Sunday, December 5, 2021
Home पॉलिटिक्स प्रिया रमानी, #MeToo मूवमेंट और 'नारीवाद' के कुछ उपेक्षित सवाल

प्रिया रमानी, #MeToo मूवमेंट और ‘नारीवाद’ के कुछ उपेक्षित सवाल

-हुमा मसीह

इसी साल फरवरी में प्रिया रमानी से जुड़े मामले पर आए कोर्ट के फैसले ने #MeToo की बहस को दुबारा गति प्रदान कर दी थी. प्रिया रमानी एक पत्रकार, लेखक और संपादक के रूप में जानी जाती हैं. प्रिया रमानी ने वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर पर यौन दुर्व्यवहार का आरोप लगाया था. एम जे अकबर द्वारा प्रिया रमानी पर किए मानहानि केस में फैसला प्रिया रमानी के पक्ष में आया जो राहत और खुशी का विषय है.

भारत के नारीवादी तबके में तो इस फैसले पर जबरदस्त जश्न का माहौल रहा है, लेकिन कोर्ट के इस फैसले पर जश्न मनाते इस माहौल में बहुत सारे ऐसे सवाल भी जन्म लिए जो बिना किसी चर्चा के उपेक्षित रह गए. वह सभी सवाल जो स्वार्थ और अवसरवाद से ऊपर उठकर मीटू आंदोलन को एक नया आयाम दे सकते थे और इस मुद्दे को और भी अधिक मानवीय बना सकते थे.

आखिर क्या है #MeToo मूवमेंट?

2017 में अमेरिका में हॉलीवुड के फेमस प्रोड्यूसर हार्वी वाइनस्टीन पर कई महिला कलाकारों और नामी एक्ट्रेसेज द्वारा यौन शौषण के आरोप लगाए जाने के बाद शुरू हुआ था. #MeToo मूवमेंट जिसने बाद में अमेरिका की सरहदों से निकल कर पूरी दुनिया में औरतों को उनके साथ हुई यौन शोषण की घटना को लिखने की हिम्मत दी.

इसी #MeToo मूवमेंट के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए प्रिया रमानी ने अक्टूबर 2017 में वोग मैगज़ीन में एक आर्टिकल लिखा जिसका टाइटल था “To The Harvey Weinsteins of the World”

इस आर्टिकल में प्रिया रमानी ने 1993 में अपने कैरियर की शुरुआत में हुए उनके एक इंटरव्यू का ज़िक्र किया. इसमें उन्होंने अपने एक भूतपूर्व बॉस का नाम लिए बिना उन्हें यौन कुंठित व्यक्ति कहा.

2018 में पत्रकार गज़ाला वहाब द्वारा एम जे अकबर का नाम लेकर एक ट्वीट किया गया जिसमें कहा गया था कि, “न जाने कब एम जे अकबर का सच बाहर आएगा.”

इस ट्वीट के बाद प्रिया रमानी ने खुले तौर पर 2017 के अपने वोग मैगज़ीन आर्टिकल को शेयर करते हुए ट्वीट किया कि, “इसकी शुरुआत में बताया गया अनुभव एमजे अकबर के साथ का है. मैंने उनका नाम इसमें इसलिए नहीं लिया था क्योंकि उन्होंने कुछ नहीं किया था. इस प्रिडेटर(यौन कुंठित) को लेकर कई औरतों के पास बुरे अनुभव हैं. हो सकता है कि वो उन्हें शेयर करें.”

इसके बाद कई और महिलाओं ने एम जे अकबर पर आरोप लगाए . बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार पत्रकार शुमा राहा, गज़ाला वहाब और सबा नकवी के साथ साथ करीब 20 महिलाओं ने आरोप लगाएं.

महिलाओं का आरोप था कि द एशियन एज और अन्य अख़बारों के संपादक रहते हुए अकबर ने उनका यौन उत्पीड़न किया था.

तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर ने इन आरोपों के बाद 17 अक्तूबर 2018 को केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया था.

इस पूरे घटनाक्रम के बाद तत्कालीन राज्यसभा सांसद और विदेश राज्य मंत्री एम जे अकबर ने प्रिया रमानी के ऊपर मानहानि का केस कर दिया. और आखिर 2021 में प्रिया रमानी को मानहानि के आरोपों से कोर्ट ने बरी कर दिया.

प्रिया रमानी की ही तरह बॉलीवुड में भी कई महिलाओं ने कई सालों पूर्व हुए अपने यौन शोषण के बारे में खुलकर लिखा. इसमें बॉलीवुड में भूतपूर्व राइटर प्रोड्यूसर विनता नंदा द्वारा एक्टर आलोकनाथ पर लगाए गए आरोप मुख्य रूप से शामिल हैं.

कोर्ट ने प्रिया रमानी मामले में क्या कहा था?

फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि प्रिया रमानी के द्वारा किया गया खुलासा कार्यस्थलों में महिलाओं के साथ होने वाले यौन शोषण को बाहर लाने में मददगार था. कोर्ट ने यह भी माना कि दफ्तरों और काम करने की जगहों में महिलाओं का व्यवस्थित तरीके से यौन शोषण होता है.

कोर्ट ने ये भी माना कि उस वक़्त यानी साल 1993-1994 में औरतों को वर्कप्लेस में यौन शोषण से सुरक्षा देने वाली विशाखा गाइडलाइन्स भी मौजूद नहीं थीं. साथ ही इस तरह के आरोप लगाने वाली महिला को समाज के लांछन भी सहने पड़ते हैं, समाज को समझना चाहिए कि सेक्शुअल अब्यूज झेलने वाली महिलाओं पर इसका क्या असर होता है.

इसके अलावा कोर्ट ने ये भी स्वीकार किया कि समाज में अच्छी पहचान रखने वाला पुरुष भी सेक्शुअल अब्यूज़र (यौन दुर्व्यवहार करने वाला) हो सकता है. और एक पुरुष की रेपुटेशन (तथाकथित सम्मान) को बचाने के लिए एक महिला के आत्मसम्मान की बलि नहीं चढ़ाई जा सकती. औरतों के सम्मान और बराबरी के बारे में बात करते हुए कोर्ट ने रामायण और महाभारत से उदाहरण भी दिए. और इसके बाद प्रिया रमानी को मानहानि के सभी आरोपों से बरी कर दिया.

अब चर्चा उन सवालों की जो उपेक्षित रह गए

लेकिन इन सारे घटनाक्रमों के मध्य हमे उन नैतिक पहलुओं पर ज़रूर चर्चा करनी चाहिए जो स्त्री और पुरुष पर समान रूप से लागू होते हैं. स्त्री होने की दुहाई देकर किसी को भी उन नैतिक ज़िम्मेदारियों से मुक्त नहीं किया जा सकता, और यदि ऐसा किया जाता है तो फिर वो विमर्श समाज में बराबरी की स्थापना के अपने उद्देश्य में नाकाम ही रहता है.

एलीट तबके की तथाकथित नारीवादी स्त्रियां अक्सर अपनी लड़ाई एक सेफ ज़ोन में रहकर लड़ती है. उनकी लड़ाई में पहली प्राथमिकता अपना कैरियर बचाना होता है ना कि आगे आने वाली नई लड़कियों को उस संभावित यौन शोषक से बचाना.

नैतिकता का तकाज़ा यह है कि यदि किसी व्यक्ति को किसी रास्ते के खतरे के बारे में मालूम हो जाता है तो यह उसका कर्तव्य हो जाता है कि उस राह पे उसके पीछे आने वाले लोगों को इस संभावित खतरे से वो अवगत करवाए और उन्हें सावधान करे.

अगर हम प्रिया रमानी और उनके जैसे तमाम मामलो पर नज़र डालें तो एक चीज़ साफ समझ आ जायेगी कि यदि वो लोग घटना के बाद फौरन उस बड़े पद वाले संभावित यौन कुंठित, दुर्व्यवहार करने वाले व्यक्ति के बारे में दूसरी महिलाओं को सावधान करतीं तो शायद उन्हें उनके कैरियर में नुकसान उठाना पड़ता इसलिए उन्होंने पहले अपना कैरियर बड़ा बनाया और एक बड़ा नाम बनने के बाद खुलासे किए. और इस प्रकार उनके कैरियर पर कोई आंच भी नहीं आई और वो नारीवाद का बड़ा नाम भी बन गईं.

भारतीय नारीवाद एक खास किस्म के सांचे में रहकर विमर्श कर रहा है. इस प्रकार के नारीवादी विमर्श से लैंगिक समानता की स्थापना तो होगी ही नहीं साथ ही यह समाज के दोनों जेंडर के मध्य तनाव का माहौल पैदा करेगा. प्रिया रमानी और बाकी महिलाओं का हम सम्मान करते हैं कि 20 साल बाद ही सही उन्होंने आवाज़ उठाई. लेकिन इस देरी के पीछे क्या वजह थी उस पर एक विमर्श होना चाहिए.

यह कौनसा तर्क है कि आप गलत यौन व्यवहार के बाद भी आरोपी के नीचे काम करते रहें. गौरतलब है कि प्रिया रमानी ने कहा था कि उस घटना के बाद भी उन्होंने आरोपी के मातहत काम किया था.

वास्तव में जब आप इस घटना को छुपा रही थीं तो असल में उन तमाम औरतों से इस यौन कुंठित व्यक्ति का चरित्र छुपा रहीं है जिनका सामना अपने कैरियर के दौरान उस व्यक्ति से होगा और वो उन दूसरी औरतों को भी अपनी यौन दुर्व्यवहार का शिकार बनाएगा.

भारत में ‘नारीवाद’ के विमर्श पर कुछ ‘क्रांतिकारी’ एलीट महिलाओं ने कब्ज़ा कर लिया है. इसलिए वो उन्ही विचारों या घटनाओं को ज़्यादा सेलिब्रेट करती हैं जहां बिना कैरियर को दांव पर लगाएं क्रांति की जाए. इस तरह की क्रांति में यह बात सुनिश्चित की जाती है कि पहले सेफ ज़ोन में रहकर, किसी के खिलाफ कुछ न बोलकर अपना बड़ा नाम बना लिया जाए इसके बाद जब आपके कैरियर को कोई खतरा न हो तब आवाज़ उठाई जाए.

हालांकि, गांव या छोटे शहरों की बनिस्बत बड़े शहरों में महिला अपराधों की शिकायत और उनपर त्वरित कार्रवाई ज़्यादा आसान है. लेकिन देखा गया है कि गांव या छोटे शहरों की महिलाएं अपने विरुद्ध हुए यौन दुराचार को लेकर शिकायत दर्ज करवाने में अधिक निर्भीक और साहसी हैं. ये अलग बात है कि कभी जातिगत कारणों से या कभी राजनीतिक कारणों से उनकी शिकायत दर्ज नहीं की जाती या दर्ज होने पर कार्रवाई नहीं की जाती.

ग्रामीण भारत की महिलाएं अपने साथ हुई आपराधिक घटना की शिकायत अपना करियर देखकर नहीं करतीं, उनके निर्णय में भौतिकवाद नहीं होता, आर्थिक कारण नहीं होते. उनकी शिकायतों में ईमानदारी और आत्मसम्मान की झलक के साथ नारीवाद का एक नया विमर्श होता है.

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