Sunday, December 5, 2021
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केंद्र सरकार द्वारा कश्मीर में शांति स्थापना के सभी दावे खोखले साबित हो रहे

इशफ़ाक़ुल हसन | इंडिया टुमारो

श्रीनगर | केंद्र सरकार द्वारा दावा किया जाता रहा है कि कश्मीर में सब कुछ सामान्य है लेकिन यहां पिछले चार दिनों में संदिग्ध उग्रवादियों द्वारा अल्पसंख्यक समुदाय के चार लोगों सहित छः नागरिकों की गोली मारकर हत्या करने के बाद केंद्र का यह दावा पूरी तरह से झूठा साबित हो चुका है.

श्रीनगर के अलोची बाग क्षेत्र के निवासी और ईदगाह स्थित गवर्नमेंट बॉयज़ स्कूल संगम की प्रिंसिपल सुपिन्दर कौर और जम्मू निवासी दीपक चंद की 7 अक्टूबर को स्कूल परिसर में गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी.

इससे पहले मंगलवार को, कश्मीर के एक प्रसिद्ध केमिस्ट, एक बिहारी “पानीपुरी” विक्रेता, और एक स्थानीय कैब ड्राइवर कश्मीर में हुई विभिन्न घटनाओं में मारे गए थे. इससे एक दिन पहले श्रीनगर के पुराने शहर में एक नागरिक की मौत हो गई थी.

पुलिस महानिदेशक दिलबाग सिंह ने कहा कि, “कश्मीर में हुई यह घटनाएं कश्मीरी मुसलमानों को बदनाम करने की एक कोशिश है. शिक्षकों सहित निर्दोष नागरिकों की हत्या, कश्मीर में सांप्रदायिक सद्भाव और भाईचारे की सदियों पुरानी परंपरा पर हमला करने और उसे नुकसान पहुंचाने की दिशा में एक कदम है.”

पुलिस को पिछले मामलों में हत्यारों के बारे में कुछ सुराग मिले हैं. सिंह ने कहा कि, “मैंने स्कूल के स्टाफ सदस्यों से बात की, और वे दो सहयोगियों को खोने की वजह से पूरी तरह सदमे में हैं. पुलिस जल्द ही हत्यारों को पकड़ लेगी.”

पुलिस के आश्वासन के बावजूद कश्मीर में खौफ का माहौल बना हुआ है. घाटी में रह रहे कश्मीरी पंडित पलायन करने की योजना बना रहे हैं और सिखों ने मानसिक सदमे के कारण ड्यूटी नहीं करने का फैसला किया है.

गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (जीपीएस), श्रीनगर के महासचिव नवतेज सिंह का कहना है कि, “हम इस जगह को छोड़ना नहीं चाहते हैं, लेकिन जब तक हम सुरक्षित महसूस नहीं करेंगे तब तक हम अपनी ड्यूटी नहीं कर पाएंगे. जो लोग दूर-दराज के इलाकों से नौकरी करने आते हैं उन्हें उनके घरों के पास स्थानांतरित कर दिया जाना चाहिए क्योंकि हत्याएं शहर के बीचों-बीच हुई हैं. जब मुख्य शहर में ही कोई सुरक्षा नहीं है, तो दूर-दराज़ के इलाकों में तो और भी बदतर स्थिति होगी.”

हत्याओं के पीछे जो ग्रुप है उस को खत्म करने के लिए पुलिस ओवरटाइम काम कर रही है. एक स्थान पर गोलीबारी में चन्नपोरा इलाके में एक आतंकवादी मारा गया, लेकिन हत्याओं की ताज़ा घटनाओं से उसका कोई संबंध नहीं था. इससे पहले, सुरक्षा बलों ने अनंतनाग में एक आम नागरिक जो कि ड्राइवर था उस की कथित तौर पर नाका जंप करने के बाद गोली मार दी थी.

इन घटनाओं ने केंद्र सरकार के उन दावों की पोल खोल दी है, जो सरकार 5 अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद से करती रही है जिनके अनुसार कश्मीर में स्थिति सामान्य है और अब वहां शांति है. सरकार आतंकवाद से संबंधित घटनाओं और पथराव की घटनाओं में गिरावट को लेकर फर्ज़ी दावे करती रही है.

गोलीबारी की इन घटनाओं ने 1990 की यादें ताज़ा कर दी, जब आम नागरिक मारे गए थे और सुरक्षा बल अंधेरे में थे.

पीपुल्स अलायंस फॉर गुप्कर डिक्लेरेशन (पीएजीडी) के प्रवक्ता मोहम्मद यूसुफ तारिगामी ने कहा कि, “नरेंद्र मोदी सरकार के कश्मीर को लेकर किए गए फैसले न केवल सुरक्षा स्थिति में सुधार करने में विफल रहे हैं बल्कि इन्होंने विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच तनाव पैदा करने का काम किया है. जम्मू और कश्मीर प्रशासन के कुछ हालिया फैसलों ने उन समुदायों के बीच मतभेदों को बढ़ाने का काम किया है जो अब तक एक-दूसरे के बीच शांति से रहते आ रहे थे.”

जबसे जम्मू और कश्मीर सरकार ने केंद्र शासित प्रदेश में प्रवासी भूमि को अतिक्रमणकारियों से मुक्त करने के लिए बड़े पैमाने पर अतिक्रमण विरोधी अभियान शुरू किया है, उसके बाद हत्या की यह घटनाएं हुई हैं.

श्रीनगर के डेप्युटी कमिश्नर मोहम्मद एजाज़ असद ने कहा कि जिला प्रशासन को अब तक 660 शिकायतें मिली हैं.

जिसमें से धोखाधड़ी या डिस्ट्रेस सेल की 390 शिकायतों का समाधान किया गया.

इसी प्रकार प्रवासी संपत्तियों पर अतिक्रमण की 129 शिकायतों का भी सत्यापन कर निराकरण किया गया. अतिक्रमण की शिकायतों में से 20 मामलों का आवश्यक सीमांकन किया गया है, और आवश्यक बेदखली नोटिस भी जारी किए गए हैं, हालांकि उनमें से 12 उच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन हैं.

अनंतनाग जिला प्रशासन ने मात्र तीन सप्ताह में 41 कनाल (एक हेक्टेयर = 20 कनाल) मुक्त कर दिया है. अधिकारियों ने एक महीने से भी कम समय में दक्षिणी कश्मीर जिले में 1000 शिकायतों में से लगभग 400 को कार्यवाही के लिए आगे बढ़ा दिया है, जबकि 95 प्रतिशत शिकायतें फर्ज़ी पाई गई हैं.

पिछले महीने जम्मू और कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने कश्मीरी प्रवासियों के लिए उनकी अचल संपत्तियों के बारे में शिकायतों को सूचीबद्ध करने के लिए एक पोर्टल लॉन्च किया था.

केंद्र ने 1990 में घाटी से पलायन कर चुके कश्मीरी पंडितों को वापस लाने का वादा किया था. पंडित समुदाय के भीतर विभाजन के बावजूद यह भाजपा की नीति के केंद्र में रहा है.

आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि कश्मीर के लगभग 41,117 प्रवासी परिवार जम्मू में और अन्य 21,000 दिल्ली और दूसरे राज्यों में पंजीकृत हैं. जम्मू में रहने वाले कुल प्रवासी परिवारों में से 37,128 हिंदू, 2,246 मुस्लिम और 1,758 सिख हैं.

घाटी में रहने वाले 3464 लोगों में 808 कश्मीरी पंडित परिवार हैं. गैर-प्रवासी कश्मीरी पंडित 292 स्थानों पर रह रहे हैं, और उनमें से अधिकांश दक्षिण कश्मीर के चार जिलों में रह रहे हैं.

एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि, “यह एक कमी है लेकिन हम इसे दूर करेंगे.”

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