Thursday, August 5, 2021
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परिसीमन प्रक्रिया द्वारा मुस्लिम बहुल जम्मू-कश्मीर में हिंदू मुख्यमंत्री बनाने की कवायद

इश्फाकुल हसन

श्रीनगर | राज्य की राजनीतिक परिस्थिति को देखकर जम्मू और कश्मीर के मुसलमानों के ज़हन में अपना राजनीतिक वर्चस्व खो देने का डर धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है. जम्मू से किसी हिंदू को जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित करने के लिए केंद्र द्वारा परिसीमन प्रक्रिया तेज़ी से अमल में लाई जा रही है.

5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 को निरस्त कर इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बदलने से पहले जम्मू और कश्मीर भारत का एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य था.

2011 की जनगणना के अनुसार जम्मू और कश्मीर की जनसंख्या संयुक्त रूप से 1,25,41,302 है. लगभग 68.31 प्रतिशत लोग मुसलमान हैं, जबकि 28.44 प्रतिशत हिंदू हैं. ईसाई 0.28 प्रतिशत, जैन 0.02 प्रतिशत, बौद्ध 0.90 प्रतिशत और सिख 1.87 प्रतिशत हैं. इस हिसाब से कश्मीर की आबादी 6.89 मिलियन है, जबकि जम्मू की 5.38 मिलियन है.

लोगों को इस बात की आशंका है कि जम्मू कश्मीर में परिसीमन प्रक्रिया के पीछे जम्मू-कश्मीर की जनसांख्यिकी को बदलकर जम्मू से हिंदू मुख्यमंत्री प्रदेश में थोपने की योजना है. जम्मू-कश्मीर और उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों में जहां चुनाव आने वाले हैं, वहां यह परिसीमन भाजपा के लिए अनुकूल साबित होगा, क्योंकि इन जगहों पर बीजेपी हिंदुत्व के आधार पर चुनाव लड़ती हैं.

अंतिम परिसीमन प्रक्रिया 1995 में किया गया था जब जम्मू-कश्मीर उग्रवाद की चपेट में था. उसके बाद जब जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन था उस वक्त पूर्व न्यायाधीश केके गुप्ता की अध्यक्षता में परिसीमन आयोग ने इस प्रक्रिया को संपन्न किया था.

1996 में फारूक अब्दुल्ला सरकार के सत्ता में आने के बाद अब्दुल्ला सरकार ने जम्मू एंड कश्मीर रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट 1957 और जम्मू-कश्मीर के संविधान की धारा 47(3) में संशोधन कर 2026 तक परिसीमन प्रक्रिया पर रोक लगा दी. इससे पहले 1963 और 1973 में विधानसभा सीटों को दोबारा व्यवस्थित किया गया था.

पूर्ववर्ती विधानसभा में कश्मीर क्षेत्र में 46 सीटें थीं जबकि जम्मू में 37 सीटें थीं, और लद्दाख में चार सीटें थीं. जम्मू में 37 सीटों में से सात अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं. हालाँकि कश्मीर जहां मुसलमानों का वर्चस्व है वहां एससी के लिए कोई सीट आरक्षित नहीं है.

भाजपा चाहती है कि जम्मू में सीटें बढ़ाई जाएं ताकि वे दोनों क्षेत्रों के बीच के सीटों के अंतर को कम कर सकें. पिछली बार बीजेपी ने जम्मू से 25 विधानसभा सीटें जीती थीं और यह सभी हिंदू बाहुल्य वाले इलाकों में जीती. भाजपा को परेशान करने वाली बात यह है कि जम्मू क्षेत्र के 10 में से केवल पांच जिलों में हिंदू बहुसंख्यक हैं. जम्मू में हिंदुओं की आबादी करीब 29 फीसदी है, जबकि कश्मीर में 99 फीसदी आबादी मुस्लिम है.

चूंकि कश्मीर में अनुसूचित जाति की आबादी नहीं है, इसलिए ऐसी खबरें आ रही हैं कि अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित की जा सकती हैं. गुर्जर, बकरवाल और पहाड़ी सहित आदिवासी एसटी में आते हैं. कश्मीर और जम्मू दोनों क्षेत्रों के दूर-दराज के इलाकों और पहाड़ी इलाकों में रहने वाले लोगों में एसटी आबादी का एक अच्छा हिस्सा है. हालाँकि, अधिकांश आदिवासी मुसलमान हैं. इसलिए यदि एसटी सीटें आरक्षित हैं, तो वे भी मुस्लिम सीटें ही होंगी.

विधानसभा में एससी का आनुपातिक प्रतिनिधित्व 6.64 सीटों के लिए है क्योंकि वे जम्मू-कश्मीर की आबादी का 7.38 प्रतिशत हैं. दूसरी ओर, एल एसटी का आनुपातिक हिस्सा जो जम्मू-कश्मीर की आबादी का 11.91 प्रतिशत है वो सदन में 10.71 सीटों के लिए लागू होता है.

जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम-2019 के अनुसार, केंद्र शासित प्रदेश की विधानसभा में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या केंद्र शासित प्रदेश में उनकी जनसंख्या के अनुपात में होनी चाहिए.

हिंदुत्ववादी दल चाहते हैं कि एससी और एसटी की सीटें बढ़ाई जाएं. यह चीज़ जम्मू के पक्ष में जायेगी. यदि जम्मू-कश्मीर क्षेत्रों के बीच सीटों के अंतर को कम किया जाता है, तो भाजपा अपनी योजना को अमल में लाने का प्रयास कर सकती है. बीजेपी हिंदू और आरक्षित सीटों पर कब्जा कर के बेहतर सौदेबाज़ी करने की स्थिति में होगी.

बिखरी हुई राजनीति के बीच कश्मीर में मुख्यधारा के खिलाफ लोगों का मोहभंग होने के कारण भाजपा अपनी योजना को लागू करने के लिए छोटे दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों को लुभाने की कोशिश करेगी.

मुस्लिम बहुल जम्मू-कश्मीर में हिंदू मुख्यमंत्री स्थापित करके भाजपा को ‘हिंदू हृदय सम्राट’ कार्ड खेलकर देश भर के हिंदू मतदाताओं को लुभाने में मदद मिलेगी.

इसके अलावा मान लीजिए कि परिसीमन आयोग सिखों और कश्मीरी पंडितों को कुछ राजनीतिक आरक्षण देने के लिए सहमत हो जाता है, जो कि कम संभावना है, तब भी इससे भाजपा के लिए ही सोने पे सुहागा वाली चीज़ होगी. कश्मीरी पंडित पांच आरक्षित सीटों की मांग कर रहे हैं, जबकि सिख दो सीटों की मांग कर रहे हैं.

जम्मू-कश्मीर में लोगों में यह डर है कि जम्मू क्षेत्र की कुछ मुस्लिम-बहुल सीटों को एससी समुदाय के लिए आरक्षित किया जा सकता है, जबकि अन्य मुस्लिम-बहुल सीटों को विभाजित किया जा सकता है या पड़ोसी हिंदू-बहुल सीटों के साथ विलय किया जा सकता है, इस प्रकार मुसलमानों को चुनावों में राजनीतिक रूप से अप्रभावी बना दिया जायेगा.

2019 के अधिनियम में उपराज्यपाल द्वारा विधान सभा में दो महिला सदस्यों के नामांकन का भी प्रस्ताव है. मौजूदा राजनीतिक हालात में इस बात की पूरी संभावना है कि मनोनीत महिला सदस्य भाजपा से ही होंगे.

मूवमेंट फॉर जस्टिस फॉर रिफ्यूजीज़ ऑफ 1947 के संयोजक जगजीत सिंह सूडान द्वारा लिखे गए एक पत्र जिसमें पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर के लिए आरक्षित 24 सीटों को डीफ्रीज करने की मांग की गई है, उस पत्र ने पूरी परिसीमन प्रक्रिया में नया मोड़ ला दिया है. जगजीत सूडान मांग कर रहे है कि चूंकि भारतीय संसद ने 22 फरवरी,1994 को एक प्रस्ताव पारित किया था जिसमें कहा गया था कि पाकिस्तान के अवैध कब्ज़े वाला पीओके भारत का हिस्सा है, इसलिए जम्मू-कश्मीर में रहने वाले पीओके के शरणार्थी उन 24 सीटों पर चुनाव लड़ें. 2017 के आंकड़ों के अनुसार पीओके की आबादी 40.5 लाख है, यह पीओके में 24 विधानसभा सीटें बनाती है. हालांकि इन सीटों पर कभी भी मतदान की अनुमति नहीं दी गई.

जगजीत सूडान ने आयोग को पत्र लिखकर इन आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए सीटों को डिफ्रीज़ करने मांग की है. हालांकि, आयोग ने उनकी दलील को खारिज कर दिया है और कहा है कि विधानसभा में 24 सीटें खाली रहनी चाहिए और गणना के लिए विचार नहीं किया जाना चाहिए.

सरकार के अंडरसेक्रेटरी ब्रजेश कुमार ने कहा कि “जम्मू और कश्मीर रीऑर्गेनाइज़ेशन एक्ट 2019 की धारा 14 (4) में प्रावधान है कि उप-धारा (3) में कुछ भी शामिल होने के बावजूद, जब तक पाकिस्तान के कब्ज़े वाले केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर के क्षेत्र पर कब्ज़ा नहीं हो जाता और क्षेत्र में रहने वाले लोग प्रतिनिधियों का चुनाव नहीं करते तब तक वहां की सीट खाली ही रहेगी”

बीजेपी इन सीटों को डिफ्रीज़ करने और शरणार्थियों को नामांकन दाखिल करने की अनुमति देने के लिए कड़ी मेहनत कर रही है. ऐसा करने से उन्हें बहुमत मिलेगा. लेकिन अगर ऐसा होता है, तो पीओके पर केंद्र की स्थिति कमज़ोर हो सकती है क्योंकि केंद्र का दावा है कि पाकिस्तान के कब्ज़े वाले हिस्से सहित पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है.

फरवरी 1994 में संसद द्वारा सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें दावा किया गया कि पीओके सहित संपूर्ण जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है. यदि 1947 से खाली पड़ी पीओके के लिए 24 आरक्षित सीटें भरी जाती हैं, तो केंद्र की अपनी नीति कमज़ोर हो जाएगी क्योंकि तब पाकिस्तान के पास यह बहाना होगा कि भारत ने खुद ही पीओके पर अपने दावों को खारिज कर दिया है.

इस बीच, परिसीमन आयोग ने शुक्रवार को जम्मू-कश्मीर की अपनी चार दिवसीय यात्रा समाप्त कर दी. पिछले साल अपनी नियुक्ति के बाद से यह आयोग का पहला दौरा था.

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) को छोड़कर, सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने यहां आयोग से मुलाकात की. इसके अलावा, पीपुल्स एलायंस फॉर गुप्कर डिक्लेरेशन (पीएजीडी) के सदस्यों, नेशनल कॉन्फ्रेंस और सीपीआईएम ने मंगलवार को श्रीनगर में आयोग से मुलाकात की.

24 जून को, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि परिसीमन जल्दी होना चाहिए ताकि विकास प्रक्रिया को बढ़ावा देने के लिए जम्मू और कश्मीर में चुनाव हो सकें.

रीऑर्गेनाइज़ेशन एक्ट 2019 के तहत, केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में विधानसभा होगी जबकि लद्दाख में नहीं. अधिनियम के तहत, जम्मू-कश्मीर विधानसभा में सीटों की संख्या परिसीमन के बाद 107 से बढ़ाकर 114 कर दी जाएगी, जिसमें पीओके की 24 सीटें शामिल हैं.

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