Thursday, January 27, 2022
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क्या ASI कुतुब मीनार परिसर का संरक्षण कर रहा या इसकी मूल संरचना को नष्ट कर रहा?

एएसआई के संरक्षण में होने के बावजूद मस्जिद का अधिकांश हिस्सा जर्जर हो गया है, मस्जिद की छत को छूने वाले खंभों के ऊपर से सादे पत्थरों को हटाकर आकृतियों वाले पत्थरों को डालने के लिए एक गुप्त अभियान धीरे-धीरे जारी है. स्तंभों के शीर्ष पर कुछ पत्थरों में चित्र हैं, बाकी बिना किसी चित्र के सादे हैं. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा किया जा रहा यह बदलाव उस समरूपता के खिलाफ है जो इमारतों को सुंदरता और डिज़ाइन में एकरूपता प्रदान करने के लिए सभी निर्माणों में अपनाई जाती है.

सैयद ख़लीक अहमद

नई दिल्ली | दिल्ली में स्थित ऐतिहासिक स्मारक कुतुब मीनार को लेकर दक्षिणपंथी समूहों द्वारा पैदा किये जा रहे विवादों के परिप्रेक्ष्य में चीज़ों को देखने के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की भूमिका पर भी संदेह पैदा होता है. कुछ सवाल बार बार खड़े हो रहे हैं कि क्या वाकई एएसआई कुतुब मीनार परिसर को उसके मूल स्वरूप में बनाए रखने का प्रयास कर रहा है? या फिर इसके मंदिर होने का दावा करने वाले हिंदू दक्षिणपंथी समूहों के लिए एक आधार तैयार करने के लिए कुतुबमीनार परिसर के आंतरिक और बाहरी डिज़ाइनों को चालाकी से बदलने में संलग्न है?

भारत सरकार के संस्कृति विभाग के तहत आने वाले एएसआई का मूल काम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व के स्मारकों और स्थलों का संरक्षण और रखरखाव करना है.

कुतुबमीनार मूल रूप से कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद परिसर का एक हिस्सा है. अगर कोई आज कुतुबमीनार जाता है तो वहां साफ तौर पर देख पायेगा कि कैसे एएसआई पुराने वक़्त से मौजूद प्राचीन और सादे पत्थरों की जगह कुतुबमीनार परिसर में मानव आकृतियों में ढले हुए नए पत्थरों को लगा रहा है, मानव आकृति वाले यह पत्थर भारत में हिंदू या जैन मंदिर की विशेषताएं हैं.

मीनार का उपयोग ‘अज़ान’ (प्रार्थना के लिए बुलावा) देने के लिए किया जाता था ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि ‘नमाज़’ का आह्वान या बुलावा जहाँ तक संभव हो सके वहाँ तक पहुंच पाए.

कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद परिसर के भीतर धार्मिक संरचनाओं के संरक्षण और रखरखाव के बहाने एएसआई द्वारा साज़िशन बदलाव किया जा रहा है. एएसआई परिसर में क्या कर रहा है, इसे समझना कोई रॉकेट साइंस नहीं है. एक आम आदमी भी समझ सकता है कि एएसआई इमारतों के चरित्र और उनकी खूबियों को बदल रहा है, इसकी प्राचीन पहचान को नष्ट कर रहा है, और इसकी मौलिकता की रक्षा के लिए कुछ भी नहीं कर रहा है, जो कि एएसआई को सौंपा गया सबसे बुनियादी काम है.

सादे पत्थरों को मानव आकृतियों से उकेरे गए पत्थरों से बदला जा रहा

एएसआई के संरक्षण में होने के बावजूद मस्जिद का अधिकांश हिस्सा जर्जर हो गया है, मस्जिद की छत को छूने वाले खंभों के ऊपर से सादे पत्थरों को हटाकर आकृतियों वाले पत्थरों को डालने के लिए एक गुप्त अभियान धीरे-धीरे जारी है. स्तंभों के शीर्ष पर कुछ पत्थरों में चित्र हैं, बाकी बिना किसी चित्र के सादे हैं. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा किया जा रहा यह बदलाव उस समरूपता के खिलाफ है जो इमारतों को सुंदरता और डिज़ाइन में एकरूपता प्रदान करने के लिए सभी निर्माणों में अपनाई जाती है. मानव आकृतियों वाले पत्थरों को डालकर डिज़ाइनों की एकरूपता में किया जा रहा बदलाव असल में संरक्षण और रखरखाव के बहाने की जा रही साज़िश का संकेत देता है.

कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद में नक्काशीदार आकृतियों वाले पत्थर लगाए गए हैं.

मस्जिद के अंदरूनी हिस्से में अभी भी लगभग 50 स्तंभ हैं और बाहरी बरामदें, जो मस्जिद विस्तार का हिस्सा हैं, वहां इनकी संख्या लगभग दोगुनी है. मस्जिद अहमदाबाद और गुजरात के अन्य शहरों में अफगान शासकों द्वारा बनाई गई उन मस्जिदों के पैटर्न पर आधारित है जो शाहजहाँ द्वारा गुजरात पर कब्जा करने से पहले अफगान शासकों के अधीन थी. कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद भी एक अफगान शासक मोहम्मद गौरी के सेना कमांडर कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनाई गई थी और इसलिए, यह अफगान वास्तुकला के साथ प्रमुख रूप से समानताएं रखती है. गौरी ने 1192 में दिल्ली पर कब्जा कर लिया था, लेकिन कुतुबुद्दीन के प्रभार में दिल्ली को सौंप कर गौरी कुछ महीनों के भीतर अफगानिस्तान के लिए रवाना हो गया. दिल्ली में मुहम्मद गौरी की जीत के साथ शुरू हुआ काल इतिहास में सल्तनत काल के रूप में जाना जाता है.

पुराना दिखने के लिए पत्थर की आकृतियों को रगड़ा या विकृत किया गया है

यह सुनिश्चित करने के लिए कि पत्थरों में बदलाव की धूर्तता का किसी को पता नहीं चल पाए, इसके लिए आकृतियों को घिस दिया गया है और थोड़ा खंडित कर दिया गया है ताकि यह एक पुरातन अवशेष की तरह दिखे. लेकिन सावधानीपूर्वक देखने पर पुराने बिना छवियों वाले पत्थर और आकृतियों वाले नए गढ़े गए पत्थरों के बीच अंतर स्पष्ट नज़र आ जाता है.

मस्जिद परिसर में काम कर चुकी “संरक्षक” एएसआई ने खंभों में कुछ सीधे खड़े पत्थरों को मानव आकृतियों वाले पत्थरों से बदल दिया है. यहाँ भी आकृतियों वाले पत्थरों और बिना आकृतियों वाले पत्थरों के रंग में काफी अंतर है. ध्यान से देखने पर पता चलता है कि आकृतियों वाले पत्थर नए हैं. लेकिन यहाँ पर भी यह ध्यान रखा गया है कि आकृतियों को घिसकर या काट-छाँट कर प्राचीन अवशेष के रूप में प्रस्तुत किया जाए.

क़ुतुब मीनार परिसर में कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद के खंभों पर अंकित विभिन्न आकृतियां

हैरानी की बात यह है कि मस्जिद के बाहरी हिस्से में किसी भी खंभे या दीवार पर ऐसी मानव आकृतियां या चित्र नहीं हैं. फिर मस्जिद के अंदर खंभों पर आकृतियाँ कैसे आ गई? मस्जिद के अंदर की दीवारों पर भी कोई आकृतियां नहीं हैं.

किसी भी परिस्थिति में किसी भी मस्जिद के अंदर मूर्तियों की उपस्थिति की अनुमति नहीं होती है क्योंकि यह इस्लाम के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है.

और जब एक मुस्लिम शासक द्वारा कुव्वतुल इस्लाम, जिसका अर्थ ही है “इस्लाम की ताकत”, जब इसके रूप में एक मस्जिद का निर्माण किया जा रहा है, तो क्या वह ऐसी गलती कर सकता है? क्या मुसलमान ऐसी मस्जिद में नमाज़ अदा करेंगे जहां मूर्तियाँ बनी हुई हैं? इस्लाम की मूल बातें जानने वाला कोई भी व्यक्ति इस सवाल पर सीधे “नहीं” में जवाब देगा.

अगर एक तर्क के तौर पर यह स्वीकार कर भी लिया जाए कि मुस्लिम शासकों ने अपनी जीत का प्रदर्शन करने के लिए मस्जिद का निर्माण करने की जल्दी में थे और इसलिए उन्होंने ध्वस्त मंदिरों की आकृतियों वाली सामग्री का उपयोग किया, लेकिन उस स्थिति में भी वो केवल बाहरी भाग में ऐसा करते, आंतरिक हिस्से में कभी भी ऐसा नहीं करते.

मस्जिद में मंदिर के पत्थर इस्तेमाल होने को लेकर एएसआई के तर्क में कोई दम नहीं

अब बड़ा सवाल यह है कि मानव आकृतियों वाली मंदिर सामग्री का इस्तेमाल मस्जिद के अंदर ही क्यों किया गया, न कि बाहर? तथ्य तो यह है कि इन दावों में कोई दम ही नहीं है कि मस्जिद निर्माण में मंदिर सामग्री का इस्तेमाल किया गया था. इसके अलावा, मस्जिद को पूरा करने में लगभग छह साल लगे. यह जानकारी एएसआई द्वारा प्रकाशित और कुतुब मीनार परिसर के अंदर बेची जा रही “वर्ल्ड हेरिटेज सीरीज़: कुतुब मीनार एंड एडजॉइनिंग मॉन्यूमेंट्स” नामक पुस्तक में प्रदान की गई है. पुस्तक के अनुसार, मोहम्मद गौरी ने 1192 ईस्वी (पीपी 30) में दिल्ली पर कब्ज़ा कर लिया और मस्जिद का निर्माण उनकी सेना के जनरल कुतुबुद्दीन ऐबक ने जीत के तुरंत बाद शुरू किया.

मस्जिद 1198 (पीपी 34) में बनकर तैयार हुई थी. जब एक मस्जिद को बनने में छह साल लगे, तो क्या 72 महीनों में नई निर्माण सामग्री की व्यवस्था करना संभव नहीं था? वो भी तब जब मुहम्मद गौरी और कुतुबुद्दीन ने मिलकर दिल्ली से अफगानिस्तान तक शासन किया था. एएसआई के तर्क और कुछ नहीं बल्कि बड़े झूठ का एक हिस्सा है, जिसका उद्देश्य पूर्व निर्धारित दक्षिणपंथी एजेंडे को सही साबित करना है.

एएसआई इब्न-ए-बतूता के यात्रा वृत्तांत से अपने दावे की पुष्टि करने की कोशिश कर रहा है. विश्व धरोहर श्रृंखला पुरातत्व सर्वेक्षण रिपोर्ट, खंड चतुर्थ, पीपी.46, को इसके स्रोत के रूप में प्रस्तुत करती है. पुस्तक के अनुसार, एक अरब यात्री, इब्न-ए-बतूता ने लिखा है कि जिस स्थान पर कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद खड़ी थी, वह एक हिंदू मंदिर था और हिंदुओं ने उस स्थान को एलबुत-खाना कहा था.

लेकिन ‘एल बुत-खाना’ शब्द एक फारसी शब्द है, न कि संस्कृत, पाली या हिंदी शब्द. जब दुनिया के इस हिस्से में फ़ारसी का उपयोग होता ही नहीं था तो हिंदू अपने मंदिर को ‘एलबुत-खाना’ क्यों कहेंगे? भारत में फारसी का प्रचलन केवल 12वीं शताब्दी में अफगानों द्वारा विजय के साथ शुरू हुआ था. इसलिए, एएसआई का तर्क ठोस तथ्यों पर आधारित नहीं है. यह साफ तौर पर एक परिकल्पना जैसा मालूम होता है, जहां सिर्फ़ अंदाज़े लगाए जाते है. इसके अलावा, एएसआई को इब्ने बतूता के यात्रा वृत्तांत की पृष्ठ संख्या भी बतानी चाहिए जहाँ उन्होंने यह दावा किया है और इसके प्रकाशकों और यात्रा वृत्तांत के प्रकाशन के वर्ष के बारे में भी जानकारी प्रदान करनी चाहिए. उन्हें बतूता के यात्रा वृत्तांत की भाषा का भी खुलासा करना चाहिए जिससे एएसआई ने इसकी जानकारी प्राप्त की है.

स्तम्भों में उपयोग किए गए चित्रों वाले नए गढ़े गए पत्थरों को छोड़कर, लगभग सभी सीधे खड़े पत्थर रंग में समान हैं, मस्जिद के एक कोने में एक सीधा खड़ा पत्थर गहरा केसरिया-लाल है, जिस तरह का रंग आमतौर पर मंदिरों में पाया जाता है. कई जगहों पर मस्जिदों और अन्य मुस्लिम धार्मिक संपत्तियों को हथियाने वालों ने इस तकनीक का इस्तेमाल यह साबित करने के लिए किया है कि सम्बन्धित संरचना मंदिर का एक हिस्सा है. कुछ समय बाद, सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के समर्थन से यह दक्षिण पंथी तत्व वहां पूजा शुरू कर देते हैं, हैदराबाद के चारमीनार और वडोदरा के मांडवी गेट पर ऐसा ही हुआ था.

गहरे केसरिया-लाल रंग के पत्थर को अलग रूप में दिखाने के लिए एक स्तंभ को जोड़ा गया है.

कुतुब मीनार की मूल संरचना में परिवर्तन करता एएसआई

कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद की वास्तुकला को बदलने का एक और उदाहरण कुतुब मीनार की मौलिकता को बदलना है. मीनार के व्यास में अलग-अलग मंज़िलों और अलग-अलग ऊंचाइयों पर कुरान की आयतों की सुलेख हैं. क़ुतुब मीनार के आधार से लगभग एक मीटर ऊपर अरबी सुलेख वाले पत्थरों को सादे पत्थरों से बदल दिया गया है. एक स्तर पर, एएसआई के संरक्षकों ने सुलेख के हिस्से को सादे पत्थरों से ढक दिया है और शेष सुलेख अभी भी बरकरार हैं. लेकिन सुलेखों का पूरा अर्थ अब नहीं समझा जा सकता है क्योंकि कुछ सुलेखों को हटा दिया गया है और उन्हें सादे पत्थरों से बदल दिया गया है. यह धूर्तता विश्व धरोहर का बहुत बड़ा अपमान है.

तस्वीर में कुतुब मीनार के कुछ फीट ऊपर अरबी भाषा में लिखा एक हिस्सा दिख रहा है. इसके दोनों ओर के शेष लिखावट को समतल पत्थरों से ढका गया है, इस प्रकार विश्व विरासत के साथ छेडछाड किया गया है.

मूल पत्थर, अरबी सुलेखों वाले पत्थर कुतुब परिसर में बिखरे पड़े हैं

कुतुब मीनार के अरबी सुलेखों वाले कुछ पत्थरों सहित मूल पत्थर पूरे परिसर में बिखरे हुए हैं, उनमें से अधिकांश इल्तुतमिश के मकबरे (इल्तुतमिश की कब्र) के पीछे और ‘मकबरे’ से सटे एक कब्रिस्तान के किनारों पर फेंके गए हैं. यह दर्शाता है कि कैसे संरक्षक ही स्मारक की उपेक्षा कर रहे हैं और यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल की मौलिकता को बदल रहे हैं, ऐसी धरोहर जहां हर साल बड़ी तादाद में घरेलू और वैश्विक पर्यटक आते हैं.

कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद परिसर के अंदर कुतुब मीनार के मूल पत्थर और अरबी लिखे पत्थर इल्तुतमिश ‘मकबरा’ के पास पड़े हुए हैं.

परिसर के अंदर ‘मदरसे’ के कमरे, जो कभी छात्रों के लिए एक स्कूल हुआ करता था, अब वहां मूत्र की बदबू आती है, इससे पता चलता है कि एएसआई द्वारा किस प्रकार विश्व धरोहर स्थल का बुरे तरीके से रखरखाव किया जा रहा है. परिसर के अंदर बगीचों का रखरखाव भी ठीक से नहीं किया जाता है. पर्यटकों के लिए परिसर में बने वाशरूम और शौचालय इस्तेमाल किये जाने की स्थिति में नहीं हैं.

‘मिसगाइड’ करता ‘गाइड’

इंडिया टुमॉरो टीम ने जिस गाइड को कुतुबमीनार दर्शन के लिए रखा था, उस गाइड प्रभाश ने हमें मस्जिद और अन्य इमारतों के बारे में बताने के बजाय यह समझाने की कोशिश की कि यह एक मंदिर है. मस्जिद के बारे में मार्गदर्शन करने और हमें यह बताने के बजाय कि इसे कैसे बनाया गया, इसे बनाने में कितने साल लगे, वह हमें ‘गुमराह’ कर रहा था. वह विशेष रूप से हमें खंभों पर और उसके शीर्ष पर छत को छूती हुई आकृतियाँ दिखा रहा था. उसके पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि मस्जिद के बाहरी हिस्से पर कोई आकृति क्यों नहीं थी. उसने यह भी जवाब नहीं दिया कि कुतुब मीनार के आधार स्तर से सिर्फ एक मीटर ऊपर अरबी सुलेखों को क्यों नष्ट कर दिया गया और क्यों उन्हें सादे पत्थरों से ढक दिया गया है. उसने बस इतना कहा कि इस सवाल का जवाब देना एएसआई की ज़िम्मेदारी है.

प्रभास की तरह, एएसआई ने यह साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है कि मस्जिद एक मंदिर की सामग्री से बनाई गई थी. कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद के भीतरी आंगन के मध्य में एक लौह स्तंभ है. “वर्ल्ड हैरिटेज सीरीज: कुतुब मीनार एंड एडजोइनिंग मोंन्यूमेंट्स” में हैं कि लौह स्तंभ हिंदू मंदिर के सामने विष्णु के वाहन गरुड़ की मूर्ति को सहारा देने के लिए था. लेकिन इस तर्क का स्रोत क्या है? गुप्त वर्णों में उत्कीर्ण संस्कृत शिलालेख के आधार पर पुस्तक अपने दावों की पुष्टि करती है. शिलालेख पर एक नज़दीकी नज़र डालने से मालूम होता है कि मस्जिद के पूरे चरित्र को तर्क के आधार पर बदलने के लिए औऱ इसे मंदिर साबित करने के लिए दक्षिणपंथी इतिहासकारों द्वारा शिलालेख के रूप में करवाई गई यह नक्काशी पुरानी नहीं है, यह कुछ दशकों पुरानी ही हो सकती है.

इस पूरे मामले में एएसआई अधिकारियों से जवाब पाने के सभी प्रयास विफल रहे. एएसआई जनसंपर्क अधिकारी (पीआरओ) मनु शर्मा ने कहा कि, “हमें अपने प्रश्न मेल करें. मैं उन्हें अधीक्षक पुरातत्वविद्, दिल्ली के पास भेजूंगा.”

(अंग्रेज़ी में लिखी गई इस रिपोर्ट को हुमा अहमद द्वारा हिंदी में अनुवाद किया गया)

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