Saturday, September 25, 2021
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बसपा प्रमुख मायावती ने मुख्तार अंसारी से किया किनारा, पूर्व में बताया था गरीबों का मसीहा

मायावती ने मुख्तार अंसारी की विधानसभा सीट मऊ से मुख्तार अंसारी के स्थान पर बसपा के यूपी अध्यक्ष भीम राजभर को उम्मीदवार घोषित कर दिया है। मौजूदा समय में मऊ से मुख्तार अंसारी विधानसभा सदस्य हैं। मुख्तार अंसारी मऊ से 5 बार से लगातार विधायक चुने जाते हैं। मायावती ने मुख्तार अंसारी का विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए टिकट काटते हुए कहा है कि अब पार्टी में अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं है। मायावती की यह बात गले नहीं उतरती है, क्योंकि 2017 के विधानसभा चुनाव में इन्हीं मायावती ने मुख्तार अंसारी को बसपा में शामिल कर विधानसभा चुनाव लड़वाया था और गरीबों का मसीहा बताया था। हालांकि, अब यही गरीबों का मसीहा मुख्तार, अंसारी मायावती को माफिया डॉन और अपराधी नज़र आ रहा है .

अखिलेश त्रिपाठी | इंडिया टुमारो

लखनऊ । बसपा सुप्रीमो मायावती ने पार्टी में अपराधियों की कोई जगह नहीं है कहकर मुख्तार अंसारी की बसपा से विधानसभा उम्मीदवारी खत्म कर दिया है। इस बयान के साथ ही मायावती ने मुख्तार अंसारी का विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए पार्टी का टिकट काट दिया है। मुख्तार अंसारी को लेकर यूपी की राजनीति गरमाई हुई है।

मायावती ने मुख्तार अंसारी की विधानसभा सीट मऊ से मुख्तार अंसारी के स्थान पर बसपा के यूपी अध्यक्ष भीम राजभर को उम्मीदवार घोषित कर दिया है। मौजूदा समय में मऊ से मुख्तार अंसारी विधानसभा सदस्य हैं। मुख्तार अंसारी मऊ से 5 बार से लगातार विधायक चुने जाते हैं। मायावती ने मुख्तार अंसारी का विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए टिकट काटते हुए कहा है कि अब पार्टी में अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं है। मायावती की यह बात गले नहीं उतरती है, क्योंकि 2017 के विधानसभा चुनाव में इन्हीं मायावती ने मुख्तार अंसारी को बसपा में शामिल कर विधानसभा चुनाव लड़वाया था।

मायावती ने मुख्तार अंसारी को बसपा में शामिल करते समय उन्हें गरीबों का मसीहा बताया था। अब यही गरीबों का मसीहा मुख्तार अंसारी मायावती को माफिया डॉन और अपराधी नजर आ रहा है ? मायावती मुख्तार अंसारी को माफिया डॉन और अपराधी बताकर वह क्या कहना चाहती हैं, इसका जवाब तो वही जानती हैं और वही जवाब दे सकती हैं ? लेकिन मायावती का एजेंडा भी पूरी तरह साफ नहीं है। अगर मायावती यह समझती हैं कि उनकी पार्टी के ऊपर अपराधियों को संरक्षण देने का आरोप लगाया जाएगा, तो मायावती को यह भी जान लेना चाहिए कि यूपी विधानसभा में लगभग आधे विधायकों के ऊपर अपराधी होने का आरोप लगा हुआ है।

मायावती ने 2017 के विधानसभा चुनाव में जब मुख्तार अंसारी को पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़वाया था, तो उस समय मुख्तार अंसारी क्या अपराधी नहीं थे? मायावती कहीं न कहीं से दबाव में हैं और वह इस दबाव के चलते मुख्तार अंसारी से किनारा कर रही हैं। मुख्तार अंसारी के ऊपर अपराध में लिप्त होने का और भाजपा के स्व.विधायक कृष्णानन्द राय की हत्या का भी आरोप है। लेकिन इस सबके बावजूद अभी तक मुख्तार अंसारी में मायावती को अपराधी होने की तस्वीर क्यों नहीं दिखाई देती थी? मायावती ने मुख्तार अंसारी की ताकत का इस्तेमाल कर राजनीतिक फायदा उठाया है। लेकिन हकीकत यही है कि मायावती अब राजनीतिक दबाव में कहीं से प्रभावित हैं और इसी कारण उन्होंने मुख्तार अंसारी से किनारा कर लिया है।

अगर यूपी की राजनीति पर नज़र डाली जाए, तो यह बात बिल्कुल साफ तौर पर स्पष्ट हो जाती है कि मायावती ने मुख्तार अंसारी का टिकट यूं ही अचानक नहीं काटा है। मायावती ने मुख्तार अंसारी का विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए टिकट काटकर एक तीर से कई शिकार किया है। मायावती ने इसके लिए जो दांव -पेंच चला है, उसमें पहला कारण मुख्तार अंसारी के बड़े भाई सिबगतुल्लाह अंसारी का सपा ज्वाईन करना है। सिबगतुल्लाह अंसारी के सपा ज्वाईन करने से मायावती को लग रहा है कि मुख्तार अंसारी कभी भी सपा में जा सकते हैं। मुख्तार अंसारी ही नहीं बल्कि उनके एक दूसरे बड़े भाई गाजीपुर से सांसद अफजाल अंसारी भी बसपा को छोंड़ सकते हैं।

अंसारी बन्धुओं के सपा के पाले में जाने की संभावना को देखकर मायावती ने पहले ही अपना राजनीतिक दांव -पेंच चल कर मुख्तार अंसारी का मऊ से विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए टिकट काट दिया है। मायावती ने अंसारी बन्धुओं के फैसला लेने से पहले ही अपना फैसला कर अंसारी बन्धुओं के ऊपर भारी होने का राजनैतिक संदेश देने का काम किया है। मायावती ने इस प्रकार का फैसला कर बसपा छोड़ने वालों को पार्टी में बनाए रखने के लिए दबाव बनाने का काम किया है। क्योंकि मायावती का भाजपा प्रेम अभी भी कहीं न कहीं दिखाई पड़ जाता है।

मायावती और उनकी पार्टी बसपा का नुकसान उनके भाजपा प्रेम के कारण ही हुआ है। लेकिन मायावती ने अभी भी अपनी गलतियों से सबक नहीं लिया है। बसपा के प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन आयोजित करने और उसके जरिए पार्टी के साथ ब्राह्मणों के जुड़ने से उसकी ताकत ज़रूर बढ़ी है। लेकिन मायावती की गलतियों से बसपा को फिर नुकसान हो सकता है, क्योंकि मायावती भाजपा से कहीं ज्यादा सपा की आलोचना करती रहती हैं। मायावती के इस कदम से राज्य के वोटरों में यह संदेश जाता है कि बसपा सुप्रीमो मायावती की भाजपा से अंदरूनी सांठगांठ है। मायावती के इन्हीं कार्यों के कारण बसपा को नुकसान भी हो रहा है और इन्हीं सब के चलते बसपा में मौजूद भाजपा विरोधी राजनेता बसपा को छोड़ रहे हैं। लेकिन मायावती को यह सब समझ में नहीं आ रहा है।

मायावती के द्वारा मुख्तार अंसारी के मऊ से टिकट काटने का दूसरा कारण पार्टी के अस्तित्व को बचाना है। बसपा इस समय यूपी में संक्रमण से गुज़र रही है। बसपा के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। बसपा पूर्वी उत्तर प्रदेश में अच्छी ताकत रखती है और यहां से उसके काफी विधायक चुने जाते हैं। पूर्वी यूपी में राजभर समुदाय के वोटरों की संख्या काफी ज्यादा है। इनको अपने साथ साधकर बसपा पूर्वी उत्तर प्रदेश में चुनाव में बड़ा फेरबदल करने में सफल हो जाती है। विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष सुखदेव राजभर आजमगढ़ जिले से बसपा के विधायक हैं और इस समय वह बीमार चल रहे हैं। लेकिन मायावती ने उनकी कोई खोज- खबर नहीं लिया है।

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सुखदेव राजभर के आवास पर जाकर उनका हालचाल लिया है और हर संभव उन्हें मदद करने का वादा किया है। सुखदेव राजभर के लड़के ने सपा ज्वाईन कर लिया है और अब वह ही विधानसभा चुनाव सपा से लड़ेगा। सुखदेव राजभर बहुत ही विनम्र और सुलझे हुए राजनेता हैं। इनका अपनी बिरादरी पर काफी प्रभाव है। इनके कहने पर इनकी बिरादरी के वोटर बसपा के पक्ष में जमकर मतदान करते हैं। लेकिन अब समीकरण बिगड़ गए हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश के बसपा अध्यक्ष राम अचल राजभर को मायावती ने बसपा से निकाल दिया है। राम अचल राजभर अम्बेडकर नगर से विधायक हैं। इस तरह सुखदेव राजभर के चुप्पी साध लेने से, अखिलेश यादव को समर्थन करने से और राम अचल राजभर के बसपा से बाहर होने के कारण पूर्वी उत्तर प्रदेश में भाजपा की हालत खराब है।

राजभर वोटरों के बसपा के पाले से खिसक जाने से परेशान होकर बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपनी पार्टी के यूपी के नए प्रदेश अध्यक्ष भीम राजभर को इसीलिए मऊ से बसपा उम्मीदवार घोषित किया है। मायावती ने इस तरह पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपनी पार्टी के अस्तित्व को बचाने के लिए और राजभर वोटरों को साथ लाने के लिए भीम राजभर को मऊ से उम्मीदवार घोषित किया है। मऊ विधानसभा क्षेत्र में राजभर वोटरों की संख्या निर्णायक भूमिका में है और भीम राजभर को मायावती एक बार पहले मऊ से विधानसभा चुनाव लड़वा चुकी हैं। भीम राजभर का मुकाबला मुख्तार अंसारी से हुआ था, जिसमें भीम राजभर चुनाव में पराजित हो गए थे। इस प्रकार मायावती बसपा के अस्तित्व को बचाने के लिए काफी हद तक परेशान हैं।

मायावती यह मानकर चल रही हैं कि भीम राजभर के मऊ से चुनाव लड़ने से राजभर वोटर बसपा के साथ आ जाएगा और उसे काफी सीटें चुनाव में मिल जाएंगी। लेकिन भीम राजभर को राजभर वोटरों द्वारा मान्यता दी जाती है या नहीं, यह सवाल अभी भविष्य के गर्भ में है। लेकिन मायावती बड़े-बड़ेप्लान तैयार कर बड़ा मंसूबा बना रही हैं।

मायावती द्वारा मऊ से भीम राजभर को बसपा उम्मीदवार घोषित किए जाने से मुख्तार अंसारी खासे नाराज हैं। उन्होंने मायावती पर हमला बोला है और कहा है कि, “राजनीतिक पार्टियां हमारी ताकत नहीं जानती हैं। हम किसी राजनैतिक पार्टी पर ज्यादा भरोसा नहीं करते हैं। हमें जनता की ताकत पर भरोसा है। मऊ की जनता मुझे बहुत प्यार करती है और यही वजह है कि मैं यहां से लगातार 5 बार से विधायक बन रहा हूं। जनता का मैं शुक्रगुजार हूं कि वह मुझ पर भरोसा करती है और प्यार जताते हुए मुझे जिताकर विधायक बनाती है। मेरे लिए मेरे क्षेत्र की जनता ही मेरी पार्टी है। लोग गलतफहमी का शिकार हैं।”

इसी बीच ओवैसी की पार्टी ने मुख्तार अंसारी के लिए अपनी पार्टी का दरवाजा खोल दिया है और मुख्तार अंसारी से पार्टी के टिकट पर कहीं से भी चुनाव लड़ने के लिए प्रस्ताव दिया है। ओवैसी की पार्टी के प्रस्ताव पर अभी मुख्तार अंसारी ने अपनी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं किया है। लेकिन इसी बीच सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने मुख्तार अंसारी का पक्ष लेते हुए यूपी की राजनीति को गरमा दिया है। ओम प्रकाश राजभर ने मायावती के ऊपर हमला बोला है और उन्होंने कहा है कि,”मुख्तार अंसारी मुसलमान हैं, इसलिए इस तरह की गन्दी राजनीति की जा रही है। मुख्तार अंसारी के मुस्लिम होने के कारण उन्हें टारगेट किया जा रहा है। देश की संसद में आधे से ज्यादा सांसद अपराधी हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश की विधानसभा में आधे से ज्यादा विधायक अपराधी हैं। लेकिन इन पर कोई क्यों नहीं बोलता है? बसपा और भाजपा घिनोनी एवं गन्दी राजनीति कर रही हैं। मैं इन पार्टियों से कहता हूं कि वह अपने गिरेबान में पहले झांकें, तब इस तरह की बात करें।”

ओम प्रकाश राजभर मायावती पर कुछ ज्यादा ही नाराज़ दिखाई दिए। उन्होंने कहा कि, “2017 में मुख्तार अंसारी मायावती को अपराधी क्यों नहीं नजर आए? इन्हीं मायावती ने मुख्तार अंसारी के राजनैतिक प्रभाव को भुनाने और अधिक सीटें जीतने के लिए तत्कालीन समय में मुख्तार अंसारी को गरीबों का मसीहा बताया था। अब यही गरीबों का मसीहा अपराधी और माफिया डॉन हो गया है? अवसरवादिता और निम्नस्तरीय राजनीति से भी नीचे राजनेता गिर गए हैं। इन राजनेताओं ने ही राजनीति को खराब कर दिया है।”

यूपी के पूर्वांचल में मुख्तार अंसारी की पहचान माफिया राजनेता के रूप में होती है। इनका पूर्वांचल के गाजीपुर, जौनपुर, मऊ, आज़मगढ़ और बनारस में दबदबा है। मुख्तार अंसारी के ऊपर 40 केस दर्ज हैं, जिनमें हत्या, रंगदारी, ज़मीन कब्जाना, अपहरण और मारपीट करना शामिल है। मुख्तार अंसारी ने अपने शुरुआती दौर में अपने काम की शुरुआत ठेके-टेंडर से की थी। इसके बाद 1995 में राजनीति में कदम रखा। 1996 में अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की। 1996 में मुख्तार अंसारी पहली बार मऊ से यूपी विधानसभा चुनाव जीतकर विधायक बने। इससे इनके रुतबे में बढ़ोत्तरी हुई।

ठेके-टेंडर और राजनीतिक वर्चस्व को लेकर इनका पूर्वांचल के एक अन्य बाहुबली ब्रजेश सिंह से टकराव होने लगा। ब्रजेश सिंह को यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री एवं आज देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का संरक्षण प्राप्त था। ब्रजेश सिंह को लेकर तत्कालीन समय में राजनाथ सिंह के ऊपर उसको संरक्षण देने की चर्चा भी होती थी और राजनाथ सिंह के ऊपर ब्रजेश सिंह को संरक्षण देने के आरोप भी लगते थे। ब्रजेश सिंह पुलिस की नज़र में फरार चल रहे थे और इनके ऊपर एक लाख रुपए का ईनाम भी घोषित था। तत्कालीन समय में राजनाथ सिंह के मुख्यमंत्री के समय यह भी चर्चा चली थी कि ब्रजेश सिंह आत्मसमर्पण कर देंगे। ब्रजेश सिंह और मुख्तार अंसारी की लड़ाई में मुख्तार अंसारी के साथ ब्राह्मण और मुस्लिम एवं अन्य जाति खड़ी हुई थीं, जबकि ब्रजेश सिंह के साथ ठाकुर और कुर्मी एवं कुछ पिछड़ी जातियों के लोग खड़े हुए थे। मुख्तार अंसारी और ब्रजेश सिंह की जंग में बहुत से लोग झुलसे और निपट गए।

2005 में भाजपा विधायक कृष्णानन्द राय की हत्या कर दी गई। इसमें मुख्तार अंसारी का नाम जुड़ा। इसी के बाद मुख्तार अंसारी की गिनती माफिया डॉन के रूप में होने लगी। मुख्तार अंसारी का राजनीतिक रसूख बढ़ता गया और वह लगातार मऊ से 5 बार से विधायक हैं एवं मौजूदा समय में भी विधायक हैं। 5 बार विधायक चुने जाने में मुख्तार अंसारी ने सपा बसपा में रहकर चुनाव लड़ा और इन पार्टियों को भी राजनीतिक मजबूती प्रदान किया। मुख्तार अंसारी, अफजाल अंसारी और सिबगतुल्लाह अंसारी तीनों भाई हैं। मुख्तार अंसारी मऊ से विधायक हैं और इनके बड़े भाई अफजाल अंसारी गाजीपुर से लोकसभा सदस्य हैं। इनके सबसे बड़े भाई सिबगतुल्लाह अंसारी भी 2 बार विधायक रहे हैं और इन्होंने अभी हाल ही में सपा को ज्वाईन किया है।

इनका प्रभाव गाजीपुर, बनारस, जौनपुर, मऊ और आज़मगढ़ जिले की लगभग 1 दर्जन विधानसभा क्षेत्र में है। इनके दम पर राजनीतिक पार्टियां खुद की ताकत को मज़बूती प्रदान करने के लिए इनको साथ रखती हैं। जब मतलब निकल जाता है तो इनसे किनारा करने लगती हैं। जैसा कि बसपा सुप्रीमो मायावती ने किया है। 2005 में मऊ में हुए दंगों के बाद मुख्तार अंसारी ने आत्मसमर्पण कर दिया था, तबसे यह जेल में बंद हैं और जेल से ही विधानसभा चुनाव लड़ते हैं। जेल से विधानसभा चुनाव लड़कर यह जीतते हैं, क्योंकि मऊ के मतदाताओं द्वारा इन्हें जिताया जाता है। मुख्तार अंसारी चूंकि मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, इसलिए इन्हें टारगेट किया जाता है, जबकि इनके विरोधी माफिया राजनेता ब्रजेश सिंह को कोई माफिया क्यों नहीं कहता है? इसका जवाब कोई नहीं देगा।

सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि राजनीतिक दलों द्वारा और उनके राजनेताओं द्वारा समय-समय पर अपनी राजनीति चमकाने के लिए और अपनी राजनीतिक ताकत को बढ़ाने के लिए अंसारी बन्धुओं का इस्तेमाल किया जाता रहा है और आज भी किया जा रहा है। राजनीतिक दलों द्वारा जब इनके कंधे पर बैठकर सत्ता की मलाई खाई जाती है यानी इनके राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल कर लाभ उठाया जाता है, तो मुख्तार अंसारी उस समय इन्हें अपराधी और माफिया डॉन नहीं नज़र आते हैं। लेकिन फायदा उठाकर राजनेता बड़ी जल्दी बदल जाते हैं और फिर यही राजनेता मुख्तार अंसारी को अपराधी और माफिया डॉन बताकर उनको गलत बताने का काम करते हैं। यही काम आज मायावती कर रही हैं और मुख्तार अंसारी को अपराधी बता कर उनसे किनारा कर रही हैं।

मायावती मुख्तार अंसारी को अपराधी बताकर उनसे दूरी बनाने की बात कर रही हैं। लेकिन मायावती क्या इस सवाल का जवाब देंगी कि संसद में बैठे आपराधिक पृष्ठभूमि वाले सांसद और यूपी विधानसभा में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले विधायक अपराधी नहीं हैं?मायावती इस सवाल का जवाब जानती हैं, लेकिन वे नहीं देंगी? मायावती को आज भी यह नहीं भूलना चाहिए कि मुख्तार अंसारी यानी अंसारी बन्धुओं का पूर्वी उत्तर प्रदेश की लगभग 1 दर्जन विधानसभा चुनाव क्षेत्र में (आज़मगढ़, लालगंज, मऊ, गाजीपुर और बनारस जिले की विधानसभा सीटों पर) प्रभाव है और इनके राजनीतिक प्रभाव के कारण इनका समर्थन पाने वाले लोग ही विधायक चुने जाते हैं। यहां पर सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर की कही गई बात सटीक बैठती है कि मुख्तार अंसारी को मुस्लिम होने के नाते ही टारगेट किया जा रहा है। क्योंकि मुख्तार अंसारी अपराधी और माफिया डॉन हैं, जबकि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले सांसद और विधायक दूध के धुले हुए पाक-साफ हैं।

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