Saturday, August 13, 2022
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आखिर क्यों लगाई गई है प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में बांग्लादेश के राष्ट्रपिता की तस्वीर?

सैयद ख़लीक अहमद

नई दिल्ली | दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया (पीसीआई) की इमारत की पहली मंज़िल पर मौजूद प्रेस कॉन्फ्रेंस हॉल तक जाने के लिए आप जैसे ही लकड़ी की सीढ़ियों पर चढ़ते हैं, तो आपका सामना दाईं ओर दीवार पर लगी एक आदमक़द तस्वीर से होता है.

लेकिन जब आप पहली मंज़िल से नीचे आ रहे होते हैं तो सीढ़ियों से नीचे उतरते वक़्त यह तस्वीर आपको बिल्कुल सामने दिखाई देगी. लेकिन अपनी न्यूज़ स्टोरी को तय समय सीमा के अंदर पूरा करने की जल्दबाज़ी में यहां आने वाले बहुत से पत्रकार इस तस्वीर पर ध्यान ही नहीं देते हैं.

दिल्ली में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की सदस्यता प्राप्त करने के बाद मैंने पीसीआई भवन के विभिन्न हिस्सों का दौरा किया. सीढियां चढ़ते वक़्त मेरी नज़र तुरंत एक सफेद बंगाली कुर्ते में बिना आस्तीन के काले रंग के वास्कट और पायजामा में मौजूद एक आदमी की तस्वीर पर गई, जिसके पीछे लोगों की भारी भीड़ थी. सीढ़ी के मोड़ पर पहुंचने के बाद, मैंने तस्वीर में दिखाई दे रहे व्यक्ति की पहचान का पता लगाने की कोशिश की. अंत में, मुझे अपनी जिज्ञासा का उत्तर तस्वीर के शीर्ष पर मौजूद कैप्शन से मिला, जिसमें लिखा था, “बांग्लादेश के राष्ट्रपिता, ‘बंगबंधु’ शेख मुजीबुर रहमान.”

भारत के घनिष्ठ मित्र होने के कारण भारतीयों का बांग्लादेश, विशेषकर शेख मुजीबुर रहमान के साथ एक मज़बूत और भावनात्मक संबंध है. भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान, जब भी वे दिल्ली में होते थे, तो वे महात्मा गांधी की सर्व-धर्म प्रार्थनाओं में भाग लिया करते थे. मुजीबुर्रहमान की कई तस्वीरें हैं जिनमें वे सर्वधर्म प्रार्थना सभा में गांधीजी के पीछे खड़े दिखते हैं. वह हमेशा ‘खादी’ के बने कपड़े पहनते थे. वह एक सच्चे गांधीवादी और ‘स्वदेशी’ में दृढ़ विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे. भारत सरकार द्वारा शैख़ मुजीबुर रहमान के जन्म के सौ वर्ष बाद और बांग्लादेश की स्वतंत्रता के 50 वें वर्ष मार्च 2021 में उन्हें मरणोपरांत गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित करना बिल्कुक उचित कदम हैं.

लेकिन शेख मुजीबुर रहमान की तस्वीर लगाने के पीछे का कारण जानने की मेरी जिज्ञासा शांत नहीं हो पाई. और इसकी वजह यह थी कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और नरेंद्र मोदी सरकार में दूसरे नंबर के नेता अमित शाह ने बांग्लादेशी प्रवासियों को “दीमक” के समान बताया था जो भारत को खा रहे हैं और नष्ट कर रहे हैं जैसे दीमक लकड़ी की सामग्री के साथ करती हैं. शाह ने बांग्लादेशियों पर एक बार नहीं बल्कि कई बार आपत्तिजनक टिप्पणी की है. अमित शाह का यह कथन पूर्वी अफ्रीका के रवांडा की याद दिलाता है जहां नरसंहार शुरू होने से पहले बहुसंख्यक सत्तावादी लोगों ने भी इसी प्रकार वहां के अल्पसंख्यक समुदाय तुत्सिस को ‘कॉकरोच’ कहा था.

भारत में कई लोगों को यह लगता है कि मोदी सरकार द्वारा लाया गया नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और असम के बाद पूरे देश में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के विस्तार की मांग, मुसलमानों को घुसपैठिया साबित करने की साज़िश है. और यह कानून भारत में सबसे बड़े धार्मिक अल्पसंख्यक के बड़े पैमाने पर नरसंहार का कारण बन सकती है.

इस संबंध में मैंने बीबीसी के पूर्व संवाददाता और प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष सतीश जैकब से सवाल किया. हालाँकि, मैं उनके स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हूँ. लगभग आधी सदी से दिल्ली में काम कर रहे और लगभग एक दशक से पीसीआई प्रबंधन से जुड़े मेरे कुछ पुराने पत्रकार सहयोगियों के पास भी कोई ठोस जवाब नहीं था. एक ने तो मुझसे यह तक पूछा कि मैं प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में बांग्लादेश और शेख मुजीबुर रहमान की तस्वीर का मुद्दा क्यों उठाना चाहता हूं.

खैर, आखिर में मुझे पीसीआई अध्यक्ष उमाकांत लखेरा से सही जवाब मिला. उन्होंने बताया कि, “भारत में बांग्लादेश हाई कमीशन (बीएचसी) बांग्लादेश के राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर रहमान उर्फ ‘मुजीब बोरशो’ के जन्म शताब्दी समारोह के अवसर पर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया को कुछ भेंट करके भारत और बांग्लादेश के बीच द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर बनाना चाहता है. यह ‘बंगबंधु’ की विरासत को स्वीकृति दिलाने के लिए बीएचसी का एक कदम था.”

उन्होंने बताया कि, “मुजीबुर रहमान मानवाधिकार और स्वतंत्रता के एक चैंपियन थे, यही कारण था कि जिसने उन्हें पाकिस्तान से बाहर एक स्वतंत्र बांग्लादेश के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया. 1971 में जब मुजीबुर रहमान की पार्टी ने राष्ट्रीय चुनाव जीते तो पश्चिमी पाकिस्तान के राजनेताओं के साथ-साथ पश्चिमी पाकिस्तानियों के वर्चस्व वाली सेना ने, उन्हें पाकिस्तान का प्रधान मंत्री बनने की अनुमति नहीं दी थी. शेख मुजीबुर रहमान ने पूरी तरह से राजनीति में आने से पहले एक पत्रकार के रूप में अपना करियर शुरू किया था.”

भारत और बांग्लादेश के बीच एक मज़बूत सांस्कृतिक और भावनात्मक संबंध भी है. उदाहरण के लिए जब 26 मार्च, 1971 को शेख मुजीबुर रहमान द्वारा स्वतंत्र बांग्लादेश घोषित किए जाने के बाद पश्चिमी पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान पर हमला किया तो भारत ने बांग्लादेश बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

उमाकांत लाखेरा ने आगे स्पष्ठ किया कि, “मुजीब एक मज़बूत लोकतंत्र, मानवाधिकारों और स्वतंत्रता के चैंपियन होने के अलावा भारत के एक महान मित्र थे. यही कारण है कि हमने उनकी आदमकद तस्वीर को एक उचित स्थान पर स्थापित करना चुना, एक ऐसी जगह पर जहां इसे पीसीआई में आने वाला कोई भी व्यक्ति देख सके. इसके अलावा, बांग्लादेश के साथ भारत के राजनयिक संबंध भी उत्कृष्ट हैं.”

भारत बांग्लादेश के साथ 4,000 किमी से अधिक लंबी सीमा साझा करता है, जो विश्व स्तर पर पांचवीं सबसे लंबी भूमि सीमा है. बांग्लादेश के साथ सीमा साझा करने वाले पांच भारतीय राज्य हैं- पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा, मेघालय और मिजोरम.

बीएचसी ने पीसीआई के प्रेस कॉन्फ्रेंस हॉल के नवीनीकरण और सुविधाओं के विस्तार के लिए 7 लाख रुपये की पेशकश की लेकिन पीसीआई ने इसे उपयुक्त नहीं माना क्योंकि रक्षा मंत्रालय ने प्रेस कॉन्फ्रेंस हॉल को पहले ही 30 लाख रुपये की लागत से तैयार करवाया है और फिर बीएचसी के ऑफर पर डिफेंस मंत्रालय के साथ भी परामर्श की आवश्यकता थी.

पॉलिसी के अनुसार, पीसीआई कभी भी नकद में दान या योगदान स्वीकार नहीं करता है. पीसीआई ने बीएचसी को भूतल पर मीडिया सेंटर का पुनर्निर्माण करने और पीसीआई के अभिलेखागार हॉल में सुविधाएं प्रदान करने के लिए कहा. बीएचसी ने भी इस प्रस्ताव पर सहमति जताई है. बीएचसी ने बांग्लादेश के संस्थापक राष्ट्रपति शेख मुजीबुर रहमान की जन्म शताब्दी को चिह्नित करने के लिए पीसीआई में ‘बंगबंधु’ (बंगाल का मित्र) मीडिया सेंटर के नाम से एक मीडिया सेंटर बनाया. बीएचसी ने एक प्रोजेक्टर, चार एयर कंडीशनर और एक बड़ा टेलीविजन सेट भी लगावाया है.

मीडिया सेंटर का उद्घाटन बांग्लादेश के सूचना और प्रसारण मंत्री हसन महमूद ने इस साल सितंबर में किया, उद्घाटन के वक़्त बांग्लादेश के पत्रकारों के एक प्रतिनिधिमंडल के अलावा भारतीय विदेश मंत्रालय के अधिकारी मौजूद थे. पीसीआई ने दोनों मित्र देशों के पत्रकारों के बीच आपसी सहयोग के लिए बांग्लादेश नेशनल प्रेस क्लब के साथ एक समझौता ज्ञापन पर भी हस्ताक्षर किए.

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