Thursday, August 5, 2021
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अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए दो दशकों तक संघर्ष करने वाली महिला मरवा कवाकचे

1999 में जब हिजाब पहनने की वजह से मरवा का बहिष्कार किया गया होगा तब लोगों ने नहीं सोचा होगा कि किसी दिन उसी बहिष्कृत हिजाबी मां की हिजाबी बेटी तुर्की के राष्ट्रपति के साथ उनके इंटरप्रेटर के रूप में काम करेगी.

हुमा मसीह | इंडिया टुमारो

नई दिल्ली | लोकतान्त्रिक देशों में जब दक्षिणपंथी विचारधारा की सरकारें सत्ता में आती हैं तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ विरोधी विचारधारा के लोगों की पहचान, स्वतंत्रता और समानता को छीनने का प्रयास किया जाता है. ऐसे में लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए एक मात्र रास्ता धैर्य और शांतिपूर्ण संघर्ष का बचता है जिसका अद्वितीय उदाहरण तुर्की की महिला मरवा कवाकचे हैं.

तुर्की की एक महिला ने अपने संघर्ष, धैर्य और साहस से दुनिया को यह संदेश दिया है कि अपने लोकतांत्रिक अधिकारों को हासिल करने और बदलाव लाने में कभी कभी एक पूरी पीढ़ी लग जाती है लेकिन उस परिवर्तन के शिखर तक पहुंचने में अपने उसूलों और अपनी विचारधारा का दामन नहीं छोड़ना चाहिए.

हम बात कर हैं तुर्की की महिला फातिमा अबुशहनाब और उनकी मां मरवा कवाकचे के बारे में.

तुर्की के राष्ट्रपति की इंटरप्रेटर और इंटरनेशनल रिलेशन स्पेशलिस्ट के रूप में काम करने वाली फातिमा अबुशहनाब की मां मरवा कवाकचे को अपने लोकतांत्रिक मूल्यों और पोशाक की आज़ादी के अधिकार के लिए दो दशकों का लम्बा संघर्ष करना पड़ा.

मरवा कवाकचे की बेटी फातिमा अबुशहनाब जो तुर्की के राष्ट्रपति की इंटरप्रेटर और इंटरनेशनल रिलेशंस स्पेशलिस्ट हैं.

अपनी काबिलियत की बुनियाद पर तुर्की की प्रेजीडेंसी के एक अहम पद तक पहुंचने वाली फातिमा की मां मरवा कवाकचे को कभी लोकतांत्रिक तरीके से पार्लियामेंट का मेंबर चुन लिए जाने के बाद भी हिजाब पहनने की वजह से निर्वासन का सामना करना पड़ा था. वह 30 वर्ष की आयु में पार्लियामेंट की मेंबर चुनी गई थीं.

सेकुलरिज्म के नाम पर इस्लामी मूल्यों को फॉलो न करने देना एक प्रकार का इस्लामोफोबिया ही है और मरवा इस इस्लामोफोबिया का शिकार उस वक्त हुईं जब हिजाब पहनने की वजह से उन्हें पहले पार्लियामेंट और फिर देश से निष्कासित कर दिया गया.

मरवा कवाकचे 1999 के उस दौर में तुर्की की पार्लियामेंट की मेंबर चुनी गई थी जब तुर्की में मुस्तफा कमाल अतातुर्क के कट्टरपंथी विचार, सेकुलरिज्म के नाम पर स्थापित थे. तुर्की में असिहुष्णता के उस दौर में एक मुस्लिम औरत का अपनी हिजाबी पहचान के साथ आगे बढ़ना संभव नहीं था.

नजमुद्दीन अरबकान की इस्लामिक वर्चू पार्टी से पार्लियामेंट की मेंबर चुनी जाने के बाद मरवा कवाकचे जब अपना सर ढ़क कर हिजाब पहने हुए अपनी पहचान के साथ शपथ लेने के लिए आगे बढ़ी तो सेकुलरिज्म के नाम पर कट्टरपंथ का अनुसरण करने वाली पार्टी के सदस्य मरवा का हिजाब देखकर भड़क उठे.

बहुमत वाली पार्टियों द्वारा सेक्युलर मूल्यों का उल्लंघन करने के नाम पर मरवा को पार्लियामेंट से निष्कासित कर दिया गया. इतना ही नहीं बल्कि उनकी तुर्की की नागरिकता भी उनसे छीन ली गई जिसकी वजह से उन्हें तुर्की छोड़कर अमेरिका जाकर बसना पड़ा.

जून 2001 में  वर्चू पार्टी को भी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा और मरवा सहित इसके पांच सद्स्यों पर प्रतिबंध लगाए गए. 2007 में मरवा ने यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स में पार्लियामेंट में किए गए उनके बहिष्कार के खिलाफ केस जीता.

अपने अधिकार के लिए लगभग दो दशकों के संघर्ष के बाद 2017 में मरवा कवाकचे को उनकी तुर्की की नागरिकता वापस मिली. आज वो मलेशिया में तुर्की की राजदूत के तौर पर काम करती हैं.

मरवा हमेशा से ही तुर्की की कट्टरपंथी सेक्युलर पॉलिसी की आलोचक रही थी. उन्होंने हमेशा पूरी दुनिया में मुस्लिम औरतों के अधिकारों और हिजाब के समर्थन में आवाज़ उठाई. यूरोप और अमेरिका की बड़ी यूनिवर्सिटीज में लेक्चर देने के अलावा मरवा ने 2014 में बार्सिलोना में पार्लियामेंट ऑफ वर्ल्ड रिलीजन को भी संबोधित किया था.

मरवा कुरान की हाफ़िज़ भी हैं. उन्हें पूरा कुरआन कंठस्थ है. उन्होंने पोस्ट ग्रेजुएशन और पीएचडी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से किया. उनकी दो बेटियां हैं फातिमा अबुशहनाब और मरियम कवाकचे.

मरवा कवाकचे को दुनिया की 500 सबसे प्रभावशाली मुस्लिम महिलाओं में शामिल किया गया था. इसके अलावा कई बड़े सम्मान मरवा को हासिल हुए. यह सम्मान न सिर्फ एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में था बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षक, अपनी पहचान की लड़ाई लड़ने और एक मां के तौर पर भी था.

मरवा तुर्की के नामी अखबारों में स्तंभकार के तौर पर भी लिखती रही हैं और एक लेखक के रूप में कई किताबें भी उन्होंने लिखी हैं.

2012 में उनपर एक किताब भी लिखी गई जिसके लेखक रिचर्ड पेरेस थे.

1999 में जब मरवा कवाकचे के हिजाब पर उंगली उठाई गई तब वो अपने उसूलों से डगमगाई नहीं बल्कि उन्होंने दो दशकों तक लंबा संघर्ष किया, उन्होंने न सिर्फ़ अपनी बेटी को काबिल बनाया बल्कि अपने निर्वासन के दौरान पूरी दुनिया में यात्राएं करके लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए लड़ाई लड़ी और जागरूकता फैलाई.

उन्होंने दुनिया को बताया कि अपनी मर्ज़ी से हिजाब पहनना एक औरत का मूलभूत अधिकार है जिसे कोई भी सेक्युलरिज़्म के नाम पर छीन नहीं सकता.

नेल्सन मंडेला और महात्मा गांधी की भांति मरवा ने भी धैर्य और साहस के साथ लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए लंबी लड़ाई लड़ी. उन्होंने ऐसा अहिंसक आंदोलन किया जो हमें सिखलाता है कि अगर हमारे विचार सही हैं तो हमें उन विचारों की रक्षा के लिए आखरी दम तक लड़ना चाहिए.

1999 में जब हिजाब पहनने की वजह से मरवा का बहिष्कार किया गया होगा तब लोगों ने नहीं सोचा होगा कि किसी दिन उसी बहिष्कृत हिजाबी मां की हिजाबी बेटी तुर्की के राष्ट्रपति के साथ उनके इंटरप्रेटर के रूप में काम करेगी.

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