Thursday, August 5, 2021
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सहकारिता मंत्रालय का गठन और अमित शाह द्वारा इसका प्रभार संभालने के पीछे की राजनीति

सैयद ख़लीक अहमद

नई दिल्ली | केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को नव गठित सहकारिता मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिए जाने से कई लोग आश्चर्य में हैं. सहकारिता मंत्रालय पहले कृषि मंत्रालय का ही हिस्सा था.

हालांकि, यह उन लोगों के लिए आश्चर्य की बात नहीं है जो यह समझते हैं कि सहकारी आंदोलन राज्य के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति में कैसे अहम भूमिका निभाता है, और किस प्रकार भाजपा ने गुजरात में राज्य की राजनीति पर अपनी पकड़ मज़बूत करने के लिए राज्य से लेकर ग्राम स्तर तक सहकारी समितियों का इस्तेमाल किया और ऐसा करके 1995 से लगातार कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखने में सफल रही है.

भाजपा ने सत्ता पर कब्ज़ा करने के बाद राज्य में अपनी सरकार बना ली थी लेकिन पार्टी को यह महसूस हुआ कि अब भी उसकी राज्य की सत्ता संरचना पर पूरी पकड़ नहीं है, क्योंकि हज़ारों करोड़ रुपये के वार्षिक कारोबार वाली सहकारी समितियां अभी भी कांग्रेस नेताओं के हाथों में थीं. ग्रामीण और अर्ध-ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारी समितियों के माध्यम से मतदाताओं पर पूरा प्रभाव बनाए रखा जा सकता है.

जब एक सहकारी बैंक को छोड़कर अन्य सभी सहकारी बैंक और संस्थान कांग्रेस के नियंत्रण में थे उस वक्त गुजरात के सहकारिता आंदोलन पर कांग्रेस की पकड़ को ख़त्म करने का प्रभार अमित शाह को दिया गया था. अमित शाह की रणनीति ने भाजपा को राज्य के सभी सहकारी संस्थानों पर नियंत्रण करने में मदद की और इस प्रकार कांग्रेस को राज्य की हर संस्था की सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.

करीब 39,000 करोड़ के वार्षिक टर्नओवर वाली गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (जीसीएमएमएफ), अमूल और अन्य दूध डेयरी से लेकर सहकारी बैंकों और कृषि बाज़ार समितियों सभी से कांग्रेस का सफाया कर दिया गया. इससे भाजपा को ग्रामीण और अर्ध-ग्रामीण क्षेत्रों में भी अपनी राजनीतिक ताकत और प्रभाव स्थापित करने में मदद मिली.

अमित शाह खुद अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष के रूप में चुने गए थे, यह वही सहकारी बैंक है जिसने 14 नवंबर, 2016 की रात को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नोटबंदी की घोषणा के पांच दिनों के भीतर 745.59 करोड़ रुपये के प्रतिबंधित नोट जमा के रूप में हासिल करके सुर्खियां बटोरी थी.

गुजरात के 18,000 गांवों में से प्रत्येक में एक ‘मंडली’ होती है, इन मंडलियों को सहकारी समिति के रूप में भी जाना जाता है. यह सहकारी समितियां सीधे दूध उत्पादकों से दूध की खरीद और कृषि सामग्री की आपूर्ति के साथ-साथ प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पीएसीएस) के माध्यम से किसानों को माइक्रो फाइनेंस आदि की सुविधाएं प्रदान करने में मदद करती हैं. कई पदाधिकारियों वाली इन सहकारी समितियों का स्थानीय ग्रामीणों पर अत्यधिक प्रभाव होता है.

पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट कांग्रेस नेता कैलाश गढ़वी कहते हैं “ग्राम स्तर पर यह नेटवर्क राजनीतिक दलों को अपना प्रचार करने, राजनीतिक दल की नीतियों के बारे में छोटे से छोटे स्तर पर मतदाताओं को समझाने और लोगों को मतदान केंद्रों पर लाने में मदद करता है.” उनका कहना है कि “राजनीति और सहकारिता एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं.”

शोधकर्ता बीएस बाविस्कर द्वारा लिखा गया “सहकारिता और राजनीति” नामक एक शोध लेख जिसे 23 मार्च, 1968 को इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली के संस्करण में प्रकाशित किया गया था, यह लेख भी गढ़वी की राय का समर्थन करता है. बाविस्कर का कहना है कि “… सहकारिता कुछ गुप्त राजनीतिक कार्य करती है जो एक लोकतांत्रिक समाज के राजनीतिक विकास के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं.” बाविस्कर का निष्कर्ष ग्रामीण महाराष्ट्र में सहकारिता आंदोलन के उनके अध्ययन पर आधारित है. बाविस्कर ने अपनी थीसिस के समर्थन में लेबर एंड कोऑपरेटिव पार्टी के एक ब्रिटिश राजनेता फ्रेड लॉन्गडेन को भी उद्धृत किया है. लोंगडेन का कहना है कि “सहकारिता को राजनीति में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए.”

बाविस्कर का अध्ययन गलत नहीं है. उदाहरण स्वरूप महाराष्ट्र के कद्दावर नेता शरद पवार और उनके परिवार को राजनीतिक शक्ति पश्चिमी महाराष्ट्र में सहकारी संस्थानों, विशेष रूप से सहकारी चीनी मिलों पर नियंत्रण से हासिल होती है. बीजेपी नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एक बार मीडियाकर्मियों से कहा था कि हालांकि भाजपा महाराष्ट्र में सत्ता में है लेकिन स्थानीय अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने वाली सहकारी संस्थाएं एनसीपी और कांग्रेस के हाथों में हैं.

वसंतदादा पाटिल, डी आर गाडगिल, वी ई विखे पाटिल तात्यासाहेब कोरे, रत्नप्पा कुम्भर, अन्नासाहेब शिंदे, यशवंतराव मोहिते, शंकरराव मोहिते पाटिल, शंकरराव काले और शंकरराव कोल्हे सहित महाराष्ट्र के कई अन्य नेता महाराष्ट्र में सहकारी आंदोलन से जुड़े होने के कारण पहले राज्य की और फिर केंद्रीय राजनीति में आ पाए.

कांग्रेस से सहकारी संस्थाओं का नियंत्रण हथिया कर एक बहुत मज़बूत राजनीतिक आधार स्थापित कर लेने का अनुभव मोदी रखते हैं. इसी अनुभव के आधार पर मोदी ने सहकारिता विभाग को कृषि मंत्रालय से अलग कर दिया फिर इसे एक मंत्रालय में बदल दिया, और अमित शाह को इसका प्रभार संभालने के लिए दे दिया. ऐसा प्रतीत होता है कि देश के बाकी हिस्सों में बीजेपी ग्रामीण स्तर पर मज़बूत मतदाता आधार तैयार करने के लिए गुजरात राज्य के अनुभव की नकल कर रहे हैं, ताकि एक लम्बे समय तक दूसरी पार्टियों को बाहर धकेल कर भाजपा सत्ता में बने रहने के अपने सपने को साकार कर सकें.

राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड की 2019-20 की रिपोर्ट के अनुसार देश में 1,94,195 सहकारी डेयरी समितियां और 330 सहकारी चीनी मिलें हैं. नाबार्ड की 2019-20 की रिपोर्ट कहती है कि देश में 95,238 PACS और 33 राज्य सहकारी बैंक हैं. भारत में राज्य सहकारी बैंकों ने 1,35,393 करोड़ रुपये की जमा राशि और 6,104 करोड़ रुपए चुकता पूंजी, जबकि जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों (DCCB) की चुकता पूंजी 21,447 करोड़ रुपए और जमा 3,78,248 करोड़ रुपए के बारें में रिपोर्ट किया था.

नाबार्ड की 2019-20 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, डीसीसीबी ने किसानों को अल्पकालिक फसली ऋण के रूप में 3,00,034 करोड़ रुपए वितरित किए और राज्य सहकारी बैंकों ने चीनी मिलों और कताई मिलों आदि जैसे कृषि-प्रसंस्करण उद्योगों को 1,48,625 करोड़ रुपये प्रदान किए.

इसके अलावा अर्बन कोऑपरेटिव बैंक (यूसीबी) और क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटीज ऐसे कई क्षेत्रों को लोन और बैंकिंग सेवाएं प्रदान करती हैं जिन्हें आम बैंकों से लोन नहीं मिल सकता है. भारतीय रिज़र्व बैंक की 2019-20 की रिपोर्ट के अनुसार, कुल 1,539 अर्बन कोऑपरेटिव बैंक हैं जिनकी कुल पूंजी 14,933.54 करोड़ रुपये और अग्रिम लोन राशि 3,05,368.27 करोड़ है.

देश में केवल गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक में सहकारी आंदोलन में मज़बूत होने पर सहकारी क्षेत्र में रोटेशन में इतना पैसा है. अन्य राज्यों में सहकारी आंदोलन बहुत कमज़ोर है, मुख्य रूप से उत्तर भारतीय राज्यों जैसे यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, साथ ही पूर्वी और दक्षिण भारत सहित अन्य राज्यों में सहकारी आंदोलन कमज़ोर है.

इसलिए, भाजपा देश की राजनीति पर पूर्ण नियंत्रण रखने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों और भारत के कृषि क्षेत्र पर पूर्ण नियंत्रण चाहती है. अमेरिकी कंपनी मोनसेंटो को भारत में आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) बीजों की बिक्री की अनुमति के खिलाफ भारत के प्रमुख वैज्ञानिक पुष्प मित्र भार्गव ने गुजरात विद्यापीठ में व्याख्यान देते हुए कहा था कि “जो देश की कृषि को नियंत्रित करते हैं, वे देश की राजनीति को भी नियंत्रित करेंगे”.

जीएम तकनीक के तहत किसान खुद के बीज नहीं उगा सकते और उन्हें बीज निर्माण कंपनियों से ही बीज खरीदना होगा. इसलिए देश में कृषि एक विदेशी बीज उगाने वाली कंपनी पर निर्भर हो जायेगी. श्री भार्गव का 2017 में निधन हो गया था, फिर भी उनका व्याख्यान मुझे याद दिलाता है कि मोदी अब सहकारी समितियों के माध्यम से कृषि और अर्ध-ग्रामीण समुदायों को प्रभावित करके भारत की राजनीति पर पूर्ण नियंत्रण रखने की कोशिश कर रहे हैं, और यह गलत भी नहीं हैं. यदि सहकारी आंदोलन सफल होता है, तो यह देश में गुजरात और महाराष्ट्र की भांति ज़बरदस्त आर्थिक परिवर्तन ला सकता है.

पीएम मोदी ने अपने मंत्रिमंडल के विस्तार के समय कहा था कि सहकारिता आंदोलन को ज़मीनी स्तर पर ले जाने और इसे पूरे देश में जन आंदोलन बनाने के लिए सहकारिता मंत्रालय की स्थापना की गई है. गुजरात में भाजपा के सफल प्रयोग और राज्य के सभी सहकारी संस्थानों पर उनके नियंत्रण को देखते हुए कोई भी यह समझ सकता है कि यह सहकारी क्षेत्र देश की राजनीति को किस प्रकार बदल सकता है. चूंकि सहकारी संस्थानों को फंड केंद्र से मिलता है, इसलिए राज्यों में सहकारिता विभाग को आर्थिक रूप से नुकसान नहीं होगा क्योंकि केंद्र में भाजपा सत्ता में है और अमित शाह के पास सहकारिता विभाग है.

हालांकि अन्य राज्यों में अपने इस गुजरात प्रयोग को दोहराना अमित शाह के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होगा क्योंकि अन्य राज्यों, विशेष रूप से हिंदी पट्टी में व्यापार संस्कृति गुजरात और महाराष्ट्र से अलग है, और यही कारण है कि अन्य सभी राज्यों में सहकारिता आंदोलन सफल नहीं हुआ है. अमित शाह, जिन्हें बीजेपी आधुनिक भारतीय राजनीति का ‘चाणक्य’ कहती है, क्या वो इसमें सफल होंगे? यह केवल समय ही बताएगा.

(यह लेख दक्षिण भारत और खाड़ी देशों से प्रकाशित मलयालम भाषा के बहु-संस्करण दैनिक माध्यमम में प्रकाशित हो चुका है. यह मध्यमम अखबार की अंग्रेजी वेबसाइट पर भी प्रकाशित हुआ था.)

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