा को 6 गोलियां मारना जलियांवाला बाग की याद दिलाता है.

कानपुर में भी हमने यही पैटर्न देखा, पुलिस की कार्रवाई पक्षपात पूर्ण थी और एक ऐसे व्यक्ति को मास्टरमाइंड बताया गया जो सामाजिक कार्यों और सौहार्द के कार्यों के लिए जाना जाता है.

क्या हिंसा के असल मुजरिमों को बचाया जा रहा?

हिंसा की पूरी क्रोनोलॉजी में असल अपराधी क़ानून से बच जाते हैं या यूं कह लें कि बचा लिए जाते हैं. भड़काऊ नारेबाज़ी के आरोपियों पर कोई कार्रवाई नहीं होती लेकिन विरोध करने वालों के घरों को ज़मीदोज़ किया जा रहा है. अपराधियों को सरकारी या क़नूनी संरक्षण मिल रहा है और पीड़ित अंतहीन पीड़ा का सामने करने को विवश हैं. देश में धर्म और जाति के आधार पर क़ानून और सत्ता का इस्तेमाल किया जा रहा. एक लोकतांत्रिक देश में इसके बहुत ही विनाशकारी और दूरगामी परिणाम हो सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट को ‘बुलडोज़र आतंक’ पर संज्ञान लेना चाहिए

राजनीतिक व धार्मिक प्रतिरोध और बदले की भावना से तेज़ रफ़्तार से अल्पसंख्यकों के घरों पर दौड़ते बुलडोज़र वास्तव में देश की न्यायपालिका का मज़ाक उड़ा रहे हैं. कानून के अनुसार न्यायिक प्रक्रिया के बिना किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है और दोषी व्यक्ति को सज़ा भी संविधान के अनुसार कोर्ट तय करेगा.

ऐसे समय में जब सरकारें क़नूनी प्रक्रिया का पालन न करें तो कोर्ट को यह अधिकार है कि वह स्वतः संज्ञान लेकर मामले की सुनवाई करे और क़नूनी प्रक्रिया द्वारा न्याय की संरक्षक के रूप में खड़ी हों. भारतीय अदालतों द्वारा स्वतः संज्ञान की कार्रवाई न्यायपालिका के प्रति लोगों में विश्वास पैदा करेगा.

सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि बुलडोज़र द्वारा घरों के ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को रोकने के लिए बेलगाम सरकारों को कटघरे में खड़ा करें.

न्यायतंत्र का मखौल उड़ाती बुलडोज़र पॉलिटिक्स

बदले की भावना, सबक सिखाने की उत्सुकता और ज़मीदोज़ करने की व्याकुलता ने न्यायतंत्र का देश और दुनिया में मज़ाक बनाया है. राजनीतिक विरोधियों को ख़ामोश करने या मुसलमानों को सबक़ सिखाने के नाम पर की जाने वाली कार्रवाई देश की लोकतांत्रिक संरचना को नुकसान पहुंचा रही है. क़ानून का मज़ाक बनते हुए देखकर जो लोग इसलिए ख़ुश हो रहे हैं कि पीड़ित, वर्ग विशेष से हैं तो उनको ये समझना चाहिए कि जब क़ानून का राज ही नहीं रहेगा तो उनके अधिकारों का हनन भी उसी मंशा के साथ होगा और वे कुछ नहीं कर सकेंगे. क्योंकि क़ानून की धज्जियां तो उनके सामने उड़ाई गईं जिसका वे उत्सव मनाने में शामिल थे. प्रदर्शन करने को अपराध बता रहे थे, धरने को देशविरोधी गतिविधि साबित कर रहे थे.

ऐसे समय में जब न्याय की आखरी उम्मीद कोर्ट हो तो देश के न्यायालयों को यहां की पीड़ित अवाम को निराश नहीं करना चाहिए.

देश की लोकतांत्रिक संरचना को बचाने के लिए सभी को आगे आना होगा, किसी को सबक सिखाने के लिए नहीं बल्कि क़ानून का राज स्थापित करने के उद्देश्य से. जब देश में बदले की भावना से कार्रवाई की जाने लगेगी तो देश का अस्तित्व ख़तरे में पड़ जाएगा, देश में अराजकता फैल जाएगी. इसलिए संविधान के अनुरूप न्याय और समानता स्थापित करने के लिए देश की आम जनता को आवाज़ उठाना होगा.

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