Friday, August 12, 2022
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मोदी शासन के 7 सालों के दौरान 6 लाख से अधिक भारतीयों ने ली विदेशी नागरिकता

सैयद ख़लीक अहमद

नई दिल्ली | पिछले पांच वर्षों में छह लाख से अधिक भारतीयों ने विदेशी नागरिकता ली है. विदेश मंत्रालय ने संसद के मौजूदा सत्र के दौरान यह आंकड़ा मुहैया कराया है. हालांकि मंत्रालय ने इतनी बड़ी आबादी के भारतीय नागरिकता छोड़ने का कारण स्पष्ट नहीं किया. लेकिन इतनी तादाद में भारतीयों द्वारा नागरिकता छोड़ना वाक़ई गंभीर व चिंता का विषय है.

इतने भारतीयों द्वारा नागरिकता छोड़े जाने के मुद्दे पर पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी समेत कई लोगों ने सवाल भी उठाए हैं. विदेश मंत्रालय के पास उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार यह अब तक की सबसे अधिक संख्या है, जिन्होंने अपनी भारतीय नागरिकता छोड़ दी है और विदेश में बस गए हैं, हालांकि भारत बहुत शांतिपूर्ण राज्य रहा है.

यह कहना मुश्किल है कि पिछले सात वर्षों में नई राजनीतिक व्यवस्था के तहत देश की घरेलू नीतियों में जो बदलाव आया है और मानवाधिकारों सहित लोकतांत्रिक स्वतंत्रता पर अंकुश लगाये जाने के जो मामले बढ़े हैं उसका इस मुद्दे के साथ कुछ लेना-देना है.

बहुत से लोगों को लगता है कि भारत निरंकुशता और तानाशाही की राह पर है जिसमें संवैधानिक कानूनों का कोई महत्व नहीं रह गया है. किसी भी राज्य के शासक की सनक और कल्पनाएं बहुत मायने रखती हैं. मौजूदा सरकार ने कृषि कानून बनाने, नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) बनाने, प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को कठोर कानूनों के तहत गिरफ्तार करने, एफसीआरए के नियमों में संशोधन करके गैर-सरकारी संगठनों के लिए कमी पैदा करने, विपक्षी राजनीतिक दलों की गतिविधियों को प्रतिबंधित करने के अलावा उनके खिलाफ सीबीआई, ईडी और आयकर विभाग जैसी केंद्रीय एजेंसियों का गलत उपयोग करके रेड करवाने जैसे कई अनुचित काम वर्तमान सरकार ने अंजाम दिये जो लोगों को नाराज़ करने के लिए काफी है.

प्रवासन के लिए परामर्श में लगी एजेंसियों के साथ काम करने वालों के अनुसार, विदेशों में जीवन की गुणवत्ता और सामाजिक सुरक्षा की उपलब्धता भारतीयों के लिए प्राथमिक महत्वपूर्ण कारक है, जो टैक्स की उच्च दर के बावजूद अपने देश में उपलब्ध नहीं है.

विदेश राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने 3 दिसंबर को लोकसभा को बताया कि 2017 में 1,33,049 भारतीयों ने 2018 में 1,34,561, 2019 में 1,44,017, 2020 में 85,248 और 30 सितंबर, 2021 तक 1,11,287 भारतीयों ने भारतीय नागरिकता छोड़ दी.

यह इस बात की ओर इशारा करता है कि 2019 में सबसे अधिक लोगों ने अपनी भारतीय नागरिकता छोड़ दी. यह आंकड़ा 2020 में सबसे कम था, ऐसा शायद कोविड -19 के कारण रहा होगा. हालांकि, 2021 में आंकड़े फिर से बढ़ गए.

मंत्रालय द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, भारतीय नागरिकता छोड़ने के लगभग 40 प्रतिशत अनुरोध ऐसे थे जिनमें अमेरिका में बसने के लिए लोगों ने नागरिकता छोड़ी, और अन्य 30 प्रतिशत भारतीय ऑस्ट्रेलिया और कनाडा में बस गए. बाकी अनुरोध दूसरे देशों के लिए आए थे.

मॉरीशस हैडक्वार्टर्ड अफ़्रेशिया बैंक द्वारा किए गए ग्लोबल वेल्थ माइग्रेशन रिव्यू सर्वेक्षण के अनुसार, 7,000 हाई नेट वर्थ वाले व्यक्तियों (HNWI) या करोड़पति लोगों ने भारतीय नागरिकता छोड़ दी और 2020 में विदेशों में बस गए. अफ़्रेशिया बैंक के अनुसार, यह संख्या भारत के कुल करोड़पतियों का 2 प्रतिशत है. अफ़्रेशिया बैंक के अनुसार चीन के बाद दूसरे स्थान पर है, चीन से 2020 में 16,000 हाई नेट वर्थ वाले व्यक्तियों ने विदेशी नागरिकता ली थी. रूस का स्थान तीसरा है, जहां से 5,500 हाई नेट वर्थ वाले व्यक्ति अपना देश छोड़कर विदेशों में बस गए थे.

हेनले एंड पार्टनर्स के अनुसार, 2019 की तुलना में 2020 में ‘रेज़ीडेंसी बाई इन्वेस्टमेंट’ या ‘सिटीज़नशिप बाई इन्वेस्टमेंट’ के लिए पूछताछ करने वाले भारतीयों की संख्या में 63 प्रतिशत की वृद्धि हुई. एचएंडपी के अनुसार 2019 में 1500 से अधिक एचएनडब्ल्यूआई(हाई नेट वर्थ वाले व्यक्ति) ने पूछताछ की थी. और यह आंकड़ा 2020 में इससे अधिक था.

यदि एचएंडपी की माने तो भारत के लिए निवेश से जुड़े निवास के लिए पसंदीदा जगह कनाडा, ऑस्ट्रिया और पुर्तगाल हैं, जबकि भारत के लिए निवेश से जुड़ी नागरिकता के लिए पसंदीदा जगह तुर्की और माल्टा है.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दुबई, हांगकांग और सिंगापुर में एनआरआई उक्त देशों में नागरिकता नहीं मिलने पर यूरोपीय देशों में नागरिकता की तलाश करते हैं. वे कभी भी भारत में वापसी और निवेश नहीं करना चाहते हैं.

एच एंड पी के अनुसार, दुनिया के 30 देश निवेश द्वारा नागरिकता या निवास की पेशकश करते हैं, और रिपोर्ट्स कहती हैं कि भारतीयों द्वारा दूसरे देशों में उपलब्ध नागरिकता के तमाम अवसरों के लिए खोजबीन की जाती है.

आखिर अमीर भारतीय अपना देश छोड़कर क्यों जा रहे हैं? लेकिन यह सब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भारतीयों को आत्म-गौरव की भावना के लिए प्रेरित करने के बावजूद हो रहा है. हालांकि भारतीयों द्वारा नागरिकता छोड़ने के मुद्दे को उस वक्त तो तार्किक माना जा सकता था अगर वो विदेश में नागरिकता लेने के लिए नौकरी की तलाश कर रहे होते, लेकिन अगर लोगों के पास धन भी हो और अपने मूल स्थान पर वो सभी सुविधाओं का भी आनंद उठा सकते हो तब उनके द्वारा नागरिकता छोड़ना तार्किक प्रतीत नहीं होता है. भारत के करोड़पति लोगों का विदेशों में बसना मतलब देश से धन का पलायन, यह देश के भविष्य के लिए अत्यधिक हानिकारक है. यह वास्तव में समाजशास्त्रियों के लिए एक शोध का विषय है.

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