Saturday, August 13, 2022
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यूपी में लोकसभा की 2 सीटों पर उपचुनाव, रामपुर और आज़मगढ़ में पार्टियों ने उतारे प्रत्याशी

अखिलेश त्रिपाठी | इंडिया टुमारो

लखनऊ | उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 2 सीटों के लिए हो रहे उपचुनाव में रामपुर से आसिम रजा और आज़मगढ़ से धर्मेंद्र यादव को सपा ने अपना उम्मीदवार घोषित किया है। बसपा ने आज़मगढ़ से गुड्डू जमाली को अपना उम्मीदवार बनाया है और रामपुर से चुनाव न लड़ने का फैसला किया है। भाजपा ने आज़मगढ़ से अपने पूर्व प्रत्याशी दिनेश लाल यादव निरहुआ को उम्मीदवार बनाया है, जबकि रामपुर से सपा छोड़कर भाजपा में आए घनश्याम लोधी को उम्मीदवार बनाया है।

यूपी में जिन दो लोकसभा सीटों रामपुर और आजमगढ़ के लिए उपचुनाव हो रहा है, उन सीटों के सांसद आजम खां और अखिलेश यादव ने विधानसभा चुनाव में विधायक चुने जाने के बाद इन सीटों से इस्तीफा दे दिया था जिसके बाद यह सीटें रिक्त हो गई थीं, इसलिए इनका उपचुनाव हो रहा है।

सपा ने रामपुर सीट से आजम खां की पत्नी और पूर्व विधायक तंजीन फातिमा को उम्मीदवार बनाया था हालांकि, सपा नेता आजम खां ने पार्टी द्वारा घोषित उम्मीदवार अपनी पत्नी को चुनाव लड़ाने से इंकार कर दिया है। उनके स्थान पर रामपुर नगर सपा अध्यक्ष आसिम रजा को लोकसभा उपचुनाव में उम्मीदवार बनाए जाने का ऐलान कर दिया है। आसिम राजा आजम खां के बहुत ही करीबी हैं और यह आजम खां से काफी लंबे अरसे से जुड़े हुए हैं।

इसके साथ ही आजमगढ़ से पूर्व सांसद धर्मेंद्र यादव को चुनावी मैदान में उतारा है। रामपुर में आजम खां ने इतना विकास कार्य करवाया है कि लोग उनके मुरीद हैं। आजम खां ने जो जनता के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया है, उसमें उनके द्वारा मौलाना जौहर यूनिवर्सिटी का निर्माण भी है। सपा ने आजम खां के द्वारा छोड़ दी गई सीट पर आसिम रजा को अपना उम्मीदवार बनाया है। भाजपा को तो बड़ी मुश्किल से उम्मीदवार मिला है और वह भी सपा छोड़कर भाजपा में शामिल हुआ घनश्याम लोधी है।

बसपा सुप्रीमो मायावती ने तो अपना उम्मीदवार ही नहीं उतारा है। इन सभी राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए सपा उम्मीदवार अपने विरोधी उम्मीदवारों पर भारी पड़ेगा और विरोधी उम्मीदवार उनको चुनौती नहीं पेश कर सकेंगे तथा।

रामपुर के बाद आज़मगढ़ का नम्बर आता है। यहां पर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पहले बसपा संस्थापकों में शामिल बलिहारी बाबू के बेटे सुशील आनन्द को उम्मीदवार बनाया था। लेकिन सुशील आनन्द के अपने पैतृक गांव और आजमगढ़ शहर में दोनों जगह पर मतदाता होने के कारण चुनाव लड़ने में असमर्थता जताने की वजह से धर्मेंद्र यादव को नया उम्मीदवार बनाया है।

सुशील आनन्द ने अखिलेश यादव को पत्र लिखकर यह कहा था कि उनका नामांकन पत्र खारिज कर दिया जा सकता है, इसलिए वह उनके स्थान पर कोई दूसरा उम्मीदवार घोषित करें। सुशील आनन्द के पत्र मिलने के बाद अखिलेश यादव ने अपने चचेरे भाई और बदायूं के पूर्व सांसद धर्मेंद्र यादव को आजमगढ़ से सपा का उम्मीदवार घोषित कर दिया। अखिलेश यादव आजमगढ़ से सुशील आनन्द को उम्मीदवार बनाकर यादव और दलित वोटरों को एक साथ लाने का प्रयोग कर रहे थे, लेकिन सुशील आनन्द के उम्मीदवार न बने रहने से यह समीकरण फेल हो गया।

इसके साथ ही साथ अखिलेश यादव आजमगढ़ सीट पर अपना वर्चस्व और कब्जा बरकरार रखना चाहते हैं, जिससे वह इस सीट से खुद कभी चुनाव लड़ सकें या अपनी पत्नी डिंपल यादव को चुनाव लड़वा सकें। वैसे अखिलेश यादव अगर चाहते तो पूर्व सांसद रमाकांत यादव को यहां से चुनाव लड़वा सकते थे। रमाकांत यादव चुनाव जीत भी सकते हैं। किंतु 2024 के लोकसभा चुनाव में आगे चलकर रमाकांत यादव फिर यहां से दावेदारी पेश कर सकते हैं। इसीको देखते हुए अखिलेश यादव ने रमाकांत यादव को उम्मीदवार नहीं बनाया।

धर्मेंद्र यादव को कभी भी आजमगढ़ से दूसरी जगह पर शिफ्ट कर चुनाव लड़वा सकते हैं और उनको कोई दिक्कत नहीं होगी।आजमगढ़ में साढ़े तीन लाख यादव, 3 लाख मुस्लिम और 3 लाख दलित समाज के मतदाता हैं। 80 हजार राजभर मतदाता हैं।अखिलेश यादव इन मतदाताओं में से यादव और मुस्लिम समुदाय के वोटरों के सहारे आजमगढ़ लोकसभा चुनाव को जीतना चाहते हैं।

राजभर वोटर निर्णायक स्थिति में हैं। यह सपा को तभी मिलेंगे, जब सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर कहेंगे। ओम प्रकाश राजभर अपने बेटे के लिए सपा से एक विधान परिषद की सीट चाहते हैं, जिससे उनका बेटा विधान परिषद का सदस्य बन जाए। अगर अखिलेश यादव ओम प्रकाश राजभर को खुश कर लेते हैं, तो सपा आजमगढ़ सीट आसानी से जीत सकती है अन्यथा उसको हार का स्वाद भी चखना पड़ सकता है।

बसपा ने अपने पूर्व विधायक गुड्डू जमाली को आजमगढ़ लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाया है। बसपा सुप्रीमो मायावती हर हाल में इस सीट पर गुड्डू जमाली के जरिए कब्जा जमाना चाहती। बसपा सुप्रीमो मायावती इस सीट को जीतकर अपना खोया हुआ जनाधार वापस लाना चाहती हैं। यह चुनाव मायावती के लिए जीवन-मरण का सवाल है। मायावती के भाजपा से अंदरखाने मिलीभगत से बसपा ही नहीं खत्म हो गई है बल्कि मायावती का अस्तित्व भी खतरे में है। इसके साथ ही मायावती के परंपरागत वोटरों ने मायावती की लानत -मलानत करके बड़ा बेइज्जत किया है, इससे मायावती बहुत ज्यादा ही परेशान हैं। वह आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव जीतकर बसपा का जनाधार वापस लाने के साथ ही बसपा के कोर वोटरों का भरोसा हासिल करना चाहती हैं।

मायावती यह मानकर चल रही हैं कि अगर बसपा आजमगढ़ सीट जीत लेती है, तो उनका अस्तित्व भी बच जाएगा और बसपा नए सिरे से फिर एक राजनीतिक ताकत के रूप में खड़ी हो जाएगी अन्यथा मायावती और बसपा इतिहास बन कर रह जाएंगी। मायावती इस वक्त पूरी तरह खाली हैं और वह आजमगढ़ में पूरी ताकत से जुटेंगी। आजमगढ़ में 10 विधानसभा क्षेत्र हैं और इन सभी पर सपा का कब्जा है यानी सभी 10 विधायक सपा के हैं। इसके बावजूद अभी हाल ही में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में आजमगढ़ में बसपा को 2 लाख 20 हजार वोट मिले हैं। यह सभी वोट दलितों के हैं। दलितों ने सपा को वोट नहीं दिया है।

बसपा उम्मीदवार गुडडू जमाली विधानसभा चुनाव बसपा से इस्तीफा देकर ओवैसी की पार्टी से चुनाव लड़े थे और विधानसभा चुनाव हार गए थे। इसके बाद मायावती ने उनको बुलाकर फिर से बसपा में शामिल कर लिया था और उनको आजमगढ़ लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार घोषित कर दिया था। गुड्डू जमाली की स्थानीय मुस्लिम समुदाय के लोगों के बीच अच्छी पकड़ है। वह स्थानीय व्यक्ति हैं और काफी मिलनसार हैं। इन सभी खूबियों के चलते उनको मुस्लिम समुदाय के वोटरों का भारी संख्या में समर्थन मिलने की उम्मीद है। वह अपना अधिकांश समय आजमगढ़ में बिताते हैं और लोगों की दिक्कतें दूर करने का काम करते रहते हैं। इसका भी फायदा उनको मिल सकता है।

अगर मुस्लिम समुदाय के वोटरों ने गुडडू जमाली का साथ दिया, तो वह दलित और मुस्लिम वोटरों के सहारे बाजी पलट सकते हैं और बसपा को जीत हासिल हो सकती है। पूर्वांचल में दलित और यादव के बीच कभी भी आपस में नहीं बनती है और इनके बीच अक्सर कोई न कोई घटना घटित होती रहती है। पूर्वांचल में आजमगढ़, मऊ, लालगंज और जौनपुर में इनके बीच आये दिन कोई न कोई घटना होती रहती है। इनके आपस में टकराव के कारण ही आजमगढ़ में दलित राजनीति काफी मजबूत होकर उभरी। इसीका परिणाम रहा कि सुखदेव राजभर जैसे बड़े नेता बसपा में हुए और विधानसभा अध्यक्ष के पद पर बैठे। इसलिए मुस्लिम और दलित वोटरों के मिलने पर आजमगढ़ की बाजी बसपा के हाथ लग सकती है।

बसपा ने रामपुर से अपना उम्मीदवार नहीं उतारा है। वह सारा ध्यान आजमगढ़ में लगा रही है। बताया जाता है कि बसपा सुप्रीमो मायावती ने आजम खां के लिए इसलिए सीट छोंड़ दिया है, जिससे वह आगे चलकर भविष्य में आजम खां से तालमेल बिठा कर यूपी में नई राजनीति की शुरुआत कर सकें।

भाजपा ने सपा के खिलाफ रामपुर में घनश्याम लोधी को उम्मीदवार बनाया है। घनश्याम लोधी 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए थे और वह बाद में विधान परिषद का उम्मीदवार घोषित करने के लिए और चुनाव लड़ने के लिए हाथ -पैर मार रहे थे। लेकिन भाजपा ने उनको टिकट नहीं दिया। अब भाजपा ने घनश्याम लोधी को लोकसभा उपचुनाव में उम्मीदवार बनाया है।

घनश्याम लोधी एक बार सपा से विधान परिषद सदस्य रह चुके हैं और यह आजम खां के ही चेले हैं। भाजपा ने यह सोचकर घनश्याम लोधी को उम्मीदवार बनाया है कि वह आजम खां की कमियों को उजागर कर चुनाव जीत लेंगे, जबकि ऐसा नहीं होगा। घनश्याम लोधी को चुनाव में मुंह की खानी पड़ेगी। भाजपा की मजबूती का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उसको रामपुर में कोई कायदे का उम्मीदवार तक नहीं मिला।

आजमगढ़ में भाजपा को कोई मजबूत उम्मीदवार नहीं मिला है। भाजपा ने भोजपुरी फिल्मों के स्टार दिनेश लाल यादव निरहुआ को एक बार फिर से उम्मीदवार बनाया है। दिनेश लाल यादव निरहुआ 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के खिलाफ भाजपा उम्मीदवार की हैसियत से चुनाव लड़ चुके हैं। यह अखिलेश यादव से चुनाव हार गए थे। इनको 3.61 लाख वोट मिले थे, जबकि अखिलेश यादव को 6.21 लाख वोट मिले थे और वह विजयी हुए थे।

भाजपा ने इस लोकसभा उपचुनाव में दिनेश लाल यादव निरहुआ को फिर से उम्मीदवार बनाया है। भाजपा यह मानकर चल रही है कि अखिलेश यादव के चुनाव न लड़ने से यादव वोटर दिनेश लाल यादव निरहुआ के साथ आ जायेगा और भाजपा की जीत हो जाएगी। जबकि ऐसा कुछ नहीं होने वाला है। भाजपा की राह बड़ी कठिन है। जितना उसको आसान दिखाई दे रहा है, वैसा यथार्थ में है नहीं।

भाजपा यह भी मानकर चल रही है कि बसपा उम्मीदवार मुस्लिम समुदाय से है, इसलिए मुस्लिम समुदाय का वोटर बसपा के साथ चला जायेगा। मुस्लिम वोटर के बसपा के साथ जाने से सपा हार जाएगी और हिंदू वोटरों और यादव वोटरों का साथ मिलने से भाजपा जीत जाएगी।

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