Sunday, December 5, 2021
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ह्यूमन राइट्स वॉच ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों पर कार्रवाई को लेकर जताई चिंता

ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा है कि, “ऐसा मालूम होता है कि भारत सरकार ने आलोचकों को परेशान करने और डराने-धमकाने के लिए ये छापेमारियां की हैं, जो तमाम तरह की आलोचनाओं को चुप करने की उनकी कोशिश के तौर-तरीकों को दर्शाती हैं. ये उत्पीड़नकारी कार्रवाइयां भारत के बुनियादी लोकतांत्रिक संस्थानों को कमज़ोर करती हैं और मौलिक स्वतंत्रताओं का हनन करती हैं.”

इंडिया टुमारो

नई दिल्ली | मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने बयान जारी कर भारत में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और आलोचकों पर कार्रवाई को लेकर चिंता जताई है.

ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपने बयान में कहा है कि, “भारत सरकार मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और आलोचकों को चुप कराने के लिए कर चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के राजनीतिक रूप से प्रेरित आरोपों का इस्तेमाल कर रही है.”

मीडिया को जारी बयान में कहा गया है कि, सितंबर 2021 में, सरकार के वित्त विभाग के अधिकारियों ने श्रीनगर, दिल्ली और मुंबई में पत्रकारों के घरों, समाचार संस्थानों के कार्यालयों, एक अभिनेता के परिसर और एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के घर एवं कार्यालय पर छापे मारे हैं.

ह्यूमन राइट्स वॉच ने चिंता जताते हुए कहा है कि, “ये छापे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संगठन बनाने और शांतिपूर्ण सभा करने पर 2014 में सत्ता में आने के बाद से सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सरकार की बढ़ती दमनात्मक कार्रवाई का हिस्सा हैं. सरकारी तंत्र ने कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, शिक्षाविदों, छात्रों और अन्य लोगों के खिलाफ व्यापक रूप से परिभाषित आतंकवाद और राजद्रोह कानूनों का इस्तेमाल करने समेत राजनीतिक रूप से प्रेरित आपराधिक मामले दर्ज किए हैं. उन्होंने मुखर समूहों को निशाना बनाने के लिए विदेशी अनुदान विनियमों का और वित्तीय गड़बड़ियों के आरोपों का इस्तेमाल भी किया है.”

ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा है कि, “ऐसा मालूम होता है कि भारत सरकार ने आलोचकों को परेशान करने और डराने-धमकाने के लिए ये छापेमारियां की हैं, जो तमाम तरह की आलोचनाओं को चुप करने की उनकी कोशिश के तौर-तरीकों को दर्शाती हैं. ये उत्पीड़नकारी कार्रवाइयां भारत के बुनियादी लोकतांत्रिक संस्थानों को कमज़ोर करती हैं और मौलिक स्वतंत्रताओं का हनन करती हैं.”

बयान में यह भी कहा गया है कि, एडिटर्स गिल्ड और प्रेस क्लब ऑफ इंडिया जैसे पत्रकार संगठनों ने स्वतंत्र मीडिया को परेशान करनेवाली कार्रवाइयों पर रोक लगाने की बार-बार मांग की है और यह कहा है कि ये कार्रवाइयां प्रेस की स्वतंत्रता पर खुला हमला हैं.

सबसे हालिया घटना में, 16 सितंबर को वित्तीय अपराधों की जांच करने वाले प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों ने वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए दिल्ली में कार्यकर्ता हर्ष मंदर के घर और कार्यालय पर छापा मारा. छापेमारी के समय हर्ष मंदर एक फेलोशिप के सिलसिले में जर्मनी में थे. कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और पूर्व लोक सेवकों ने एक संयुक्त बयान जारी कर छापेमारी की निंदा की और इसे “राज्य संस्थानों के दुरुपयोग की एक सतत श्रृंखला” का हिस्सा बताया.

बयान में कहा गया है, “सरकारी तंत्र ने हर्षमंदर को बार-बार निशाना बनाया है. मंदर धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ भाजपा सरकार की भेदभावपूर्ण नीतियों के मुखर आलोचक रहे हैं और सांप्रदायिक हिंसा के शिकार लोगों के साथ काम करते हैं. दिल्ली पुलिस ने फरवरी 2020 में दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा भड़काने वाले भाजपा नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय, मंदर के खिलाफ नफरत फ़ैलाने और सांप्रदायिक हिंसा भड़काने का मनगढ़ंत मामला दर्ज किया.”

कश्मीरी पत्रकारों की प्रताड़ना पर सवाल उठाते हुए ह्यूमन राइट्स वॉच ने चिंता जताते हुए कहा है कि, “8 सितंबर को जम्मू और कश्मीर में पुलिस ने चार कश्मीरी पत्रकारों – हिलाल मीर, शाह अब्बास, शौकत मोट्टा और अजहर कादरी के घरों पर छापे मारे और उनके फोन एवं लैपटॉप जब्त कर लिए. मीर ने बताया कि पुलिस ने उनका और उनकी पत्नी का पासपोर्ट भी ले लिया. अधिकारियों ने चारों को पूछताछ के लिए श्रीनगर पुलिस स्टेशन बुलाया और उन्हें अगले दिन लौटने को कहा. अगस्त 2019 में भाजपा सरकार द्वारा राज्य की स्वायत्त संवैधानिक स्थिति रद्द करने के बाद, कश्मीर में पत्रकार आतंकवाद के आरोपों के तहत गिरफ्तारी समेत सरकार के अधिकाधिक उत्पीड़न का सामना कर रहे हैं.”

जून में, संयुक्त राष्ट्र के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर विशेष दूत और मनमाने हिरासत के मामलों के कार्य समूह ने भारत सरकार को पत्र लिखा जिसमें उन्होंने “जम्मू और कश्मीर की स्थिति का कवरेज करने वाले पत्रकारों को कथित तौर पर मनमाने तरीके से हिरासत में लेने और धमकी देने” पर चिंता व्यक्त की. पत्र में फहद शाह, आकिब जावेद, सजर गुल और काजी शिबली के मामलों का हवाला दिया गया और अक्टूबर 2020 में मुखर अखबार कश्मीर टाइम्स के बंद होने पर भी चिंता जताई गई. इसमें कहा गया कि ये उल्लंघनकारी कार्रवाइयां “जम्मू और कश्मीर में स्वतंत्र रिपोर्टिंग को चुप करने के व्यापक तौर-तरीकों का हिस्सा हो सकते हैं, जो अंततः अन्य पत्रकारों और नागरिक समाज को इस क्षेत्र में जनहित और मानवाधिकारों के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करने से बड़े पैमाने पर रोक सकते हैं.”

समाचार वेबसाइट्स के कार्यालयों पर छापा मारे जाने को लेकर ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा है, “10 सितंबर को आयकर विभाग के अधिकारियों ने कथित कर चोरी की जांच के सिलसिले में दिल्ली में समाचार वेबसाइट्स न्यूज़लॉन्ड्री और न्यूज़क्लिक के कार्यालयों पर छापा मारा. दोनों वेबसाइट्स सरकार की आलोचना के लिए जाने जाते हैं. छापे के दौरान, अधिकारियों ने न्यूज़लॉन्ड्री के प्रधान संपादक अभिनंदन सेखरी के कार्यालय के कंप्यूटरों और निजी सेल फोन एवं लैपटॉप से डेटा डाउनलोड किया, और न्यूज़क्लिक के प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ तथा दूसरे संपादक से विभिन्न वित्तीय दस्तावेज़ के साथ-साथ ईमेल आर्काइव्स भी साथ ले गए. इसके पहले, जून में वित्त विभाग के अधिकारियों ने दोनों मीडिया संस्थानों को निशाना बनाया था. फरवरी में, प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों ने पुरकायस्थ के कार्यालय और घर पर छापा मारा था.”

दैनिक भास्कर अख़बार के कई कार्यालयों पर पिछले महीने छापा मारे जाने को लेकर अपने बयान में कहा है, “जुलाई में कर अधिकारियों ने भारत के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले समाचार पत्रों में से एक, दैनिक भास्कर के मध्य प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र राज्यों में स्थित लगभग 30 कार्यालयों पर छापे मारे. ये कार्रवाई अखबार द्वारा कई महीनों तक कोविड-19 महामारी से निपटने में सरकार के तरीकों की आलोचनात्मक रिपोर्टिंग के बाद हुई. 2017 में, अधिकारियों ने वित्तीय अनियमितता के आरोपों पर टेलीविजन समाचार चैनल एनडीटीवी पर छापा मारा था, यह चैनल भी सरकार की नीतियों का आलोचक है.”

बयान में कहा गया है, “7 सितंबर को उत्तर प्रदेश पुलिस ने भाजपा सरकार की मुखर आलोचक पत्रकार राणा अय्यूब के खिलाफ कथित मनी लॉन्ड्रिंग, धोखाधड़ी, सम्पत्ति के गबन और आपराधिक न्यास भंग के लिए आपराधिक मामला दर्ज किया. “हिंदू आईटी सेल” नामक एक समूह की शिकायत में उन पर यह आरोप लगाया गया कि बाढ़ पीड़ितों और कोविड-19 महामारी से प्रभावित लोगों के लिए धन उगाहने के अभियानों के दौरान उन्होंने ऐसे आपराधिक कृत्य किए.”

ज्ञात हो कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा करने के लिए जून में एक अन्य आपराधिक मामले में अय्यूब पर धार्मिक समूहों के बीच वैमनस्य को बढ़ावा देने और धार्मिक विश्वासों का अपमान करने का आरोप लगाया.

इस वीडियो में, एक मुस्लिम व्यक्ति हिन्दुओं पर अपनी पिटाई करने और उसे जय श्री राम कहने के लिए मजबूर करने का आरोप लगाया है. सोशल मीडिया पर सरकार के समर्थकों और हिंदू राष्ट्रवादी ट्रोल्स ने अय्यूब को बार-बार गालियां दी हैं और उन्हें धमकाया है. 2018 में, उन्हें मौत की धमकी मिलने के बाद, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने भारत सरकार से उन्हें सुरक्षा प्रदान करने की मांग की थी.

ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा है कि, “संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त और संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न मानवाधिकार विशेषज्ञों ने पिछले कुछ वर्षों में नागरिक समाज समूहों के लिए सिकुड़ते स्पेस और मानवाधिकार रक्षकों और अन्य आलोचकों के उत्पीड़न और आरोपों में वृद्धि पर चिंता व्यक्त की है. उन्होंने सरकार से यह सुनिश्चित करने की मांग की है कि किसी को भी उनके बुनियादी मानवाधिकारों का प्रयोग करने के लिए हिरासत में नहीं लिया जाए और देश के नागरिक समाज समूहों को सुरक्षा प्रदान की जाए.”

गांगुली ने कहा, “अपने घर में मूलभूत स्वतंत्रता का गला घोंटकर, भारत मानवाधिकारों को बढ़ावा देने वाले विश्व नेता के रूप में अपने प्रभाव को कम कर रहा है. सरकार को चाहिए कि अपने तौर-तरीके में बदलाव लाए और अपने लोगों के मूलभूत अधिकारों का सम्मान करे.”

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