Sunday, December 5, 2021
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JNU का ‘आतंकवाद’ पर विवादित पाठ्यक्रम भारतीय मुसलमानों के जीवन को मुश्किल बनाएगा

अगर कोई पाठ्यक्रम को विस्तार से पढ़ता है, तो उसे यह पता चलेगा कि यह किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा तैयार किया गया है जो इस विषय से अच्छी तरह वाकिफ नहीं है और पाठ्यक्रम सिर्फ इस्लाम और मुसलमानों को बदनाम करने का एक एजेंडा है. यह न सिर्फ एक गलत जानकारी देने वाला पाठ्यक्रम है बल्कि इसमें ढ़ेरों त्रुटियां भी है.

सैयद ख़लीक अहमद

नई दिल्ली | जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय शायद दुनिया का एकमात्र विश्वविद्यालय है जिसने अपने एकेडमिक कोर्स में आधिकारिक रूप से इस्लाम धर्म का नाम सीधे आतंकवाद से जोड़ा है.

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय द्वारा बनाए गए आतंकवाद विरोधी पाठ्यक्रम के माध्यम से इस्लाम को आतंकवाद से जोड़ने का काम किया गया है, इस पाठ्यक्रम को विश्वविद्यालय के अकादमिक और कार्यकारी परिषद द्वारा अनुमोदित किया गया है.

विश्वविद्यालय के अंदर और बाहर कुछ समूहों द्वारा इस पाठ्यक्रम को इस्लामोफोबिक कहे जाने के बाद भी जेएनयू के कुलपति ममीडाला जगदीश कुमार ने इस नए पाठ्यक्रम पर अपनी मुहर लगा दी. उन्होंने कहा कि कुछ समूह नए पाठ्यक्रम के बारे में “अनावश्यक विवाद” पैदा कर रहे. उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में है. इस पाठ्यक्रम को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का भी समर्थन मिला है. धर्मेद्र प्रदान ने कुछ दिन पहले नई शिक्षा नीति- 2020 के मुद्दे पर केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को संबोधित करते हुए इस पाठ्यक्रम की सराहना की थी.

नया पाठ्यक्रम “काउंटर-टेररिज्म, एसिमेट्रिक कॉन्फ्लिक्ट्स एंड स्ट्रैटेजीज़ फॉर कोऑपरेशन विद मेजर पॉवर्स” शीर्षक वाला यह विवादित कोर्स इंजीनियरिंग के उन छात्रों के लिए बनाया गया है, जो अपने तकनीकी पाठ्यक्रमों के पूरा होने के बाद अंतरराष्ट्रीय संबंधों का अध्ययन करना चाहते हैं.

छात्रों को पढ़ाए जाने वाले नए पाठ्यक्रम का उद्देश्य यह बताना है कि धर्म से प्रेरित आतंकवाद से कैसे निपटा जाए और प्रमुख विश्व शक्तियों के सहयोग से “जिहादी आतंकवाद” का मुकाबला करने के लिए क्या रणनीति अपनाई जा सकती है.

गलत जानकारी देने वाला पाठ्यक्रम

अगर कोई पाठ्यक्रम को विस्तार से पढ़ता है, तो उसे यह पता चलेगा कि यह किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा तैयार किया गया है जो इस विषय से अच्छी तरह वाकिफ नहीं है और पाठ्यक्रम सिर्फ इस्लाम और मुसलमानों को बदनाम करने का एक एजेंडा है. यह न सिर्फ एक गलत जानकारी देने वाला पाठ्यक्रम है बल्कि इसमें ढ़ेरों त्रुटियां भी है.

पाठ्यक्रम बनाने और स्वीकृति देने वालों का एजेंडा बिल्कुल साफ है, क्योंकि पाठ्यक्रम के लेखक ने धर्म-प्रेरित हिंसा और आतंकवाद का नाम केवल इस्लाम से ही जोड़ा है, जिससे यह आभास कराया गया है कि सिर्फ़ इस्लाम ही है जो अपने अनुयायियों को हिंसा और आतंकवाद के लिए प्रेरित करता है. हालाँकि, कोई लेखक की ईमानदारी पर संदेह न करे इसके लिए लेखक ने थोड़ा एहतियात बरता है. लेखक के अनुसार, “कुरान की गलत व्याख्या करके मुसलमानों को यह बताया जाता है कि जिहाद के नाम पर हत्या करना उचित है और आत्मघाती हमलों और हत्याओं का महिमामंडन किया जाता है.”

उप-शीर्षक “कट्टरपंथी-धार्मिक आतंकवाद और उसके प्रभाव” मे लेखक का कहना है कि, “कट्टरपंथी इस्लाम धार्मिक मौलवियों द्वारा शोषण के परिणामस्वरूप दुनिया भर में जिहादी आतंकवाद का इलेक्ट्रॉनिक प्रसार हुआ है.”

पाठ्यक्रम में आगे कहा गया है, “जिहादी आतंकवाद के ऑनलाइन इलेक्ट्रॉनिक प्रसार के परिणामस्वरूप धर्मनिरपेक्ष गैर-इस्लामिक समाजों में हिंसा के मामलों में तेज़ी आई है और अब वह पूरी तरह से बढ़ती हुई हिंसा की चपेट में हैं.”

पाठ्यक्रम भारत में इस्लामोफोबिया को बढ़ावा देगा

यह पाठ्यक्रम सांप्रदायिक सौहार्द की दृष्टि से बहुत ही खतरनाक है क्योंकि इसके माध्यम से भारत में सिर्फ इस्लामोफोबिया को और मज़बूत किया जाएगा. भारत जहां पहले ही हिंदू समुदाय के कट्टरपंथी तत्वों द्वारा किए जाने वाले हमलों और लींचिंग के शिकार होने के कारण मुसलमान खुद को बहुत शोषित स्थिति में पाते हैं. हिंदू समाज के चरमपंथी तत्वों के कारण अब देश में यह हालात हो गए हैं कि मुसलमान, हिन्दू अतिवादियों से अपने जीवन और संपत्ति के प्रति खतरा महसूस करते हैं और हिंदू मुसलमान की मिश्रित आबादी वाले इलाकों में मुसलमानो को डर महसूस होने लगा है.

इन परिस्थितियों के परिणामस्वरूप देश भर के हर छोटे बड़े कस्बों और शहरों में मुस्लिम बस्तियों में वृद्धि हुई है. देश में बढ़ रहे इन हालातों ने मुस्लिम जीवन के शिक्षा से लेकर राजनीति और अर्थव्यवस्था व हर पहलू को सीमित कर दिया है. अपने जीवन और संपत्ति को खतरे में महसूस करने की वजह से गांवों में भी “घेटो” बस्ती का चलन शुरू हो गया है. हिंदू-बहुल गांवों के मुसलमान धीरे-धीरे मुस्लिम-बहुल गांवों में स्थानांतरित हो रहे हैं, क्योंकि वहां वे अपने आस-पास मुसलमान होने के कारण सुरक्षित महसूस करते हैं. भारत में आज मुस्लिमों की स्थिति 18वीं शताब्दी में यूरोप में मौजूद उन यहूदियों के समान हो गई है जिन्हें पहले आधिकारिक तौर पर ईसाइयों और अन्य लोगों के साथ समान अधिकारों के साथ रहने की अनुमति नहीं थी. हालांकि भारत में मुसलमानों पर कोई आधिकारिक प्रतिबंध नहीं है, लेकिन ज़मीनी हालात ऐसे हैं कि मुसलमान अलग थलग रहने को मजबूर हैं.

पाठ्यक्रम के लेखक अरविंद कुमार हैं जो सेंटर फॉर कैनेडियन, यूनाइटेड स्टेट्स एंड लैटिन अमेरिकन स्टडीज, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में प्रोफेसर और चेयरपर्सन हैं. जब हमने उनसे फोन पर संपर्क किया, तो वह इंडिया टुमारो के साथ एक साक्षात्कार के लिए सहमत हो गए. हालांकि, आखिरी समय में उन्होंने यह कहते हुए हमारा अपॉइंटमेंट रद्द कर दिया कि ज़्यादातर मीडिया इस मुद्दे को पहले ही कवर कर चुका है.

लेखक ने केवल इस्लाम को ही निशाना क्यों बनाया और अन्य धर्मों को क्यों छोड़ दिया?

पूरे पाठ्यक्रम का अध्ययन करने से पता चलता है कि प्रोफेसर अरविंद कुमार को या तो दुनिया भर के विभिन्न समाजों में अलग-अलग के धर्म-प्रेरित आतंकवाद के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है या वह उनके बारे में जानते भी हैं मगर उन्होंने जानबूझकर अन्य धर्मों की गलत व्याख्या से प्रेरित आतंकवाद का अपने पाठ्यक्रम में उल्लेख नहीं किया है और उन्होंने ऐसा क्यों किया है इसकी वजह केवल वही बता सकते हैं.

लेकिन यहां सवाल ये उठता है कि आखिर उन्होंने इस्लाम को ही निशाना क्यों बनाया? अन्य मीडिया चैनलों के साथ साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि, सिर्फ़ “इस्लाम में धर्म-प्रेरित हिंसा” विषय को उन्होंने इसलिए चुना है, क्योंकि उनके अनुसार यह एक विश्व-स्वीकृत तथ्य है. इससे साफ पता चलता है कि उनका पाठ्यक्रम इस्लाम के उनके मौलिक अध्ययन और समझ पर आधारित नहीं है और मुस्लिम समाज के भीतर और बाहर मुस्लिम समूहों द्वारा की जाने वाली राजनीतिक हिंसा का भी कोई ज्ञान उन्हें नहीं है. ऐसा लगता है कि वह पश्चिमी लेखकों और मीडिया द्वारा दुनिया भर में फैलाए गए प्रोपेगेंडा साहित्य से प्रभावित हैं, ताकि इस प्रोपेगेंडा के तहत धीरे धीरे इस्लाम और मुस्लिम समुदायों को बदनाम किया जा सके.

नया पाठ्यक्रम इस्लामोफोबिया को संस्थागत रूप प्रदान करेगा

सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि इस्लाम को निशाना बनाने वाले नए पाठ्यक्रम के माध्यम से इस्लामोफोबिया को संस्थागत रूप देने और भारत में मुस्लिम समुदाय का अपराधीकरण करने की पूरी संभावना है. जेएनयू के छात्र और फ्रेटरनिटी मूवमेंट की कार्यकारी समिति के सदस्य वसीम आरएस का कहना है कि, “नया पाठ्यक्रम ‘जेएनयू प्रशासन के इस्लामोफोबिया को दर्शाता है’. जेएनयू शिक्षक संघ के सचिव मौसमी बसु ने मीडियाकर्मियों से कहा कि कई शिक्षकों ने विश्वविद्यालय की कार्यकारी समिति की बैठक के दौरान आतंकवाद विरोधी पाठ्यक्रम पर सवाल उठाए लेकिन अधिकारियों ने पाठ्यक्रम के गुण और दोषों के आधार पर जांच की अनुमति बिल्कुल भी नहीं दी.

जेएनयू के विद्यार्थी वसीम का कहना गलत भी नहीं है, हम देख चुके है कि किस प्रकार सरकार के स्वास्थ्य विभाग और मीडिया, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने मार्च 2020 में तब्लीगी जमात और मुसलमानों का नाम कोरोनावायरस महामारी के प्रसार के साथ जोड़ा, जो कि तथ्यों पर नहीं बल्कि झूठे प्रोपेगेंडा पर आधारित था. दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ ज़फरुल इस्लाम खान के हस्तक्षेप के बाद स्वास्थ्य विभाग ने धार्मिक आधार पर कोरोना पॉज़िटिव डेटा जारी करना बंद किया था. लेकिन मीडिया ने उसके बाद भी भारत में फैली कोरोना महामारी को मुसलमानों के साथ जोड़ना जारी रखा.

सुप्रीम कोर्ट ने कुछ दिनों पहले इस मुद्दे पर एक टिप्पणी में समाचारों के सांप्रदायिकरण के लिए मीडिया को कड़ी फटकार लगाई थी. कोरोना महामारी की खबरों का सांप्रदायिक आधार पर प्रसारण किए जाने के कारण मुसलमानों के खिलाफ नफरत और मज़बूत हुई है. इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि राष्ट्रीय राजधानी सहित पूरे देश के मुसलमान हिंदू समाज के कट्टरपंथी और चरमपंथी तत्वों के शारीरिक हमलों का निशाना बन गए. कई मुस्लिम व्यापारियों को घातक वायरस के प्रसार के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हुए उनका बहिष्कार किया गया. कट्टरपंथी भीड़ के हमलों में कई मुसलमानों की जानें भी चली गई. इन सारे हालातों को देखते हुए आसानी से कल्पना की जा सकती है कि जब बड़ी संख्या में इंजीनियरिंग छात्रों को एक लंबे समय तक कट्टरपंथी-धार्मिक आतंकवाद को असंतुलित नज़रिए के साथ पढ़ाया जाएगा तो आने वाले वक्त में क्या स्थिति होगी.

जेएनयू का पाठ्यक्रम अन्य धर्मों द्वारा धार्मिक-प्रेरित हिंसा की बात नहीं करता

केवल मुसलमानों में ही धार्मिक कट्टरवाद और कट्टरवाद प्रचलित नहीं है. यह हिंदुओं, ईसाइयों, बौद्धों या सिखों में भी बहुत आम है. पंजाब में खालिस्तान आंदोलन धर्म से प्रेरित था. और इसी तरह, भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में ईसाइयों द्वारा हिंसा का एक लंबा इतिहास है. भारत में मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ गाय और हिंदू अतिवादियों द्वारा मॉब लिंचिंग और हिंसा भी धर्म से प्रेरित है. हालांकि. हिंदू धार्मिक ग्रंथों की गलत व्याख्या पर आधारित है. आम तौर पर मुसलमानों को लगता है कि यह हिंदू धर्म की शिक्षाओं के उल्लंघन में उन पर फैलाया गया आतंकवाद है. लेकिन आतंकवाद पर जेएनयू के पाठ्यक्रम ने भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और आतंकवाद को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया है.

जेएनयू का पाठ्यक्रम गैर-इस्लामी धर्मों द्वारा धर्म-प्रेरित हिंसा की उपेक्षा करता है

धार्मिक कट्टरवाद और अतिवाद केवल मुसलमानों में ही  प्रचलित नहीं है. यह हिंदुओं, ईसाइयों, बौद्धों या सिखों में भी बहुत आम है. पंजाब में खालिस्तान आंदोलन धर्म से प्रेरित था. और इसी तरह भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में ईसाइयों द्वारा की गई हिंसा का एक लंबा इतिहास है. हिंदू गौरक्षको द्वारा भारत में मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ की जाने वाली हिंसा और मॉब लिंचिंग भी धर्म से प्रेरित है, हालांकि यह सब हिंदू धार्मिक ग्रंथों की गलत व्याख्या पर आधारित है. आम तौर पर सभी मुसलमानों को लगता है कि यह हिंदू धर्म की शिक्षाओं का उल्लंघन करके उनकी लिंचिंग की जाती है. लेकिन आतंकवाद के मुद्दे पर जेएनयू के पाठ्यक्रम ने भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ की जाने वाली हिंसा और आतंकवाद को पूरी तरह से नजरअंदाज़ कर दिया है.

म्यांमार और श्रीलंका में जहां मुसलमान बौद्ध भिक्षुओं और कट्टरपंथी समूहों के निशाने पर हैं, वहां भी प्रोफेसर अरविंद कुमार धर्म-प्रेरित आतंकवाद पर पूरी तरह से मौन हैं. म्यांमार में बौद्ध भिक्षुओं और म्यांमार सेना द्वारा किया जा रहा मुसलमानों का नरसंहार धर्म से प्रेरित है. और पड़ोसी देश श्रीलंका में भी मुसलमानों के खिलाफ बौद्ध-प्रेरित हिंसा और आतंकवाद सक्रिय है. क्या श्रीलंका में लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE) का आतंकवादी और अलगाववादी आंदोलन उनके धर्म से प्रेरित नहीं था? और लिट्टे के आतंकवादी किस धर्म के थे? बौद्ध आतंकवादियों से अपनी जान बचाने के लिए म्यांमार से दस लाख से अधिक मुसलमान भाग गए और उनमें से लगभग सात लाख ने अकेले बांग्लादेश में शरण ली है.

प्रोफेसर कुमार को शायद यह नहीं लगता कि म्यांमार में जो हुआ वह भी कट्टरपंथी-धर्म प्रेरित आतंकवाद है. शायद यह उनके अकादमिक ढांचे में फिट नहीं बैठता क्योंकि आतंकवाद की कोई पूर्ण परिभाषा है ही नहीं. एक के लिए आतंकवादी दूसरे के लिए हीरो हो सकता है. और इस बात का सबसे अच्छा उदाहरण खुद भारत है. भारत जहां ब्रिटिश-ईसाई शासकों ने सुभाष चंद्र बोस और चंद्र शेखर आज़ाद और कई अन्य लोगों को आतंकवादी कहा, वे हमारे लिए सबसे महान स्वतंत्रता सेनानी थे क्योंकि उन्होंने भारत को विदेशी कब्ज़े से मुक्त करने के लिए लड़ाई लड़ी थी. आम लोग जो उस समय लोकतंत्र के बारे में नहीं जानते थे के मन में आज़ादी की अहमियत स्थापित करने के लिए “राम राज्य” जैसे धार्मिक नारे का इस्तेमाल स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान किया गया था. भारत के स्वतंत्रता संग्राम को केवल इसलिए धार्मिक प्रेरित आंदोलन नहीं कहा जा सकता क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम के समर्थन में जनता को लामबंद करने के लिए कुछ धार्मिक शब्दावली का इस्तेमाल किया गया था.

अमेरिका और यूरोप में मुसलमानों के खिलाफ संगठित आतंकवाद का पाठ्यक्रम में कोई ज़िक्र नहीं

जेएनयू का आतंकवाद विरोधी पाठ्यक्रम कट्टर और चरमपंथी ईसाइयों द्वारा अमेरिका और यूरोप में मस्जिदों और मुस्लिम समुदायों पर किए जाने वाले आतंकवादी हमलों पर पूरी तरह से ख़ामोश है. हालांकि ईसाई धर्म इस तरह की हिंसा को जायज़ नहीं ठहराता है. यूगोस्लाविया के विभाजन के बाद सर्बियाई ईसाई बलों द्वारा किया गया बोस्नियाई मुसलमानों का नरसंहार भी जेएनयू के पाठ्यक्रम से गायब है.

JNU प्रशासन से एक ही अपेक्षा है कि वह वैश्विक आतंकवाद के सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए आतंकवाद विरोधी पाठ्यक्रम को फिर से डिज़ाइन करेगा. जिस वैश्विक आतंकवाद ने अफगानिस्तान, लीबिया, इराक और सीरिया सहित दुनिया के कई देशों को अस्थिर कर दिया है, जिससे लाखों लोगों की मौतें हुई है. वो मुस्लिम देश जिन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य ईसाई शक्तियों के वर्चस्व का विरोध किया उनकी मुस्लिम भूमि को नष्ट करने के लिए अल-कायदा और आईएसआईएस (आईएसआईएल) को बनाने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के बारे में भी एक ईमानदार चर्चा होनी चाहिए.

अल-कायदा और आईएसआईएस से सबसे ज़्यादा प्रभावित मुस्लिम समाज खुद हुआ है, न कि गैर-मुस्लिम समाज, जैसा कि पाठ्यक्रम के लेखक ने दावा किया है. अकादमिक ईमानदारी यह मांग करती है कि पाठ्यक्रम में संशोधन करके अन्य धर्मों के धार्मिक ग्रंथों की गलत व्याख्या द्वारा प्रेरित कट्टरपंथी-धार्मिक आतंकवाद को भी शामिल किया जाए.

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