Friday, September 24, 2021
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अफगानिस्तान: पश्चिमी मीडिया का प्रोपगंडा और अमेरिका द्वारा थोपे युद्ध में मौत और विनाश की कहानी

सैयद ख़लीक़ अहमद

नई दिल्ली | पिछले सप्ताह 15 अगस्त को काबुल, तालिबान के अधिकार क्षेत्र में चले जाने के बाद से ही मैं मीडिया पर, खासकर भारतीय मीडिया पर गहरी नजर रख रहा हुं. जहां तालिबान ने पूर्व अफगान सरकार के विरोध न होने पर आसानी से काबुल पर कब्जा कर लिया. वहीं अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी अपने देश के नागरिकों और समर्थकों को बेसहारा छोड़कर भाग गए. भारतीय मीडिया तालिबान के खिलाफ शुरू से ही बहुत आक्रामक रहा है.

अफगानिस्तान में 20 साल तक जो कुछ भी चला, उसमें भारत एक पक्ष के रूप में कभी मौजूद नहीं था. अमेरिका, नाटो और विदेशी आक्रमणकारियों ने तालिबान पर हमला करने के लिए अत्याधुनिक हथियारों के साथ अफगानिस्तान में आए. उनका आरोप था कि सितंबर 2001 में वाशिंगटन में ट्विन टावर्स पर हमले के पीछे तालिबान शासन द्वारा अफगानिस्तान में शरण लिए अल-कायदा का हाथ है. अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने तालिबान के खिलाफ युद्ध को धर्मयुद्ध कहा और मुस्लिम तालिबान के खिलाफ एक ईसाई युद्ध शुरु किया. बुश ने चेतावनी दी कि जो लोग इस तथाकथित धर्मयुद्ध में अमेरिका और उसकी गठबंधन सेना के साथ नहीं हैं, वे इस युद्ध को लड़ने वाले धर्म योद्धाओं के खिलाफ हैं. धर्मयुद्ध (क्रुसेड) 7 अक्टूबर 2001 को शुरू किया गया था.

एक तरह से देखा जाए तो यह एक धर्मयुद्ध ही था. अफगानिस्तान में बहुसंख्यक पश्तो भाषा बोलते हैं. विश्व की महाशक्ति के नेतृत्व में ईसाई ताकतों ने अफगानिस्तान के कस्बों और गांवों में पश्तो भाषा में बाइबिल की प्रतियों की ऐसे बारिश कर दी मानो अमेरिका और नाटो सेना पहाड़ी अफगानिस्तान में ईसाई धर्म का प्रचार करने के मिशन पर हो.

अल-कायदा समाप्त हो चुका था. इसके सरगना ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में पकड़ लिया गया. वह मारा गया, और उसके शरीर को समुद्र में डुबो दिया गया था ताकि तालिबान और उसके समर्थक अन्य लोगों द्वारा हीरो माने गए और महाशक्ति अमेरिका और उसके गठबंधन समूहों की ताकत को ज़बरदस्त चुनौती देने वाले व्यक्ति का कोई अवशेष बाकी न रहे. सैकड़ों तालिबान लड़ाकों और उनके नेताओं को पकड़ा गया, उन्हे ग्वांतानामो जेल में रखा गया. सभी मानवाधिकारों का उल्लंघन करते हुए उन्हें बुरी तरह से प्रताड़ित किया गया.

ईसाई अमेरिका और उसके गठबंधन सहयोगियों द्वारा किए गए मानवाधिकारों के उल्लंघन पर “सभ्य” दुनिया को चुप रखने के लिए ज़ुल्म की खबरें बाहर आने से रोकी गई. इंटरनेट और मीडिया द्वारा प्रकाशित कई तस्वीरों से दुनिया को पता चला कि कैसे पकड़े गए तालिबान लड़ाकों को जानवरों की तरह बांधा और खींचा जाता है, और उन पर ज़ुल्म किया जाता है. उन तस्वीरों को देखकर बहुत डर लगता था.

कई ऑस्ट्रेलियाई सैनिकों के बारे में उस वक्त बताया गया कि उन्होंने तीन दर्जन से अधिक अफगान नागरिकों की सिर्फ मस्ती के लिए नृशंस हत्या कर डाली. ह्यूमन राइट्स वॉच दुनिया के सामने इस बात को प्रकाश में लेकर आया कि कैसे ब्रिटेन के विशेष बलों ने आधी रात को घरों में घुसकर नाबालिगों सहित निहत्थे नागरिकों को मार डाला.

अफगानिस्तान में ह्यूमन राइट्स वॉच की सीनियर रिसर्चर पेट्रीसिया गॉसमैन के अनुसार, “यह एक बीमार मानसिकता और संस्कृति थी जो अनिवार्य रूप से इन संकटग्रस्त क्षेत्रों में रहने वाले अफगानों के साथ ऐसा व्यवहार था जैसे कि वे सभी खतरनाक अपराधी हो, यहां तक कि बच्चो को नहीं बक्शा गया बल्कि उन सभी को इंसान ही नही माना गया.” जहां ऑस्ट्रेलिया ने अपने क्रूर सैनिकों को दंडित किया, वहीं ब्रिटेन सरकार ने राजनीतिक दबाव में मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है.

विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा की गई हिंसा में अनुमानित दो लाख अफगान मारे गए

फॉर्च्यून डॉट कॉम के अनुसार विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा अफगानिस्तान पर थोपे गए युद्ध के कारण अनुमानित 75,000 अफगान सैन्य और पुलिस अधिकारी मारे गए, और इसके अलावा अनुमानित 71,334 नागरिक मारे गए. अल-जज़ीरा के अनुसार, हमलावर देशों के 3,500 से अधिक अंतर्राष्ट्रीय सैनिक भी मारे गए. मारे गए विदेशी सैनिकों में 2,448 अमेरिकी सैनिक शामिल हैं. अमेरिका के ब्राउन विश्वविद्यालय के कॉस्ट ऑफ वार प्रोजेक्ट के अनुसार युद्ध में मारे गए तालिबान और अन्य अमेरिकी विरोधी लड़ाकों की संख्या 51,191 है.

ईसाई अमेरिकी और उसके सहयोगी समूहों द्वारा किए गए नरसंहार पर पर्दा डाल दिया गया

ऑस्ट्रेलिया से संबंध रखने वाली एक शिक्षाविद सहर घुमखोर और कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले में मानव विज्ञान विभाग में चांसलर फेलो अनिला दौलतज़ई, बताती हैं कि कैसे तालिबान पर चौबीसों घंटे फोकस करने वाले अपना ध्यान पश्चिमी मीडिया ब्लिट्जक्रेग के लिए अमेरिका और उसके युद्ध सहयोगी दलों द्वारा किए गए मूर्खतापूर्ण नरसंहार और विनाश कोई मायने ही नहीं रखते हैं. अल-जज़ीरा में एक संयुक्त लेख में दोनों लेखिका कहती हैं कि कैसे “अफगान समुदायों को आतंकित किया गया और एक षड्यंत्र के तहत उन्हें सामूहिक रूप से संदिग्ध बनाया गया, जिसके कारण प्रत्येक अफगान पुरुष एक संभावित आतंकवादी समझा जाने लगा, और यह बताया गया कि प्रत्येक अफगान महिला को तालिबान के प्रतिबंधों से बचाने की ज़रूरत है.” पश्चिमी सरकारों और मीडिया द्वारा एक प्रोपेगेंडा फैलाया गया था कि “तालिबान की वजह से हुई मौतें ज़्यादा घातक थी उन मौतों के मुकाबले जो अफगानी नागरिकों की अमेरिकी ड्रोन हमले, हवाई हमले, सीआईए द्वारा प्रशिक्षित और वित्त पोषित अफगान सेना और साम्राज्यवादी ताकतों को गले लगाने वाले अपराधिक प्रवृति के कमांडरों द्वारा अंजाम दी गई.

तालिबानी हिंसा को व्हाइट समुदाय (अमेरिका व नाटो आदि) द्वारा की गई हिंसा से अधिक खतरनाक चित्रित किया गया

घूमखोर और दौलतज़ई के अनुसार, तालिबान हिंसा को “अनियंत्रित व्हाइट हिंसा, व्हाइट कब्ज़े, व्हाइट एस, व्हाइट ड्रोन से अधिक खतरनाक” के रूप में चित्रित किया गया है. हमेशा यह बताया जाता है कि पश्चिम द्वारा की जाने वाली हिंसा के विपरीत तालिबानियों की हिंसा जानबूझकर की गई बर्बरता, और निंदनीय है. पश्चिम द्वारा की गई हिंसा आधुनिक और बर्बरता के फर्क को स्पष्ट करती है. इसलिए अतिक्रमण करने वाली पश्चिमी ताकतों द्वारा स्वयं की हिंसा को हमेशा उचित ठहराया जाता है और उसे अतार्किक या नाजायज़ नहीं बताया जाता. पश्चिमी मीडिया तालिबान की हिंसा पर प्रकाश डालते समय तालिबानी पश्तून को ग्रामीण रूढ़िवादी और पिछड़े रूप में दिखाता है, उनके इस स्वरूप को अफगानिस्तान की प्रगति को रोकने वाला बताता है. लेकिन ये वैश्विक मीडिया अमेरिका और उसके युद्ध सहयोगी दलों के कारण हुई तबाही पर टिप्पणी नहीं करते हैं और ना ही ये बताते हैं कि कैसे दो दशकों के विदेशी कब्जे ने अफगानिस्तान के विकास को रोक दिया है और इसे मध्ययुगीन काल तक पीछे धकेल दिया है.

जमात-ए-इस्लामी हिंद (JIH) के अध्यक्ष सैयद सआदतुल्ला हुसैनी ने एक बयान में यह भी उल्लेख किया कि कैसे साम्राज्यवादी ताकतों ने 20 वर्षों तक निर्दोष अफगानों पर सिलसिलेवार बम विस्फोटों के द्वारा ज़ुल्म किया और खुद की मर्ज़ी एक मुल्क पर थोपने के लिए उसके शहरों पर छापे मारे. उन्होंने शक्तिशाली और सैन्य रूप से मज़बूत देशों द्वारा कमजोर राष्ट्रों के मामलों में हेरफेर और हस्तक्षेप को रोकने का संयुक्त राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से आह्वान किया.

वैश्विक मीडिया तालिबान पर मनगढ़ंत कहानियां पेश करता है

अधिकांश विदेशी मीडिया और सरकारें अफगानिस्तान या तालिबान को लेकर जो रिर्पोट दुनिया के समक्ष पेश करती हैं, वे सब गढ़ी हुई कहानियां हैं जिनका एकमात्र उद्देश्य धोखा देना है. वे यह कभी नहीं बताएंगे कि 1996 में रूसियों के जाने के बाद बनी गुलबुद्दीन हिकमतयार की सरकार को गिराने के लिए तालिबान को किसने तैयार, प्रशिक्षित और हथियारों से लैस किया था. पश्चिमी ईसाई शक्तियों की साज़िश के द्वारा हिक्मतयार को बाहर निकालने का एकमात्र कारण यह था कि उन्होंने अफगानिस्तान में इस्लाम के कानूनों को लागू करने की घोषणा की थी. तालिबान ने भी इस्लामिक कानूनों पर आधारित एक इस्लामिक अमीरात स्थापित करने की घोषणा की है. इसी वजह से पश्चिमी शक्तियों ने तालिबान द्वारा बनाई जाने वाली सरकार के अस्तित्व को नकारना तय किया है. यह इस्लाम के लिए पश्चिमी शक्तियों की खास नफरत को भी प्रदर्शित करता है.

भारतीय मीडिया लगातार तालिबान के खिलाफ प्रोपगेंडा प्रसारित कर रहा है

अब बात करते हैं अपने ही देश भारत में तालिबान पर मीडिया और बुद्धिजीवियों की भूमिका पर. भारतीय मीडिया, चाहे वो हिंदी हो या अंग्रेजी, ने पश्चिमी मीडिया से एक खास व्याख्या लेकर तालिबान के खिलाफ एक प्रोपेगेंडा का प्रचार किया है कि कैसे यह समूह इस क्षेत्र को नष्ट कर देगा, सभ्यता को मिटा देगा और अपनी महिलाओं को दास के रूप में परिवर्तित कर देगा. भारतीय मीडिया द्वारा फेक वीडियो और तस्वीरों के माध्यम से भी तालिबान को बर्बर दिखाने की कोशिश की गई, इन विडियोज़ और तस्वीरों को न्यूज़ वेबसाइट ऑल्ट न्यूज़ द्वारा फैक्ट चेक कर गलत बताया गया है. भारत तालिबान के खिलाफ युद्ध में भागीदार नहीं था. फैक्ट तो यह है कि भारत अफगानिस्तान में सड़कों, बांधों, बिजली उत्पादन संयंत्रों के निर्माण के लिए दान और विकास कार्यों में लगा हुआ था. और तालिबान के प्रवक्ता ने भी एएनआई समाचार एजेंसी के साथ एक साक्षात्कार में इसकी सराहना की है. इसका मतलब है कि तालिबान भारत के साथ दोस्ती चाहता है, और इसलिए, उन्हें अपने वादों को साबित करने की अनुमति दी जानी चाहिए जो उन्होंने दो दिन पहले काबुल में पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए थे. उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि वे किसी भी देश के खिलाफ अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल नहीं होने देंगे. उन्होंने यह भी कहा है कि महिलाएं प्राथमिक से विश्वविद्यालय स्तर तक शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्वतंत्र हैं. उन्होंने तालिबान के खिलाफ लड़ने वाले पिछले शासन के सैनिकों सहित सभी को माफी देने की भी घोषणा की है. वे 1990 के तालिबान नहीं हैं. यह बहुत बदल गए हैं. यही कारण है कि जब उन्होंने 15 अगस्त को काबुल पर कब्जा किया था तब सड़कों और गलियों में किसी प्रकार की कोई मार काट नही देखी गई. वे युद्धग्रस्त देश में कानून-व्यवस्था बहाल करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं.

तालिबान को उनके वर्तमान नीतियों के आधार पर आंकें, पश्चिम द्वारा फैलाए झूठ और डर के आधार पर नहीं

लेखक और जाने-माने पत्रकार डॉ. ज़फरुल इस्लाम खान का कहना है कि, “तालिबान को सिर्फ उनके कर्मों के आधार पर आंका जाना चाहिए, न कि हमारे या पश्चिम के डर के आधार पर. इस बात की कोई संभावना नहीं है कि वे कश्मीर आएंगे, कुछ लोगों द्वारा ऐसा धोखे से प्रचारित किया जा रहा है.”

लेकिन तालिबान को लेकर भारतीय मीडिया की स्थिति “दूसरे का झगड़ा अपने सर पर लेना” या “बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना” जैसी है जिसका अर्थ है एक बाहरी व्यक्ति का किसी के मामले में बिना वजह की दिलचस्पी दिखाना. भारतीय मीडिया उसी बात को अतिशयोक्ति के साथ दोहरा रहा है कि पश्चिमी मीडिया तालिबान के खिलाफ दिन-रात बमबारी कर रहा है.

तालिबान: जिनकी मातृभूमि अफगानिस्तान है

तालिबान की अकस्मात जीत से भारतीय मीडिया भी हैरान है. तालिबान के लिए मेरे पास कोई विस्तृत जानकारी नहीं है. डॉ. जफरुल इस्लाम खान के अनुसार अफगानिस्तान तालिबानियों की मातृभूमि है. वे इसलिए जीत गए क्योंकि उन्हें स्थानीय लोगों का समर्थन प्राप्त है. तालिबान ने “विदेशी आक्रमणकारियों” के खिलाफ लड़ाई लड़ी और बाहरी ताकतों और उनके स्थानीय गुंडों को हराया, जो देश छोड़कर भाग गए और लोगों को बेसहारा छोड़ गए.

डॉ. खान कहते हैं “तालिबान की जीत भारी जन समर्थन के बिना संभव नहीं थी, जबकि कठपुतली सरकार विदेशी ताकतों के समर्थन से सत्ता में थी और जल्द ही अफगानिस्तान में अवैध कब्ज़ा करने वाली ताकतों ने महसूस कर लिया कि कब्जा व्यर्थ है और वे विदेशी गुलामी कुबूल न करने वाले अफगानिस्तान के लोगों के खिलाफ युद्ध नहीं जीत सकते हैं. ब्रिटिश और रूसी इस कड़वी सच्चाई का अनुभव बहुत पहले ही कर चुके हैं,”

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