Friday, January 28, 2022
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क्या मोदी सरकार ने अटल बिहारी के फिलिस्तीन के समर्थन की प्रतिज्ञा को नज़रअंदाज़ किया है?

मसीहुज़्ज़मा अंसारी | इंडिया टुमारो

नई दिल्ली | देश 1977 में जनता पार्टी की जीत का जश्न मना रहा था, कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुई थी, दिल्ली में हुई सभा में सभी कांग्रेस विरोधी दल मंच पर थे, अटल बिहारी वाजपेयी अपनी शैली में जनता से बातें कर रहे थे. तभी मंच पर दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम अब्दुल्लाह बुखारी का आगमन होता है और अटल बिहारी अपना भाषण छोड़ उनसे गले मिलकर स्वागत करते हैं.

थोड़ी देर पहले अटल बिहारी जनता से कह रहे थे कि लोक शक्ति की लहर ने लोकतंत्र की हत्या करने वालों को इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया है. मगर शाही इमाम के आगमन के बाद अटल जी के भाषण का रुख बदल जाता है.

अटल जी कहते हैं, “मेरी पार्टी जनसंघ के बारे में हव्वा खड़ा किया जाता है कि जनसंघ मुसलमानों का दुश्मन है. कोई इस झूठे प्रचार में नहीं आया ये बड़ी खुशी की बात है.”

अटल बिहारी आगे कहते हैं, “हम आश्वासन देना चाहते हैं कि देश में भाईचारे की जो राजनीति शुरू हुई है उसमें कोई खलल डालने नहीं दिया जाएगा. भाई को भाई से बाटने की किसी भी चाल को सफल होने नहीं दिया जाएगा. हिन्दू, मुस्लिम सिख ईसाई पारसी बुद्ध जैन अलग-अलग मतावलंबी अपने-अपने उपासना के रास्ते पर चलते हुए, एक दूसरे के साथ आदर का भाव बरतते हुए इस देश के निर्माण में अपना योगदान देंगे.”

फिर अटल बिहारी अपने भाषण का दायरा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ले जाते हुए मध्यपूर्व का रुख करते हैं और फिलिस्तीन के मुद्दे पर बात शुरू करते हैं.

अटल कहते हैं, “एक बात बार बार कही जा रही है कि जनता पार्टी की सरकार इजराइल का साथ देगी और अरब के लोगों का साथ नहीं देगी. इस गलतफहमी को दूर करने के लिए मैं कहना चाहता हूँ कि हम हर एक प्रश्न को गुड़ और अवगुण के आधार पर देखेंगे लेकिन मध्यपूर्व के बारे में ये स्थिति साफ है कि अरबों की जिस ज़मीन पर इजराइल कब्ज़ा कर के बैठा है वो ज़मीन उसको खाली करना होगी.”

इजराइल की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा, “आक्रमणकारी आक्रमण के फलों का उपभोग करे. यह हमें अपने संबंध में स्वीकार नहीं है, जो नियम हम पर लागू है वो औरों पर भी लागू होगा. अरबों की ज़मीन खाली होना चाहिए. जो फिलिस्तीनी हैं उनके अधिकारों की प्रतिस्थापना होना चाहिए.”

उन्होंने आगे कहा कि, “मध्यपूर्व का ऐसा हल निकालना होगा जिसमें आक्रमण का परिमार्जन हो और स्थाई शान्ति का आधार बने.”

फिलिस्तीन-इजराइल के मसले पर जिस पार्टी के संस्थापक अटल बिहारी वाजपेयी का यह कहना था कि हम हर एक प्रश्न को गुड़ और अवगुण के आधार पर देखेंगे उस पार्टी का वर्तमान नेतृव मुद्दों को गुड़ और अवगुण के आधार पर देखने के बजाए धर्म के आधार पर देखने लगा है.

मध्यपूर्व के बारे में बात करते हुए अटल ने कहा था कि, स्थिति साफ है कि अरबों की जिस ज़मीन पर इजराइल कब्ज़ा कर के बैठा है वो ज़मीन उसको खाली करना होगी लेकिन उसी आक्रमणकारी इजराइल के साथ वर्तमान भाजपा नेतृव और भाजपा शासित सरकार के मधुर संबंध अटल की राजनैतिक और वैचारिक विरासत के साथ विश्वासघात की गवाह हैं.

1977 के उस भाषण में अटल ने जो बहुत सी बातें तत्कालीन निरंकुश कांग्रेस सरकार के लिए कही थीं वो सभी बातें आज वर्तमान भाजपा सरकार के लिए भी सत्य है. उन्होंने कहा था जो मेरे साथ थे वो उनके साथ हो गए और दूध के धुले हो गए. क्या सत्ता दल कोई ऐसा कुम्भ है जो उसमें गोता लगाएगा वो पवित्र हो जाएगा.

वर्तमान में भाजपा दल वही कुम्भ हो गया है जिसमें गोता लगाने के बाद गंभीर और संगीन आरोपी भी पवित्र हो जा रहे हैं जिसका ज़िक्र अटल बिहारी ने कांग्रेस के लिए किया था.

उन्होंने जो कांग्रेस के लिए कहा था वो सभी बातें आज के राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा नेताओं और भाजपा नीतियों को कटघरे में खड़ा करती हैं. उन्होंने कहा था, “लोकतंत्र में हमारी निष्ठा है और सर्व धर्म संभाव के आदर्श को लेकर आगे बढ़ रहे हैं, हमारे समाजवाद में सत्ता का केंद्रीकरण नहीं विकेंद्रीकरण होगा, सत्ता जनता के हाथों में होगी और राज्य को एक दैत्य का रूप नहीं लेने दिया जाएगा.”

आज देश के किसानों और बेरोज़गारों का यही कहना है कि राज्य एक दैत्य का रूप धारण कर चुका है और प्रतिरोध की आवाज़ को कुचलना चाहता है.

भाजपा के लिए अटल बिहारी का यह कथन आदर्श होना चाहिए कि, “कोई व्यक्ति कितना ही बड़ा क्यों न हो देश से बड़ा नहीं हो सकता, कोई दल जितना भी बड़ा शक्तिशाली हो जनता से बड़ी शक्ति नहीं रख सकता. व्यक्ति आएंगे चले जाएंगे, पार्टियां बनेंगी बिगड़ेंगी, सरकारें क़ायम होंगी बदलेंगी मगर देश बना रहेगा.”

वर्तमान में भारत का सबंध फिलिस्तीन के सबसे बड़े विरोधी देश इजराइल के साथ सबसे मज़बूत है और अपने ‘स्वर्णिम युग’ में है. साल 2017 में भारत-इजराइल कूटनीतिक संबंधों की 25वीं वर्षगांठ पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजराइल यात्रा पर गए थे. मोदी की यह यात्रा किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा की गई पहली इजराइल यात्रा थी.

मोदी की यात्रा के बाद में इजराइली प्रधानमंत्री नेतनयाह्यु भी भारत यात्रा पर आए थे और दोनों देशों के मध्य कई समझौतों पर हस्ताक्षर भी हुए.

इजराइली प्रधानमंत्री नेतनयाह्यु के भारत आगमन पर तीन मूर्ति चौराहे का नाम इजरायली भूमि के हाइफा नगर के नाम पर तीन मूर्ति हैफा चौक कर दिया गया.

भारत अपनी वैचारिक विरासत को त्यागते हुए और अटल बिहारी के कथन को नकारते हुए गुड़ और अवगुण के आधार पर फैसला करने के बजाए धन और धर्म को आधार बनाकर फैसला करने लगा.

भाजपा की इजराईल सरकार के प्रति नीतियों और नज़दीकियों ने यह साबित किया है कि अटल बिहारी का यह कथन कि, जनसंघ के बारे में यह प्रचारित किया जाता है कि जनसंघ मुसलमानों का दुश्मन है, वर्तमान में भाजपा ने सही साबित किया है.

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