Friday, August 12, 2022
Home अन्तर्राष्ट्रीय क्या भारतीय समाज, मीडिया और सरकार बांग्लादेश से सबक लेंगे?

क्या भारतीय समाज, मीडिया और सरकार बांग्लादेश से सबक लेंगे?

सैयद ख़लीक अहमद

नई दिल्ली | बांग्लादेश की सीमा से लगा पूर्वोत्तर भारत का सबसे छोटे राज्य त्रिपुरा लगभग एक सप्ताह तक मुस्लिम विरोधी हिंसा का गवाह बना रहा. हिंदू कट्टरपंथियों ने लगातार कई दिनों तक मस्जिदों, मुस्लिम घरों और दुकानों को निशाना बनाया.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 16 मस्जिदों में तोड़फोड़ की गई है. विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी), बजरंग दल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उपद्रवियों द्वारा कथित तौर पर मस्जिदों में आग लगा दी गई जिसमें कई मस्जिद पूरी तरह से जल गई.

इसके अलावा मस्जिदों में आग लगाकर पवित्र कुरान की प्रतियों सहित दूसरे धार्मिक साहित्य भी जला दिए गए.

हालांकि, किसी के हताहत होने की खबर नहीं है लेकिन मुस्लिम समुदाय के कई लोग घायल हुए हैं.

त्रिपुरा में मुस्लिम विरोधी हिंसा में पुलिस की भूमिका पर सवाल

त्रिपुरा में आम मुसलमानों सहित कई प्रभावशाली मुसलमानों के घरों पर भी हमला किया गया है. बदमाशों द्वारा आग लगाने से पहले कई दुकानों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को लूट लिया गया. चश्मदीदों का कहना है कि ज़्यादातर घटनाएं सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी में हुईं, जो हिंसा के दौरान मूकदर्शक बने रहे. अगर पुलिस ने तत्काल उपद्रवियों के खिलाफ कार्रवाई की होती तो हिंसा नहीं होती और धार्मिक स्थलों को जलाने जैसी घटनाएं नहीं होती और न ही संपत्तियों का कोई नुकसान होता. लेकिन दुर्भाग्य से त्रिपुरा पुलिस ने हिंसा शुरू होने के बाद पहले दो दिनों तक तो यह मानने से ही इनकार कर दिया कि त्रिपुरा राज्य में मुस्लिम विरोधी हिंसा हो रही है.

पानीसागर में VHP द्वारा निकाली गई रैली में कथित तौर पर उपद्रवियों ने मुसलमानों और पैगंबर मोहम्मद साहब के खिलाफ बेहद भड़काऊ नारे लगाए.

VHP ने बांग्लादेश हिंसा की जांच के लिए अंतर्राष्ट्रीय आयोग की मांग की

विश्व हिन्दू परिषद, जिसके कार्यकर्ताओं पर त्रिपुरा में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा में शामिल होने के आरोप है, उसी विहिप ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग और यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख विश्व निकायों को पत्र लिखकर बांग्लादेश में हुई हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा पर संज्ञान लेने का आग्रह किया है.

पत्र में VHP ने अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से हिंसा के सही कारणों, जान माल के नुकसान और हिंदुओं की संपत्तियों के नुकसान के बारे में पता लगाने के लिए बांग्लादेश में एक फैक्ट फाइंडिंग टीम भेजने का आग्रह किया है. विहिप के संयुक्त महासचिव और इसके अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रमुख स्वामी विज्ञानानंद ने भी संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ से बांग्लादेश में हिंदू विरोधी हिंसा की जांच के लिए एक अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग गठित करने का आग्रह किया.

रिपोर्ट्स के अनुसार त्रिपुरा के चार जिलों में मुस्लिम विरोधी हिंसा हुई है. उत्तरी त्रिपुरा, दक्षिण त्रिपुरा, पश्चिम त्रिपुरा और उनाकोटी हिंसा के शिकार हुए जिले हैं. राज्य की राजधानी अगरतला में भी हिंसा हुई है. हालांकि, उत्तरी त्रिपुरा सबसे ज़्यादा प्रभावित रहा. इन सभी जिलों में बहुसंख्यक हिंदू समुदाय का दबदबा है. 2011 की जनगणना के अनुसार 36.74 लाख की कुल आबादी में से हिंदू आबादी लगभग 30.63 लाख या 83.40 प्रतिशत है, जिसमें मुस्लिम और ईसाई क्रमश: 3.16 लाख या 8.60 प्रतिशत और 1.59 लाख या 4.35 प्रतिशत हैं.

क्या बांग्लादेश में हुए दंगों के कारण त्रिपुरा में भड़की हिंसा ?

त्रिपुरा में हुए इन सभी हमलों के पहले स्थानीय मुसलमानों की तरफ से कोई उकसाने वाली घटना अंजाम नहीं दी गई थी बल्कि त्रिपुरा में हुए इन मुस्लिम विरोधी हमलों के पीछे जो कारण बताया जा रहा है वो यह है कि हाल ही में पड़ोसी देश बांग्लादेश में दुर्गा पूजा उत्सव के दौरान मुस्लिम सांप्रदायिक तत्वों द्वारा मंदिरों और दुर्गा पूजा पंडालों पर हमला किया गया था.

सीमा पार जो हुआ उसमें त्रिपुरा के स्थानीय मुसलमानों की न तो कोई भूमिका थी और न ही यहां के मुसलमान इतने सक्षम हैं कि पड़ोसी देश में हिंसा की किसी भी घटनाओं को प्रभावित कर सके. त्रिपुरा के मुसलमान हिंसा के शिकार केवल इसलिए हुए क्योंकि बांग्लादेश के बहुसंख्यक समुदाय और त्रिपुरा के मुसलमानों का धर्म एक ही है. अगर बांग्लादेश या अन्य किसी मुस्लिम देश में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ कोई घटना होती है तो क्या भारत में मुसलमानों को निशाना बनाया जायेगा? क्या उस देशों की घटनाओं का बदला भारत के मुस्लिमों से लिया जाना उचित है?

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री ने ढाका में भारतीय राजदूत को फोन किया मगर स्वयं के राज्य में मुस्लिम विरोधी हिंसा को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया:

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब ने 16 अक्टूबर को बांग्लादेश में भारतीय उच्चायुक्त विक्रम के दोराईस्वामी को फोन करके पड़ोसी देश के घटनाक्रम और बांग्लादेश सरकार ने हिंदू समुदाय की रक्षा के लिए क्या कदम उठाए हैं, यह जानने के लिए फोन किया था. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोराईस्वामी ने देब को बताया था कि बांग्लादेश सरकार इस मुद्दे से निपटने के लिए सभी जरूरी कदम उठा रही है.

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री जो बांग्लादेश में अपने धर्म के लोगों के साथ हुई घटनाओं में इतनी दिलचस्पी रखते हैं और बांग्लादेश में भारतीय उच्चायुक्त को फोन करते हैं, उन्हीं सीएम ने हिंसा की उसी प्रकार की स्थिति से निपटने के लिए उतनी रुचि नहीं दिखाई, जब शिकार होने वाले उनके खुद के ही राज्य के मुसलमान थे और हमला करने वाले हिंदू उपद्रवी थे.

हालांकि त्रिपुरा में हिंसा के कुछ मामलों की प्राथमिकी दर्ज की गई हैं, त्रिपुरा पुलिस ने इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक किसी भी आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया, और इस प्रकार पुलिस ने हमलावरों के खिलाफ कोई कार्यवाही न करके मुसलमानों पर हमलों में शामिल बदमाशों को और बढ़ावा दिया.

प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने भी त्रिपुरा हिंसा की निंदा नहीं की

राज्य के किसी भी भाजपा नेता या केंद्र में सत्ताधारी पार्टी के नेताओं ने त्रिपुरा की मुस्लिम विरोधी हिंसा की कोई निंदा नहीं की. इसी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की ओर से भी हिंसा की निंदा करने वाला कोई बयान नहीं आया है.

हिंसा की निंदा करने के बजाय, त्रिपुरा में कुछ स्थानीय भाजपा नेताओं ने कहा कि मुसलमानों ने खुद ही उनकी मस्जिदों और संपत्तियों में तोड़फोड़ की है, आजकल इस प्रकार का प्रोपेगेंडा मुस्लिम विरोधी घटनाओं में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हरियाणा जैसे भाजपा शासित राज्यों में भाजपा नेताओं द्वारा ही नहीं ही नहीं बल्कि पुलिस अधिकारियों द्वारा भी फैलाया जाता है.

इसी प्रकार पूर्व जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की यात्रा के बाद फरवरी 2020 में लगातार तीन दिनों तक जब हिंदू उपद्रवी की भीड़ द्वारा मुसलमानों को निशाना बनाया गया और लगातार कई दिनों तक उत्तर-पूर्वी दिल्ली हिंसा की आग में जलता रहा, तब भी पीएम, गृहमंत्री और अन्य वरिष्ठ मंत्रियों सहित सभी भाजपा नेता चुप्पी साधे रहे.

अगस्त 1947 में भारत को आजादी मिलने के बाद से अब तक उत्तर पूर्वी दिल्ली की हिंसा की यह घटनाएं सबसे भयानक मुस्लिम विरोधी हिंसा में से एक थी. कपिल मिश्रा और मोदी सरकार में मंत्री अनुराग ठाकुर जैसे कई भाजपा नेताओं ने दंगों से पहले बेहद भड़काऊ भाषण दिए.

राजस्थान, यूपी, झारखंड और हरियाणा में मुसलमानों की मॉब लिंचिंग की दर्जनों घटनाएं सामने आई हैं. पश्चिमी यूपी के दादरी में अखलाक को उसके घर में इस झूठे आरोप में भीड़ ने लिंच करके मार डाला कि उसने अपने रेफ्रिजरेटर में गाय का मांस (देश के अधिकांश राज्यों में गाय का वध प्रतिबंधित है) रखा हुआ है. ट्रेनों और बसों में यात्रा कर रहे कई मुस्लिम लड़कों और महिलाओं पर भी अलग-अलग राज्यों में सिर्फ इसलिए हमला किया गया क्योंकि उन्होंने दाढ़ी पहन रखी थी या मुस्लिम टोपी पहन रखी थी और महिलाएं “बुर्के” में थीं.

इन सभी मुद्दों पर पीएम और केंद्रीय मंत्रियों, विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों और भाजपा नेताओं ने पूरी तरह चुप्पी साध ली. हमलों में शामिल आरोपियों को गिरफ्तार करने के बजाय यूपी, एमपी, हरियाणा और अन्य राज्यों में उल्टे पुलिस ने मुस्लिम पीड़ितों के खिलाफ ही मामले दर्ज कर दिए, पुलिस ने शायद इज़रायली पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों से प्रेरणा ली होगी, जो हमेशा फिलिस्तीनियों और इज़राइलियों के बीच विवाद में फिलिस्तीनियों को ही अरेस्ट करते हैं. उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के मामलों में भी, मुसलमानों को ही ज़िम्मेदार ठहराया गया है और आपराधिक मामले भी उन्हीं के विरुद्ध दर्ज किए गए थे हालांकि पीड़ित मुस्लिम ही थे.

बिना किसी सबूत के दंगों में कथित संलिप्तता के आरोप लगाकर मुस्लिम युवकों को खतरनाक गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत आतंकवाद के आरोप भी में गिरफ्तार भी किया गया. पुलिस द्वारा निशाना बनाए गए ये वे युवा हैं जिन्होंने केंद्र सरकार द्वारा पारित नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) के खिलाफ आंदोलन में अग्रणी रूप से भाग लिया और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के लागू किए जाने का विरोध कर रहे थे.

मुसलमानों को डर है कि एनआरसी से जुड़ा सीएए अपने ही देश में एक बड़ी मुस्लिम आबादी को घुसपैठिया घोषित कर देगा. भारत में सत्तारूढ़ दल के कुछ राजनेता राजनीतिक लाभ के लिए समाज का ध्रुवीकरण करने के लिए मुसलमानों के खिलाफ बेहद अपमानजनक और धमकी भरी भाषा का इस्तेमाल करने के लिए जाने जाते हैं. सत्ता पक्ष द्वारा विभिन्न समुदायों के बीच शांति और सद्भाव सुनिश्चित करने के लिए शायद ही कोई प्रयास किया जाता है.

विभाजनकारी नीतियों की वजह से है भाजपा का अस्तित्व : राजनीतिक विशेषज्ञ

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक बीजेपी यह सब अपनी राजनीतिक मजबूरियों की वजह से कर रही है. विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा का अस्तित्व ही उसकी विभाजनकारी नीतियों और विभिन्न समुदायों के बीच बढ़ती खाई पर निर्भर करता है, खासकर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच. विश्लेषकों का मानना ​​है कि जब हिंदुत्व की विचारधारा को मानने वाली भाजपा अपनी ध्रुवीकरण की नीतियों को छोड़ देगी तो उसका पतन हो जाएगा.

भारत में सांप्रदायिक माहौल इस हद तक बिगड़ गया है कि मुस्लिम विरोधी हिंसा के कई मामलों में हिंदु आरोपियों को बीजेपी मंत्रियों सहित हिंदू समुदाय का भी समर्थन मिलता है. उदाहरण के लिए, पूर्व वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने 2018 में झारखंड में लिंचिंग कर हत्या के दोषी आठ आरोपियों को माला पहनाई. नतीजतन, अल्पसंख्यकों के लिए देश में ऐसी स्थिति में अपने हितों की रक्षा करना मुश्किल हो जाता है.

भारतीय राजनीति में मुसलमान अस्वीकार्य हो गए हैं

अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों पर अंकुश लगाने को लेकर विपक्ष और सत्ताधारी राजनीतिक दलों में भी एकता नहीं है. विपक्षी दल बयानबाज़ी और जुमलेबाजी करते रहते हैं और सरकार को हिंदू कट्टरपंथियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए मजबूर करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाते. विपक्षी दल के नेताओं का निजी तौर पर कहना है कि मुसलमानों की रक्षा के लिए उनका समर्थन करने से हिंदू मतदाता उनसे विमुख हो जाएंगे और उन्हें राजनीतिक रूप से नुकसान पहुंचाएंगे.

भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों से भाजपा की आक्रामक हिंदुत्वा राजनीति के कारण प्रचलित हुए इस नए चलन ने भारत की राजनीति में मुसलमानों को गैर-ज़रूरी और अस्वीकार्य बना दिया है. हर राजनीतिक दल चुनाव में मुस्लिम वोट तो चाहता है ,लेकिन फिर भी, त्रिपुरा में या देश में कहीं और हो रही मुस्लिम विरोधी हिंसा की घटनाओं में उन्हें न्याय दिलाने के लिए उनमें से कोई आगे नहीं आता है.

मीडिया ने भी त्रिपुरा में मुस्लिम विरोधी हिंसा की अनदेखी की

मुख्यधारा मीडिया ने भी त्रिपुरा में मुस्लिम विरोधी हिंसा को कवरेज देने से परहेज़ किया है, हालांकि सभी बड़े मीडिया घरानों की पड़ोसी असम की राजधानी गुवाहाटी में अच्छी उपस्थिति है. अब तक त्रिपुरा हिंसा को लेकर जो भी खबरें सामने आती रही हैं वो सब दिल्ली में मुस्लिम समूहों द्वारा चलाए जा रहे न्यूज़ पोर्टल्स के ज़रिए आई हैं.

फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों को कवर करने वाले मीडिया के एक वर्ग ने मुसलमानों को निशाना बनाया और बिना किसी सबूत के उन पर आरोप लगाए. सभी जानते हैं कि केंद्र सरकार ने 2020 में महामारी के शुरुआती दिनों में धर्म के आधार पर कोविड -19 के आंकड़े जारी किए थे.

सरकार की इस तरह की कार्रवाइयों से प्रभावित होकर, मीडिया ने कोविड -19 कवरेज को सांप्रदायिक बना दिया और भारत में कोरोना महामारी के प्रसार के लिए तब्लीगी जमात और मुसलमानों को सीधे तौर पर ज़िम्मेदार ठहराया. इसके परिणामस्वरूप पूरे देश में कई स्थानों पर मुसलमानों के खिलाफ नफरत आम हो गई और उनपे हमले हुए.

त्रिपुरा मुद्दे पर एनजीओ व मानवाधिकार समूह खामोश

नागरिक समाज समूहों, गैर सरकारी संगठनों और मानवाधिकार संगठनों ने त्रिपुरा मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है. ऐसा लगता है कि भारत में कुल मिलाकर मुसलमानों को खुद के मुद्दे खुद उठाने के लिए छोड़ दिया गया है, भले ही वह मानवाधिकार का विषय हो. सरकार अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभा रही है. विपक्षी राजनीतिक दल हिंदू वोट खोने से डरते हैं. नागरिक समाज सक्रियता की कमी और मुसलमानों के खिलाफ हिंदुत्वा समूहों द्वारा गढ़े गए झूठे प्रोपेगेंडा से प्रभावित होने के कारण दृश्य से अनुपस्थित है.

बांग्लादेश में सांप्रदायिक तत्वों के खिलाफ शेख हसीना का साहसिक कदम

बांग्लादेश में हुई हिंसा के खिलाफ प्रधान मंत्री शेख हसीना द्वारा की गई कार्रवाई दुनिया के सभी लोकतंत्रों के लिए एक सबक होनी चाहिए. अब तक हिंदू विरोधी हिंसा के सिलसिले में 680 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किए जाने की खबर है. कुल 71 प्राथमिकी दर्ज की गईं. मुख्य अपराधी एक मुस्लिम को भी गिरफ्तार कर लिया गया है.

जैसे ही बांग्लादेश में हिंदू विरोधी हिंसा शुरू हुई, शेख हसीना ने इसकी कड़ी निंदा की और अपने देश के गृह मंत्री को हिंसा में शामिल दोषियों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करने का निर्देश दिया. सोशल मीडिया पर भी उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक एकता को लेकर बयान जारी किया.

उन्होंने एक ट्वीट में कहा, “हिंदुओं को बिना किसी डर के पूजा करने का उतना ही अधिकार है जितना कि मुसलमानों और अन्य धार्मिक समूहों को. उन्होंने भी लिब्रेशन वार 1971 के दौरान अपने मुस्लिम भाइयों के साथ लड़ाई लड़ी और बांग्लादेश में उनके समान अधिकार हैं.

उनकी पार्टी, अवामी लीग ने भी एक बयान जारी कर आम जनता से कट्टरता का विरोध करने की अपील की, जिसका नारा था, “प्रत्येक अपने धर्म के लिए, त्योहार सभी के लिए”

बांग्लादेश के राजनीतिक दलों, छात्रों, नागरिक समाज ने निकाला शांति मार्च

अवामी लीग ने ढाका और अन्य शहरों में भी शांति मार्च आयोजित किए, जिसमें नागरिक समाज समूह और मानवाधिकार संगठन शामिल हुए. ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने भी हिंदुओं पर हमलों के खिलाफ और सभी समुदायों के बीच एकता और सद्भाव के समर्थन में विरोध प्रदर्शन किया. विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने भी सांप्रदायिक हिंसा की कड़ी निंदा की. बीएनपी नेता मिर्ज़ा अब्बास ने लोगों से हिंदू विरोधी हिंसा का विरोध करने की अपील की.

अवामी लीग के महासचिव ओबैदुल कादर ने एक रैली को संबोधित करते हुए कहा था कि “हिंदू भाइयों और बहनों डरिए मत, शेख हसीना और अवामी लीग आपके साथ हैं. शेख हसीना की सरकार अल्पसंख्यक हितैषी सरकार है.

भारतीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार बांग्लादेशी मीडिया ने बहुत ज़िम्मेदारी से व्यवहार किया. उन्होंने कोई हिंदू विरोधी या उत्तेजक समाचार प्रकाशित नहीं किया. मीडिया की इस प्रतिक्रिया ने हिंसा को रोकने में मदद की.

क्या भारत सरकार, राजनीतिक दल, मीडिया, नागरिक समाज समूह, मानवाधिकार संगठन और छात्र संगठन बांग्लादेश से सबक लेंगे?

- Advertisement -
- Advertisement -

Stay Connected

16,985FansLike
2,458FollowersFollow
61,453SubscribersSubscribe

Must Read

भीमा-कोरेगांव मामला: 82 वर्षीय वरवर राव को मिली ज़मानत, 13 अन्य अभी भी सलाखों के पीछे

सैयद ख़लीक अहमद नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिमी महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव में जातिगत हिंसा की साजिश रचने...
- Advertisement -

पीएम मोदी को लिखे गए ‘ओपेन लेटर’ में मौलाना मौदूदी को क्यों बनाया गया निशाना?

सैयद ख़लीक अहमद नई दिल्ली | क्या विभाजन के बाद से अब तक किसी भारतीय मुस्लिम नेता ने 2047...

नीतीश कुमार ने 8वीं बार ली बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ, तेजस्वी बने डिप्टी सीएम

इंडिया टुमारो नई दिल्ली | बिहार में जनता दल-यूनाइटेड और भाजपा गठबंधन टूटने के बाद बुधवार को नीतीश कुमार...

भीमा कोरेगांव मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल आधार पर वरवर राव को दी ज़मानत

इंडिया टुमारो नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को भीमा कोरेगांव के मामले में आरोपी 84 वर्षीय पी...

Related News

भीमा-कोरेगांव मामला: 82 वर्षीय वरवर राव को मिली ज़मानत, 13 अन्य अभी भी सलाखों के पीछे

सैयद ख़लीक अहमद नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिमी महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव में जातिगत हिंसा की साजिश रचने...

पीएम मोदी को लिखे गए ‘ओपेन लेटर’ में मौलाना मौदूदी को क्यों बनाया गया निशाना?

सैयद ख़लीक अहमद नई दिल्ली | क्या विभाजन के बाद से अब तक किसी भारतीय मुस्लिम नेता ने 2047...

नीतीश कुमार ने 8वीं बार ली बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ, तेजस्वी बने डिप्टी सीएम

इंडिया टुमारो नई दिल्ली | बिहार में जनता दल-यूनाइटेड और भाजपा गठबंधन टूटने के बाद बुधवार को नीतीश कुमार...

भीमा कोरेगांव मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल आधार पर वरवर राव को दी ज़मानत

इंडिया टुमारो नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को भीमा कोरेगांव के मामले में आरोपी 84 वर्षीय पी...

बिहार में भाजपा-जदयू गठबंधन टूटा, राजद से गठजोड़, महागठबंधन के साथ बनेगी नई सरकार

ख़ान इक़बाल | इंडिया टुमारो नई दिल्ली | बिहार में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और जनता दल यूनाईटेड (जदयू)...
- Advertisement -

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here