Friday, September 24, 2021
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दैनिक भास्कर के दफ्तर पर आयकर विभाग का छापा, समर्थन और विरोध को लेकर छिड़ा विमर्श

मसीहुज़्ज़मा अंसारी

नई दिल्ली | जिस क़लम ने सत्ता की शह पर देश के विभिन्न वर्गों की भावनाओं को ठेस पहुंचाया हो उस क़लम की कुछ अच्छी और सच्ची रिपोर्ट्स के कारण उसपर सरकारी शिकंजा उसकी सच्चाई की तरफ बढ़ते क़दम की तस्दीक़ करता है. अतीत क्या था और भविष्य क्या होगा कोई नहीं जानता लेकिन वर्तमान में कोई पीड़ित है तो किसी भी कॉन्सपिरेसी थ्योरी में जाए बिना उसका साथ देना हर नागरिक का कर्तव्य है.

कोई व्यक्ति या संस्था जो किसी समय सत्ता और शोषक वर्ग के साथ खड़ा रहा हो मगर आज वो पीड़ित है तो ऐसे में ज़ुल्म का विरोध करने वालों की यह ज़िम्मेदारी है कि वे उस पीड़ित के साथ खड़े रहें जो सत्ता के हमले का शिकार हो क्योंकि यही सही प्रतीत होता है.

भारत के हिन्दी बेल्ट में पढ़े जाने वाले प्रमुख अख़बारों में से एक दैनिक भास्कर के देशभर के कई कार्यालयों पर आयकर विभाग ने छापेमारी की है. पत्रकारों और विश्लेषकों द्वारा इस छापेमारी को बदले की भावना से प्रेरित बताया गया. दैनिक भास्कर ने इसे निर्भीक पत्रकारिता पर सरकार का हमला क़रार दिया.

दैनिक भास्कर के अलावा भारत समाचार चैनल के लखनऊ दफ़्तर में भी आयकर विभाग की रेड पड़ी. देश के सियासतदानों, बुद्धजीवियों और वरिष्ठ पत्रकारों ने इस पूरी घटना को अलग-अलग प्रकार से देखा और प्रतिक्रिया दी.

कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने कहा, “काग़ज़ पर स्याही से सच लिखना, एक कमज़ोर सरकार को डराने के लिए काफ़ी है.”

योगेंद्र यादव ने ट्विट कर कहा कि, “बेशर्मी की सीमा जहाँ खत्म होती है वहां से थोडा आगे भाजपा ने अपना नया दफ्तर खोल दिया है.”

इन सबके बीच सोशल मीडिया पर दैनिक भास्कर की पुरानी रिपोर्ट्स को लेकर दलित और मुस्लिम बुद्धजीवी और सोशल मीडिया यूज़र्स भास्कर की आलोचना करते हुए नज़र आए. इन आलोचनाओं के पीछे उनका अपना तर्क था, दैनिक की रिपोर्ट्स थीं, दलित-मुस्लिम विरोधी झलक को दर्शाती होर्डिंग्स थीं और उसका अतीत था.

सोशल मीडिया पर मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग का कहना था कि कोरोना की पहली लहर में जिस प्रकार दैनिक भास्कर द्वारा तब्लीग़ी जमात को और उनके बहाने पूरे मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया गया वह किसी से छिपा नहीं है. साम्प्रदायिक रिपोर्टिंग के ज़रिए नफरत को बढ़ाने में इस मीडिया समूह ने कोई कसर नहीं छोड़ी.

इसी प्रकार बहुजन बुद्धजीवियों, पत्रकारों और सोशल मीडिया यूज़र्स ने दैनिक भास्कर द्वारा पूर्व में लगाई गई होर्डिंग्स को साझा करते हुए दैनिक भास्कर को सांप्रदायिक कहा और इस छापेमारी को लेकर कोई सहानुभूति नहीं दर्शाई.

इंडिया टुडे पत्रिका के पूर्व संपादक और वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने दैनिक भास्कर की आलोचना करते हुए उसके द्वारा लगाई गई पुरानी होर्डिंग्स की तस्वीर को साझा करते हुए लिखा, “पाँच साल पहले दैनिक भास्कर ने यूपी चुनाव में बीजेपी के लिए यूँ माहौल बनाया था। मुमकिन है अभी सरकारी विज्ञापन या ज़मीन लेने वग़ैरह का झगड़ा हो. फिर सब नॉर्मल हो जाएगा. भास्कर की विचारधारा नहीं बदली है. लोग नहीं बदले हैं.”

यह सत्य है कि दैनिक भास्कर ने पूर्व में सांप्रदायिक रिपोर्टिंग किया है:

दैनिक भास्कर ने पूर्व में सत्ता के अधीन होकर निजी लाभ या वर्ग विशेष से बैर के आधार पर साम्प्रदायिक रिपोर्टिंग किया. तब्लीग़ी जमाअत को लेकर कोरोना की पहली लहर में दैनिक भास्कर की स्क्रिप्ट गैरज़िम्मेदाराना रही है. कई बार तो सरकार को ख़ुश करने में ज़ी न्यूज़ को मात देता हुआ नज़र आया है. इसकी रिपोर्टिंग के कारण तब्लीग़ी जमाअत के ख़िलाफ़ देश भर में माहौल बना और कई स्थानों पर मुसलमानों के साथ अभद्रता भी की गई.

क्या सरकारी दमन के समय मीडिया संस्थान की आलोचना सही है?

आम तौर पर देखा गया है कि किसी व्यक्ति अथवा संस्था का विरोध करने का एक समय निर्धारित कर लिया गया है. और वह समय या तो विरोधी व्यक्ति कि मौत का होता है या विरोधी संस्था पर सरकारी दमन का. कोई मीडिया संस्थान पूर्व में सरकारी स्क्रिप्ट पर काम करता रहा हो जिससे हमारा या किसी भी नागरिक के विरोध हो सकता है जो कि स्वाभाविक भी है लेकिन क्या उस मीडिया संस्थान द्वारा सरकार से सवाल पूछे जाने पर, सच्ची और अच्छी रिपोर्टिंग पर सरकारी हमला होने लगे तो ऐन उसी वक़्त उस मीडिया संस्थान का विरोध करना कितना उचित है? क्या हम ऐसा करने के पीड़ित के साथ खड़े रहने के अपने संवैधानिक, धार्मिक और नैतिक उसूलों की मुखालिफत नहीं कर रहे होते हैं?

क्या हम प्रतिरोध की आवाज़ को अकेला नहीं छोड़ रहे?

जब हम ज़रूरत के समय किसी व्यक्ति अथवा संस्था का साथ इसलिए छोड़ रहे हैं क्योंकि वो कभी बुरा था तो ऐसा करके प्रतिरोध की आवाज़ को कमज़ोर करने में हम योगदान नहीं दे रहे? ऐसा कर के हम दमनकारी सरकार का सहयोग कर रहे हैं. क्या सरकार और सत्ता से सवाल पूछने वाली क़लम का इसलिए विरोध किया जाए क्योंकि उसी क़लम ने कभी आप की भावनाओं को ठेस पहुंचाई थी? कोई कभी बुरा था इसलिए विपत्ति के समय उसका साथ छोड़ देना स्वयं के बुरा होने की पटकथा लिखने जैसा नहीं है?

सरकार और बुद्धजीवियों से अपील “मत क़त्ल करो आवाज़ों को”

फ़राज़ ने कहा था, “मत क़त्ल करो आवाज़ों को”. ये आवाज़ें सत्ता के विरोध में उठने वाली आवाज़ है. मगर वर्तमान परिदृश्य में आवाज़ों को क़त्ल न करने की गुज़ारिश सत्ता से भी है और उस वर्ग से भी जो इसलिए कुछ आवाज़ों को विरोध कर रहे हैं कि इन अवाज़ों ने कभी सत्ता के इशारे पर चलकर उन्हें ज़ख़्म दिया था. आज जब ये आवाज़ें गरीबों और दुखियारों के लिए उठ रही हैं, जब सच्चाई और ईमानदारी के लिए उठ रही हैं तो ऐसे में उनका विरोध सही नहीं है.

सरकारी स्क्रिप्ट पर काम करने वाले मीडिया संस्थानों के लिए सबक:

दैनिक भास्कर के विरोध में जो भी तर्क दिए जा रहे हैं वो कोरोना काल की दूसरी लहर के पहले के हैं. दूसरी लहर में दैनिक भास्कर का काम सराहनीय है बल्कि इससे भी आगे बढ़कर देश के सामने सच्चाई लाने में एक बड़ा योगदान है.

दैनिक भास्कर और इस जैसे अन्य अख़बारों को यह सोचना चाहिए कि जब वो निजी स्वार्थ या फायदे के लिए या किसी समुदाय से नफरत के कारण सरकार के इशारे पर चलते हैं, सरकारी एजेंडे को चलाते हैं तो सरकारी ऐड के साथ उन्हें वाह वाही मिलती है मगर जब वह सरकारी एजेंडे से हटते हैं तो फिर उसी सरकार के दमन का सामना करना पड़ता है जिसके लिए वो काम करते आए थे या जिनके एजेंडे को मीडिया में सेट करते रहे. इसलिए मीडिया संस्थानों को ईमानदारी का ही रास्ता चुनना चाहिए ताकि कम से कम जनता का और पीड़ितों का साथ हमेशा बना रहे और विषम परिस्थितियों में आप के साथ जनता खड़ी रहे.

सरकारें मीडिया संस्थानों का तब तक साथ देती हैं जब तक आप उनकी स्क्रिप्ट पर चल रहे हों वरना ईडी और आईटी के छापे आप के लिए हमेशा मुंतज़िर हैं. मगर जनता निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारों के साथ हमेशा और हर परिस्थिति में खड़ी रहती है.

सत्ता का उद्देश्य ही विरोधी स्वरों को बांटना होता है

फासीवादी सरकारों का हमेशा से ये उद्देश्य रहता है कि विरोधी स्वरों को गुटों में बांटकर सत्ता को बचाए रखें. जब भी हम वर्तमान में किसी के अच्छे कार्यों की अनदेखी उसके द्वारा अतीत में किये गए ग़लत कार्यों को आधार मानकर करते हैं तो हम उस समय अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता का सहयोग कर रहे होते हैं. जब कोई पीड़ित हो और सत्ता व सरकार के ज़ुल्म का शिकार हो तो उसके साथ खड़े रहना न्याय की लड़ाई को मज़बूत करना और विरोध की अवाज़ों को संगठित करना होता है.

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