Sunday, December 5, 2021
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मुस्लिम महिलाओं को उनका हक इस्लाम ने दिया है, न की किसी सरकार या मठाधीश ने

सैयद ख़लीक अहमद

नई दिल्ली | मोदी सरकार ने 1 अगस्त, 2019 को मुस्लिम महिला (विवाह अधिकारों का संरक्षण) विधेयक के पारित होने के दो साल पूरे होने पर 1 अगस्त को ‘मुस्लिम महिला अधिकार दिवस’ के रूप में मनाया. संक्षेप में इस बिल को ट्रिपल तलाक बिल कहा जाता है, यह इंस्टेंट ट्रिपल तलाक को अपराध की श्रेणी में डालता है. एक साथ तीन तलाक देने वाले वाले व्यक्ति की गिरफ्तारी का प्रावधान इस बिल में है. सरकार ने किसी और धर्म में तलाक को अपराध घोषित नहीं किया है, चाहे वह हिंदू धर्म हो, ईसाई धर्म हो या कोई और धर्म. अन्य धर्मों में दिया जाने वाला तलाक अभी भी सिविल मामलों के तहत ही आता है. केवल मुस्लिमों में दिए जाने वाले तीन तलाक का अपराधीकरण करके उसे फौजदारी मामलों की श्रेणी में डाल दिया गया है.

कई महिला संगठनों ने सरकार द्वारा ‘मुस्लिम महिला अधिकार दिवस’ की इस घोषणा का विरोध किया है. उनके अनुसार मोदी सरकार ने पूरे मुस्लिम समुदाय को दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया है. उन्होंने कहा कि मोदी सरकार द्वारा एक “षड्यंत्रकारी” उद्देश्य के लिए कानून पारित किया गया था, अर्थात “मुस्लिम पुरुषों को नए भारत में उनकी “हैसियत” दिखाने के लिए.” उन्होंने कहा कि ऐसा कानून जिसका मुख्य उद्देश्य मुस्लिम समुदाय को बदनाम करना है उसका जश्न बिल्कुल भी नहीं मनाना चाहिए.

जमात-ए-इस्लामी हिंद की महिला विंग की राष्ट्रीय सचिव श्रीमती रहमतुन्निसा ने कहा कि, “1 अगस्त को मुस्लिम महिला अधिकार दिवस के रूप में मनाना इस्लामिक शरीयत में दिए गए मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का मज़ाक है.” श्रीमती रहमतुन्निसा बिलकुल सही कहती हैं क्योंकि इस्लाम ने संपत्ति का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, व्यापार करने का अधिकार, और स्वतंत्र या व्यक्तिगत रूप से और सार्वजनिक सभाओं में अपनी राय व्यक्त करने की स्वतंत्रता महिलाओं को 1400 साल पहले दे दी थी जब दुनिया आदिम युग में जी रही थी. भारत और यूरोप सहित सभी सभ्यताओं में महिलाओं को उनके माता-पिता, पति और बेटों की एक संपत्ति से अधिक नहीं माना जाता था. इसलिए जब एक महिला को वस्तु मान लिया जाता है तो फिर उसके पास कोई अधिकार होने की उम्मीद नहीं की जा सकती है. ठीक यही स्थिति पूर्व-इस्लामिक युग में महिलाओं की थी. 19वीं सदी के मध्य तक अमेरिका और यूरोप के तथाकथित श्रेष्ठ सभ्यताओं और समाजों में ऐसी ही स्थिति रही.

लेकिन जब इस्लाम अस्तित्व में आया तो इसने महिलाओं को समस्त लैंगिक भेदभावों से ऊपर उठकर मानवाधिकार प्रदान किए. महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार दिया और पैतृक संपत्तियों में महिलाओं का हिस्सा सुनिश्चित किया (जो भारत में हिंदू महिलाओं को सितंबर 2005 में दिया गया था). इस्लाम ने महिलाओं की मर्ज़ी के बिना उनकी शादी पर रोक लगा दी.

अगर किसी औरत को लगता है कि वह किसी कारण से पति के साथ नहीं रह सकती है तो इस्लाम उन्हें अपने पति से अलग होने या तलाक लेने का अधिकार देता है. इस्लाम यह मानता है कि महिला हो या पुरुष उसे अपने पूरे जीवन के लिए एक ऐसे जीवनसाथी के साथ रहने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए जिसे वह पसंद नहीं करते हैं, इस प्रकार यह विचारधारा विवाहित महिलाओं को अपने पति के साथ अपने रिश्ते को खत्म करने के लिए आत्महत्या का सहारा लेने से रोकती है जैसा कि भारत में कई गैर-मुस्लिम समाजों में होता है.

इस्लाम ने विधवा पुनर्विवाह की भी अनुमति दी है. वहीं हिंदू विधवा के पुनर्विवाह के लिए राजा राम मोहन राय को लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी. इस्लाम ने मुस्लिम पुरुषों को उनकी पत्नियों से दहेज लेने पर प्रतिबंध लगा दिया (हालांकि यह कुछ मुस्लिम समाजों में प्रचलित है, जो स्थानीय गैर-इस्लामी संस्कृति से प्रभावित होने के कारण है). इसके उलट इस्लाम महिलाओं को पति से “मेहर” के रूप में एक रकम लेने का अधिकार देता है. पत्नी द्वारा मांगी जाने वाली इस मेहर की राशि की कोई सीमा तय नहीं है. कोई भी ‘निकाह’ या इस्लामी विवाह तब तक मान्य नहीं होता है जब तक कि पति अपनी पत्नी को मेहर देने के लिए सहमत न हो जाए. इस्लाम में महिला पर किसी भी प्रकार का आर्थिक दायित्व नहीं डाला गया है.

भारतीय समाज के विपरीत अपनी पत्नी और बच्चों की देखभाल करना सिर्फ़ पति की ज़िम्मेदारी है, वर्तमान भारतीय समाज में जहां पत्नी को परिवार के लिए कमाने के लिए मजबूर किया जाता है और एक कमाने वाली पत्नी को प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि पति परिवार का आर्थिक बोझ पत्नी पर भी डालता है. इस्लाम किसी महिला को पैसा कमाने से नहीं रोकता है और उसे एक दायित्व भी नहीं बनाता है. महिला अपनी कमाई और संपत्ति और अपने माता-पिता से विरासत में मिली संपत्ति की मालिक होती है. इस्लामी कानून के तहत पति अपनी पत्नी को उसकी संपत्ति पति के साथ साझा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता है.

हिंदू व अन्य धर्मों में अपने धार्मिक और सामाजिक कानूनों में धीरे धीरे सुधार के माध्यम से महिलाओं के तलाक, संपत्ति आदि अधिकारों को इस्लामी कानूनों को कॉपी किया गया है. फिर भी इन समाजों के नेता इस्लामी कानून को श्रेय देना पसंद नहीं करते हैं. इसके बजाय, वे इस्लाम पर महिलाओं को अधिकार नहीं देने का आरोप लगाने की हिमाकत करते हैं.

ज़रा एक ऐसे समाज के बारे में सोचिए जिसमें तलाक का प्रावधान न हो, यह एक ऐसी व्यवस्था है जो इस्लाम के आगमन के साथ अस्तित्व में आई. बिना तलाक वाले समाज में उन महिलाओं का क्या होगा जो अपने पति और पुरुषों के साथ नहीं रहना चाहती हैं, या उन पुरुषों का क्या होगा जो अपनी पत्नियों के साथ नहीं रहना चाहते हैं?

मुस्लिम महिलाओं को सारे हक इस्लाम ने दिए है, आपने नहीं मोदी जी

किसी नेता के निजी जीवन पर टिप्पणी करना सही नहीं होगा, लेकिन 2002 में जब पीएम मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब वहां मुस्लिम विरोधी दंगों के दौरान दर्जनों मुस्लिम महिलाओं के साथ क्या किया गया था, इस बारे में पीएम का ध्यान आकर्षित करना निश्चित रूप से उचित होगा. क्या वह भूल गए हैं कि दंगाइयों ने नरोदा पाटिया में कौसर बानो के गर्भ को कैसे चीर दिया था और कैसे एक नवजात के भ्रूण को निकाल कर त्रिशूल की नोंक पर उछाल दिया गया था. कैसे एक मुठभेड़ में मारे गए सोहराबुद्दीन की पत्नी कौसर बी का कथित तौर पर पुलिस ने सामूहिक बलात्कार कर हत्या कर दी थी. और सबूत मिटाने के लिए उनकी लाश को एक दूर स्थित गांव में जला दिया गया था.

वहीं कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी की पत्नी ज़किया ज़ाफरी अपने पति की नृशंस हत्या के मामले में आज भी न्याय पाने की लड़ाई लड़ रही हैं.

पूरे भारत में लाखों मुस्लिम महिलाओं ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ 2019-2020 में छह महीने तक विरोध प्रदर्शन किया, जिस कानून का उद्देश्य ही भारतीय मुसलमानों के नागरिकता अधिकार को छीनना है. लेकिन मोदी सरकार ने कानून वापस लेने के लिए कुछ नहीं किया.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का छात्र नजीब अहमद 25 नवंबर, 2016 से लापता है. आरोप एक छात्र संगठन के सदस्यों पर लगाए गए थे. न तो दिल्ली पुलिस और न ही मोदीजी के अधीन सीबीआई मामले को सुलझा पाई है जबकि नजीब की मां उसे अब भी ढूंढ रही है.

मुस्लिम महिलाओं को भी भारत में अन्य महिलाओं की तरह ही समस्या का सामना करना पड़ता है. अगर तीन तलाक अन्य महिलाओं की समस्या नहीं है, तो यह मुस्लिम महिलाओं की भी समस्या नहीं है. यह उन राजनीतिक दलों की समस्या हो सकती है जो राजनीतिक उद्देश्यों के लिए तीन तलाक के मुद्दे का इस्तेमाल कर रहे हैं.

मुस्लिम महिलाओं की समस्या शिक्षा और रोज़गार है. कांग्रेस हो या भाजपा, मुस्लिम महिलाओं के लिए बेहतर शिक्षा और नौकरी सुनिश्चित करने के लिए सरकार को यही सलाह दी जाएगी. मुस्लिम महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए पीएम मोदी नौकरियों में आरक्षण क्यों नहीं दे सकते?

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